सरोकार

शोषित मानवता के लिए नवज्योति और आत्मविश्वास का सृजन करता ब्लॉग

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Tamanna


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वो धर्म किस काम का जो इंसानियत का मर्म भुला दे

Posted On: 6 Nov, 2013  
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social issues में

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नारी के लिए श्राप बन गया है उसका शरीर

Posted On: 20 Apr, 2013  
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एक पोर्न स्टार से और उम्मीद भी क्या थी

Posted On: 5 Feb, 2013  
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लड़का है, क्या किया जा सकता है

Posted On: 4 Jan, 2013  
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अब तो अपनों का ही खून बहाया जाता है !!

Posted On: 5 Dec, 2012  
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9 Comments

इंसानियत की सबसे बड़ी दुश्मन है देशभक्ति!!

Posted On: 18 Aug, 2012  
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20 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा:

तमन्ना जी आपने अधूरी बात की है । पूरी करने के लिये आपको धर्म के साथ-साथ जातिगत आरक्षण से जुड़ी समस्याओं पर भी बात करनी पड़ेगी, जिसपर चर्चा करने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है । परन्तु समस्या तो समस्या है, कबूतर के आँख मूँद लेने से बिल्ली का खतरा टल नहीं जाता । समाज के जिस तबके को ऊपर उठाकर मुख्यधारा में शामिल करने हेतु इसका प्रावधान किया गया था, वह लक्ष्य अब लगभग पूरा होने को है, परन्तु है किसी की मज़ाल जो इसके आज के औचित्य पर किसी स्तर पर भी बहस चला कर सही सलामत बहस को समेट भी सके ? स्थिति विकट है, और जिसे जब वोट की दरकार होती है, इस आग में एक चम्मच घी का और उँड़ेल देता है । एक समय था जब प्रतियोगी परीक्षाओं में समाज के पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व भी न्यूनतम था, और युगों से दबाए हुए इस समुदाय की मानसिक स्थिति के कारण उपस्थित अभ्यर्थियों के अंक भी इतने कम आते थे, कि जातिगत आरक्षण के साथ-साथ अंक प्रतिशत आदि में छूट देना भी न्यायोचित ही था । परन्तु आज वह स्थिति नहीं रही । अब समाज के तथाकथित अगड़े और पिछड़े वर्ग एक ही धरातल पर खड़े हैं, जहाँ सबको हर मामले में समान अवसर प्रदान किये जाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है । आज के युवाओं को देखकर ये नहीं कहा जा सकता कि इनमें से कौन अगड़ा हो सकता है और कौन पिछड़ा, जबकि दो-तीन दशक पूर्व तक यह पहचान दूर से ही सम्भव थी । हर कथित पिछड़े वर्ग-विशेष के लिये आरक्षण के अलग-अलग प्रतिशत हमने दिये हैं, परन्तु आपके शब्दों में 'अन्य' के लिये कोई आरक्षण नहीं है, बल्कि उसे 'अनरिजर्व्ड' शब्द दिया गया है, जो अगड़ों पिछड़ों दोनों के लिये समान रूप से उपलब्ध है । अब बताइये कि 'अन्य' कौन है ? मुट्ठी भर किसी समय की सामन्त, अमात्य और मुनीमी करने वाली जातियों के लड़के-लड़कियाँ, जो अब एक नए फ़्रस्ट्रेशन के दौर से गुजर रहे हैं । उनके खानदान में न तो अब कोई राजा है, न मंत्री । न सेनापति और न ही कोई कोषाध्यक्ष । ज़मींदार अपनी जमीन बेचकर खा गए, और बिगड़ैल लड़के आवारागर्दी करते-करते आज की नई पीढ़ी के पिता बन गए । ऊपरी ओहदों पर अभी भी जो भूतकाल विराजमान दिख रहा है, उसके पाँव अब कब्र में लटकने की ओर अग्रसर हैं, उसके बाद क्या होगा ? बच्चे अपने माँ-बाप को कोस रहे हैं, कि मुझे आप ही के घर में पैदा होना था ? उधर जन्मा होता तो पाँच परसेंट कम में भी मस्ती की नौकरी मिल जाती, वह भी पूरे स्कोप के साथ । आज मेरी टिप्पणी को साँस रोक कर पढ़ा जा सकता है, कि यह क्या चर्चा छेड़ दी इस मनहूस ने, परन्तु वह दिन दूर नहीं जब इस विषय पर सड़कों पर बहस होगी ।

के द्वारा:

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

तमन्ना जी, सर्वप्रथम तो एडिट कर अपने शब्द 'नमक' को 'मरहम' कर लें, जो अर्थ का अनर्थ क्रियेट कर रहा है, और शायद बे-खयाली में आप द्वारा लिख दिया गया होगा । दूसरी बात कि आप के विचारों पर विस्तृत प्रतिक्रिया व्यक्त करने का मतलब कि आपके ब्लाग के समानान्तर एक पूरा ब्लाग ही लिखना पड़ेगा, जो मेरे विचार से एक अनुचित प्रयास ही कहलाएगा । संक्षेप में कहूँ तो आपका अभिप्राय उमर अब्दुल्ला जी से हू-ब-हू मिलता है, जिनके बयान भय और राजनीति की मिश्रित प्रेरणा से ओत-प्रोत हैं । उनके पिता ने उनके बयानों की काट प्रस्तुत कर राष्ट्रीय भावनाओं से संतुलन स्थापित करने की पुरज़ोर कोशिश की । कामयाब रहे अथवा नहीं, यह भिन्न विषय है । आप कुछ दिनों पूर्व जब आम कश्मीरी की जम्हूरियत और अमन के प्रति विश्वास पैदा होने वाले माहौल की ओर मुड़ कर झाँकने का प्रयास करेंगी, तो स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि आम जनमानस किस मानसिकता का हिमायती है । उमर अब्दुल्ला की जीत उसी बदलाव का प्रमाण थी, और आज की उनकी भय-मिश्रित उलट बयानी इस बात का परिचायक, कि पैरों के नीचे से फ़िसलती मनमाफ़िक़ ज़मीन ने उन्हें विचलित कर दिया है । उनके खानदान को अच्छा मौक़ा नसीब हुआ था, जब कश्मीरी युवाओं को मुख्य-धारा में और गहरे खींच कर विकास की गंगा बहाते, युवाओं को रोज़गार और प्रगति की राह पर इतनी दूर ले जाते, जहाँ से तथाकथित जेहाद उन्हें एक बुरे स्वप्न की भाँति भुला देने के क़ाबिल प्रतीत होने लगता । परन्तु अफ़सोस, उमर अब्दुल्ला जी ने बजाय प्रगतिशील रास्तों पर चलने के, दिल्ली के बड़े राजकुमार का पिछलग्गू बने रहने को ही अपने अस्तित्व के लिये ज़्यादा श्रेयस्कर समझा, नतीज़ा देश के सामने है । आप कहती हैं कि क्या कश्मीरियों को आम भारतीय जैसी नागरिकता का दर्ज़ा प्राप्त है ? इसका उत्तर सचमुच नकारात्मक है । क्योंकि उन्हें आम भारतीय नहीं, बल्कि खास भारतीय का दर्ज़ा प्राप्त है, जो शायद इस देश की एक ऐतिहासिक भूल ही कही जाएगी । यदि उन्हें खास दर्ज़ा न देकर आम भारतीयों द्वारा आबाद कश्मीर के साथ जीने का हक़ दे दिया गया होता, तो भी आज अफ़ज़ल जैसे जल्लाद को शहीद कहते उन्हें शर्म आती शायद । न भूलें कि फ़ाँसी उस अफ़ज़ल को नहीं दी गई है, जो एक होनहार मेडिकल स्टूडेंट या फ़िर सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाला एक प्रगतिशील युवा था, बल्कि उस षड्यंत्रकारी अफ़ज़ल को दी गई है, जिसने अपने देश के सिविलियन्स को सर्विसेज देने की बजाय अपने ही लोकतंत्र के मंदिर परिसर में उनका क़त्लेआम कराने की साज़िश रची थी । मैं ज़्यादा विस्तार में जाने की बजाय मात्र इस बात के साथ समाप्त करना चाहूँगा, कि आपके तर्क़ तर्क़संगत बिल्कुल नहीं हैं, मात्र पथ-भ्रष्ट कश्मीरी युवाओं की हाँ में हाँ मिलाते से प्रतीत होते हैं । जब तक पाकिस्तान का वज़ूद रहेगा, इस समस्या का कोई समाधान नहीं है, और हमारे भ्रष्ट नेतृत्वकर्त्ताओं में वह माद्दा है नहीं, जो दोनों मुल्क़ों की एक ही मिट्टी से बनी दीवारों को ढाह कर बर्लिन की तरह एक कर पाएँ । फ़साद की जड़ ये भी है कि पाकिस्तान में सिर्फ़ हिन्दुस्तानी मुसलमान बसते हैं, जबकि हमारा अखंड राष्ट्र सर्वधर्म-समभाव रखने वाला देश है । हम अपने मुसलमानों को अलग नहीं कर सकते, चाहे वे कश्मीरी हों, या अलीगढ़वी । जबकि पाकिस्तान चीन के सहयोग से पूरे कश्मीर को निगलकर इसमें इस्लाम की मूल भावनाओं से इतर कट्टरवादी राज्य गढ़ने का हिमायती दिखता है, जहाँ जम्हूरियत के नाम पर रोज़ कभी खत्म न होने वाला क़त्लेआम ज़ारी रहे । खुद अपनी दाढ़ी में आग लगी हुई है, और दूसरों की क़तर कर उन्हें सुरक्षित बनाने का ख्वाब दिखाता है । कश्मीर के युवा जब जाग जाएंगे, तभी सवेरा भी आ जाएगा । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

के द्वारा: Tamanna Tamanna

प्रिय ब्लॉगर मित्र, हमें आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है साथ ही संकोच भी – विशेषकर उन ब्लॉगर्स को यह बताने में जिनके ब्लॉग इतने उच्च स्तर के हैं कि उन्हें किसी भी सूची में सम्मिलित करने से उस सूची का सम्मान बढ़ता है न कि उस ब्लॉग का – कि ITB की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगों की डाइरैक्टरी अब प्रकाशित हो चुकी है और आपका ब्लॉग उसमें सम्मिलित है। शुभकामनाओं सहित, ITB टीम पुनश्च: 1. हम कुछेक लोकप्रिय ब्लॉग्स को डाइरैक्टरी में शामिल नहीं कर पाए क्योंकि उनके कंटैंट तथा/या डिज़ाइन फूहड़ / निम्न-स्तरीय / खिजाने वाले हैं। दो-एक ब्लॉगर्स ने अपने एक ब्लॉग की सामग्री दूसरे ब्लॉग्स में डुप्लिकेट करने में डिज़ाइन की ऐसी तैसी कर रखी है। कुछ ब्लॉगर्स अपने मुँह मिया मिट्ठू बनते रहते हैं, लेकिन इस संकलन में हमने उनके ब्लॉग्स ले रखे हैं बशर्ते उनमें स्तरीय कंटैंट हो। डाइरैक्टरी में शामिल किए / नहीं किए गए ब्लॉग्स के बारे में आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा। 2. ITB के लोग ब्लॉग्स पर बहुत कम कमेंट कर पाते हैं और कमेंट तभी करते हैं जब विषय-वस्तु के प्रसंग में कुछ कहना होता है। यह कमेंट हमने यहाँ इसलिए किया क्योंकि हमें आपका ईमेल ब्लॉग में नहीं मिला। [यह भी हो सकता है कि हम ठीक से ईमेल ढूंढ नहीं पाए।] बिना प्रसंग के इस कमेंट के लिए क्षमा कीजिएगा।

के द्वारा:

आदरणीय तमन्ना जी, सादर ! किसी के भी द्वारा कही गई बातों के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं ! यह पढ़ने, सुनने, देखने वालों की मानसिकता, समय और परिस्थितियों पर निर्भर करता है ! गोस्वामी तुलसीदास जी राम और सीता के परम भक्त थे, इस बात में संदेह नहीं किया जा सकता ! परन्तु राम का अर्थ समस्त पुरुष जाति और सीता का अर्थ समस्त स्त्री जाति से नहीं लगाया जा सकता ! आपने बिलकुल ठीक कहा है की .... ""मूल प्रसंग को जाने बिना केवल उल्लिखित तथ्यों के आधार पर महाकवि की मानसिकता पर प्रहार करना एक खतरनाक प्रवृत्ति है."" ऐसा नहीं किया जाना चाहिए ! जो लोग भी ऐसा करते हैं, वे केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, या रामचरित मानस को एक निम्न कोटि की पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं ! बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ वीक की बधाई स्वीकार करें ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

आदरणीय तमन्ना जी,सादर अभिवादन , "शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी" हमारे विचार से ये ५ नही तीन हैं क्यूंकि पांचो शब्द संज्ञा नही हैं |इसमें ३ शब्द संज्ञा और २ शब्द विशेषण हैं |पहला शब्द ढोल ,संज्ञा हैं ....एक वाद्य यन्त्र का नाम हैं |इसके बाद अर्धविराम लगाएं ,दूसरा शब्द गंवार संज्ञा नही,विशेषण हैं जों शुद्र के लिए प्रयोग किया गया हैं और व्याकरण के इस सिद्धांत को आप भी जानते होंगे कि विशेषण का प्रयोग हमेशा संज्ञा से पहले किया जाता हैं जैसे मीठा फल,काला घोडा ,आदि .....................तो गंवार शब्द किसी का नाम नही बल्कि विशेषण हैं अतः इस शब्द के बाद अर्द्ध विराम न लगाये |यह शब्द शुद्र के लिए प्रयोग किया गया हैं अर्थात गंवार शूद्र |शूद्र का अर्थ होता हैं सेवक तो जों सेवक गंवार हों उसे ताडना देना उचित हैं |"ताड़ने बह्वोगुनः"के अनुसार ताडना के कई गुण होते हैं |चौथा शब्द पशु भी संज्ञा नही ,विशेषण हैं और यह नारी के लिए प्रयुक्त हैं ....और जों नारी ,नारीत्व के गुणों से युक्त ना हों ,पशु-नारी हों जैसे कि नरपशु भी होते हैं तो पशुता करने वाली ऐसी नारी भी ताड़ना कि पात्रा हैं .....................समस्त नारी वर्ग या प्रत्येक नारी नही {अजय}

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

के द्वारा:

विचारों की बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है. विषय कोई नया तो नही है लेकिन महाकवि तुलसी दास जी की कुछ इस प्रकार की पंक्तियों को उधृत करके उन्हें नारी विरोधी ठहराने वालों को एक सशक्त उत्तर देने के साथ-साथ उन्हें दोषमुक्त सिद्ध करने का भी सराहनीय प्रयास है. यद्यपि इसकी आवश्यकता महाकवि को संभवतः उतनी नहीं है जितना समय - समय पर विभिन्न अवसरों किया जाता रहता है क्यों की महाकवि तो स्वयं ही कह गये हैं - "जाकी रही भावना जैसी." फिरभी आज की परिस्थितियों को देखते हुए इतना अवश्य कहना चाहूँगा क़ि स्वतंत्रता का अर्थ उछ्रिन्खलता कदापि नहीं होता है. शिक्षा , आत्मनिर्भरता बहुत आवश्यक है लेकिन यह स्वस्थ मान्यताओं एवं मर्यादाओं के उल्लंघन का अधिकार किसी को भी प्रदान नहीं करता है . ये सब उस लछमण रेखा की भांति हैं जिसके उल्लंघन का परिणाम सर्वविदित है. पाश्चात्य देश इसके परिणाम देख रहे हैं अब हमारी बारी आनेवाली है. लेख की भाषा में कृत्रिमता एवं शब्दाडम्बर, अन्यार्थी शब्दों का प्रयोग लेखन के प्रभाव को कम करते हैं. यथा- "तुलसीदास कृत अग्रलिखित वचन " (तुलसी दास द्वारा लिखित ये शब्द) , " रत्नावली के व्यंग्य बाणों से उपेक्षित (आहत)" "वशीभूत होकर विचरण (आचरण) करने लगता है", "उनकी लेखनी नारी द्रोह के भाव से युक्त नजर आती(प्रतीत होती) है.आदि. इस प्रवृत्ति से बचा जाना चाहिए, कृपया इसे अन्यथा न लें. विचारोत्तेजक लेख के लिए पुन; साधुवाद

के द्वारा:

आदरणीया! तमन्ना जी! सादर अभिवादन. सर्वप्रथम बेस्ट ब्लॉगर ऑफ द वीक चुने जाने के लिए बहुत बहुत बधाई. आज बहुत दिनों बाद आपको पढ़ रहा हूँ. ये एक ऐसा प्रसंग है जिस पर समय समय पर लेखन होते रहें हैं, कोई इसे उचित तो कोई अनुचित कहता है. इसे लेकर इसी मंच पर कई लेख लिखे गए हैं. मैंने भी एक लेख लिखा था जिसमे ये प्रसंग भी आया था "सीता-परित्याग राजधर्म या राजमोह". इसमें केवल सीतापरित्याग ही नहीं इस पर भी प्रतिक्रिया द्वारा चर्चा की गई है. "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन्ह देखि तैसी. और हरि अनंत हरि कथा अनंता, सुनहि गुनहिं बहुबिधि सब संता." यद्यपि उपरोक्त शीर्षक को पढकर मन में जो प्रश्न उठता है, लेख के अंत तक उसका उत्तर नहीं ढूंढ पा रहा हूँ. फिर भी इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया मात्र दे रहा हूँ. और किसी बात को न उठाते हुए केवल ‘शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी’ पर प्रकाश डालना चाहूँगा. सबसे पहली बात ये पंक्तिय गोस्वामी जी ने नहीं कही हैं, केवल लिखा है, कहा है समुद्र देव ने राम से. इसका प्रमाण हमें गोस्वामी जी के महाकाव्य श्री राम चरितमानस के पंचमकाण्ड सुन्दरकाण्ड के दोहा संख्या 57 से 59 के बीच मिलता है. इतना पढ़ने के बाद ये साफ़ हो जाता है की इन वाक्यों को महाकवि ने नहीं समुद्र ने कहा है. अब जरा इस पंक्ति को इस तरह पढकर देखिये- "ढोल, गवार सूद्र, पशु नारी. सकल ताडना के अधिकारी." यहाँ पर उपमा के लिए पांच नहीं केवल तीन चीजे ही हैं. पहला ढोल, दूसरा गवार सूद्र (सभी सूद्र नहीं केवल गवार सूद्र) तीसरा पशु नारी (सभी नारी नहीं केवल पशुवत व्यव्हार करने वाली नारी). अब आप ही बताइए इसमें गलत क्या है ? आपने अपने आलेख में रत्नावली को भी स्थान दिया है. वैसे उनका व्यंग तुलसी के लिए हितकर हुआ परन्तु इस विषय में तुलसी जी ने कुछ नहीं लिखा कि वो उनके आभारी हैं या रुष्ट हैं. उनकी चर्चा व्यर्थ लग रही है. अतः इस विषय को लेकर गोस्वामी जी पर कोई आरोप लगाना सरासर गलत होगा. इस कड़वी प्रतिक्रिया के लिए क्षमा चाहता हूँ.

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

आदरणीया तमन्ना जी, “जिमि स्वतंत्र भय बिगरहिं नारी”- जैसे वचन तथा ‘शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी’- जैसे वक्तव्य के पूरे निहितार्थ की समझदारी का दायित्व आखिर किसका है ? उस नारी और कथित शूद्र समाज का, जो लगभग ६०-७० वर्षों पूर्व अशिक्षा के घोर शिकार थे या फिर उस समाज का, जो युग-युग से सुशिक्षित था ? विडंबना तो यह है कि सन्दर्भ, प्रसंग तथा सम्पूर्ण निहितार्थ को भली-भाँति समझने वाले ही अधिकतर तुलसी-याज्ञवल्क्य-कौटिल्य की ऐसी-वैसी संदर्भित पंक्तियों के उद्धरण से नारी और श्रमिक समाज पर गाहे-बगाहे फब्तियाँ कसते रहते हैं | जब तक बिना विरोध के यह सब चलता रहा, तब तक पूरे निहितार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ी, किन्तु जब इधर के दशकों में बेज़ुबान समाज भी शिक्षा के चलते मुखर हुआ और स्वामी विवेकानंद के कथनानुसार तर्क की कसौटी पर अपने मान-सम्मान को सँभालने का प्रयास करने लगा, तो अब पूरे निहितार्थ पर बल दिया जाने लगा | निहितार्थ तो विशिष्ट वक्तव्य से जुड़ा होता है, किन्तु समझदारों को नारी और श्रमिक समाज पर ऐसी-वैसी पंक्तियों के इस्तेमाल की अपनी मानसिकता दुरुस्त करनी होगी | शेष, ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के लिए बधाई ! प्रासंगिक तथा नवीन विचारों की प्रभावपूर्ण प्रस्तुति के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

तमन्ना जी शायद आचार्य रजनीश के पदचिन्हों पर चल रही हैं जिन्होंने अमेरिका जाकर प्रसिद्द होने के पूर्व ही जबलपुर में अपने निवास के दौरान एक बेहद स्टायलिश टिप्पणी की थी - "अगर प्रसिद्द होना तो ठीक उल्टा करो उसके जो दुनिया करती है |" उन्होंने यह केवल कहा ही नहीं पर कर भी दिखाया था | जबलपुर में वह अक्सर दिन दहाड़े कुएँ पर नितांत नग्न स्नान किया करते थे | तमन्ना जी भी ऐसा ही कर रही हैं | उनके ब्लॉग का शीर्षक बेहद आकर्षक और सनसनीखेज होता है जैसे "पूंजीवाद के सर्वश्रेष्ठ एजेंट के रूप में उभरे थे महात्मा गांधी !!" या "क्या सीता के चरित्रोन्नायक महाकवि नारी द्रोह के अपराधी हैं" | सच कहूँ तो मैं भी सीता शीर्षक वाले ब्लॉग को ही पढ़ने बैठा था पर मुझे क्या मालूम था कि वहाँ तो "खोदा पहाड, निकली चुहिया " वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी | पुनश्च गांधीजी के शीर्षक वाली ब्लॉग पढते ही बरबस ही आचार्य रजनीश की याद आ गयी | ईश्वर बचाए ऐसे ब्लॉगर्स से ....|

के द्वारा:

तमन्ना जी, सर्वप्रथम नमस्कार! पहले बार आपके ब्लाग पर आया और पड़ा..सार्थक एवं विचारशील लेखन है आपके. प्रस्तुत विषय में महाकवि का स्त्रियों के बारे लिखी गयी पंक्तियों को आपने पीड़ादायक सन्दर्भ में लिया है...इसके इतर भी सोचा जा सकता है.. तुलसी बाबा के समय में सामाजिक स्थितियां/परिस्थितियां क्या थी, हम कह नहीं सकते..या वो स्वयं स्त्रियों के बारे में क्या सोचते थे ये समझना मुश्किल है..हाँ आपकी बात भी सच हो सकती है कि मजबूरन उनकी लेखनी नारी द्रोह के भाव से युक्त नजर आती है परन्तु उनकी बुद्धि क्षुद्र हो सकती है स्त्रियों के लिए, मुझे ऐसा नहीं लगता.... जिमि स्वतंत्र भय बिगरहिं नारी...ये आज भी सत्य है..यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ बंधन नहीं है कि नारी को बन्धनों में रखा जाना चाहिए..अपितु आशय उच्श्रन्खलता से है.. उस समय के देशकाल को समझे तो नारी आपके परिवार का सबसे बड़ा मान, सम्मान और धन थी ..आज भी है यदि समझो तो..और अपने मान/सम्मान/धन कि यत्नपूर्वक रक्षा कौन नहीं करेगा...स्त्री देवताओं के बाद पूज्यनीय है.. आपका लेखन का स्तर उच्च कोटि का है...निरंतर लिखते रहिये...धन्यवाद

के द्वारा: Himanshu Nirbhay Himanshu Nirbhay

तमन्ना जी , एक महान युगपुरुष गोस्वामी तुलसीदास के समय का भारत रिश्तों के लूट खसोट, रिश्तों के उपहासों का भारत था। इतिहास उस पार से लिखा जा रहा था। समय के इस विपरीत मोड़ पर इस कलम उपासक ने भारतीय इतिहास की परतों से श्री रामपरिवार का चरित पुनारंकित किया। जिसमे सभी रिश्ते सहेजे गए और रिश्तों के मर्म की पुनर्समीक्षा की। अब '''महाकवि को नारी द्रोह के अपराधी''' के रूप में विचार मंथन को 'अल्पज्ञता' अथवा 'अतिज्ञान' ही कहेंगे। क्यूंकि रचना के काल-खंड में चहुँओर नारी अपमान के साक्ष्य इतिहास के पन्ने देते मिलते है, जबकि ''महाकवि ने रानी के महान पारिवारिक भावनाओं को प्रस्तुत किया।_____इसलिए ऐसे भ्रामक विषय स्वयं में सम्पूर्ण नहीं है।

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

एस.पी.सिंह जी, कृपया दूसरों पर सबूत सहित इल्‍जाम लगाये अन्‍यथा कोरे इल्‍जाम और गलत बयानी नहीं करें. अगर रामदेव जी मे ऐसा कुछ भी गलत है तो कृपया ठोस सबूत रखें. आपने अपने जीवन में कितने लोगों का भला किया है इसे बताये दोषारोपण की आदत बहुत खराब है. लोग क्‍या कर रहे है, बल्कि आप स्‍वयं क्‍या कर रहे हो. तमन्‍ना जी, तो सिर्फ एक तरफा विचार रखती है. इसलिये इन्‍हें समझाना मुश्किल है. लेकिन इन्‍होनें भी इतने गंभीर थोथे आरोप नहीं लगाये है. भगवान राम पर भी लोगों ने लांछन लगाये थे. इसलिये ऐसा होना स्‍वा‍भाविक है. इन सब का उत्‍तर समय ही देगा कि कौन सच है और कौन झूठ ? लेकिन कम से कम अपनी जबान तो गंदी नहीं करें. ईश्‍वर आप सबको सद्रबुद्ध‍ि दे

के द्वारा:

माफ़ी चाहता हूँ पर मै आपके इस लेख से काफी हद तक सहमत नहीं हूँ उसका कारण ये हैं की किसी एक दो की ज़िन्दगी का चिटठा खोल कर आप किसी एक पक्ष पर टिपण्णी नहीं कर सकते कोई भी शादी तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक उसमे प्रेम और समझदारी न हो जब तक लड़के लड़की एक दुसरे को समझे नहीं आदर न करे आप ये कैसे कह सकते हैं की प्रेम विवाह में असफलता निश्चित है या ये सब प्रेम विवाह मे ही होगा इसका मतलब ये साफ़ है की आपने एक टीवी शो के आधार पर और २-४ लोगो के लाइफ को आधार बना कर ये निर्णय ले लिया की जो भी प्रेम करते हैं और जो भी प्रेम विवाह करना चाहते हैं उनका भविष्य अँधेरे मै हैं और उनमे सामंजस्य कभी होगा ही नहीं रहा सवाल अरेंज मेरिज का तो में आपको दर्जनों मिसाल दे सकता हु जिसमे कितने घर बर्बाद हुए हैं कितनी समस्या है कारण पति पत्नी का तालमेल में कमी होना लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं की हम अरेंज मेरिज को बुरा बताये ? मेरे माता पिता की अरेंज मेरिज है जबकि मेरे दोस्त के माता पिता की लव मेरिज लेकिन जब मेने गौर किया तो देखा की आज कही ज्यादा सुखी और खुश मेरे दोस्त के माता पिता की लाइफ है (आपके लिए ये एक अपवाद हो सकता है ) इसका ये मतलब नहीं की में अरेंज मेरिज की बुराई कर रहा हु हम किसी एक दो के जीवन के आधार पर ये नतीजा नहीं निकाल सकते की किसके लिए क्या सही है क्या गलत है ये फेसला उनका होना चहिए जिन्हें अपनी आगे की लाइफ जीनी है तकलीफ तो इस बात की होती है की झूठे शान और परम्पराव का चोला ओढ़ कर हमारे देश के लोग प्रेम विरोधी हैं अपनों की दुश्मन बन गए हैं कितने लोग हैं जिनकी हर दिन हत्या होती है सिर्फ इसलिए क्यों की वो अपने पसंद की शादी करना चाहते हैं ? आपने ही रिश्तेदार हैवान बन जाते हैं और आपने बेटे बेटियों की जबरदस्ती शादी कर के कौन सा बड़ा वो इज्जत हासिल कर लेंगे जिसमे सारी ज़िन्दगी उनके बच्चे तकलीफ में हो ? अपनों को ही मार देना या समाजिक बहिष्कार या घर से निकाल देना इससे वेश्याना और शरमशार कर देने वाली बात तो और कुछ हो ही नहीं सकती जिस देश में किसी इंसान को प्रेम करने की भी आजादी नहीं है अपने पसंद का जीवन साथी चुनने तक का हक नहीं है (लम्बे चौड़े कमेन्ट के लिए माफ़ी चाहता हूँ पर में चाहता हु की मेरी बात हर कोई समझे और मेरी आवाज़ हर किसी के कानो तक पहुचे )

के द्वारा:

क्या कथित देशभक्ति के लिए हम इंसानियत को कुर्बान करते हुए एक बार भी यह नहीं सोचते कि जिन लोगों का हम खून बहा रहे हैं, उनसे जीने का अधिकार छीन रहे हैं, उनका जाना उनके परिवार पर कितना भारी पड़ेगा. इंसानियत को तार-तार करती यह नफरत इस कदर हमारे दिलोदिमाग पर घर कर चुकी है कि देशभक्ति की आड़ लेकर खून की होली खेलने में भी हम कोई बुराई नहीं समझते. तमन्ना जी , आपके विचारों से अपने आप को सहमत होते हुए नहीं देख रहा हूँ ! मानवता के किस्से भी खूब देखे हैं और राष्ट्र भक्ति के भी ! सच तो ये है की जो राष्ट्र भक्त हो सकता है वाही मानवता का पुजारी भी और जो मानवता का पुजारी है वो राष्ट्रभक्त भी होगा ही !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय, तमन्नाजी! यद्यपि आपकी सोंच को सलाम, वर्तमान भारत में इंसानियत की गिरी स्थिति पर ये लेख सराहनिए है, तथापि आप अपनी बातों को जिस तराजू में तोल रहीं हैं, उसमे आपका पलड़ा हल्का है, जब बात देश की हो, तो कोई भी तर्क,नीति, धर्म यही कहता है कि जिसने हमारी भारत माँ को छूने की कोशिश कि है उसके प्राण ले लो, क्योंकि कालांतर में जब भगवान श्री राम ने रावण को संधि भेजा और उसने ठुकरा दिया तो युद्ध अनिवार्य हो गया,, "हाल ही में हमने आजादी की 65वीं वर्षगांठ मनाई है. इस अवसर पर बहुत से लोगों को मेरा यह लेख विवाद पैदा करने वाला लग सकता है परंतु इस लेख को लिखने का आशय देशभक्ति को सही या गलत ठहराना नहीं बस छिपी और दबी हुई इंसानियत के औचित्य को खंगालना था जिसकी ओर हम ध्यान देना ही जरूरी नहीं समझते." इन पंक्तियों से तो मैं पूर्णतः सहमत हूँ, परन्तु देश को लूटने वाले लूटें और हम चुप रहें इसे संस्कार नहीं कायरता कहते हैं, जैसा कि पहले ही 'कुमार गौरव अजितेंदु जी' ने लिखा है, कि इसकी आवश्यकता पकिस्तान में है. कृपया इसे मेरा व्यग्तिगत विचार समझें और कुछ नहीं.

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

आपका लेख बड़ा तार्किक है, परन्तु आप इसे विवादास्पद इस आशय के साथ मान सकती हैं, कि लेखकीय भावना थोड़ी मानवेतर है, बिलकुल देववाणी के समकक्ष. इसे यूं समझें कि यदि आपकी सूक्ष्म भावना के साथ मानवता बहे, तो धरती मानवतावादियों व मानव आबादी से ऎसी पट जाएगी, कि सबके लिए दाना-पानी जुटाना बिलकुल असंभव हो जाएगा, और सारी प्राकृतिक व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी. सृष्टि-व्यवस्था 'जीवो जीवस्य भोजनं' के सिद्धांत पर आधारित है, न कि बाघ और बकरी को एक घाट पर इकट्ठा देखने की. चिड़िया अपने घोंसले-अण्डों की रक्षा हेतु सांप का प्रतिकार करना बंद कर उसके प्रति स्वागत भाव अपना ले, सांप नेवले को बिल में दावत पर बुलाने लगे, और ये सभी आक्रमणकारी जंतु भी अपना स्वभाव भूल शाकाहारी बन जाएं, तो फिर कैसे होगा संतुलन ? गृह-रक्षा, राष्ट्र-रक्षा तथा विस्तारवाद आदि मानवोचित भाव, सभी कुछ शाश्वत संतुलन व्यवस्था की उपज है, कोई मनोविकार नहीं है. धन्यवाद.

के द्वारा:

तमन्ना जी                 सादर, सरहदों को इंसानियत का दुश्मन बाताना सर्वथा अनुचित है बावजूद इसके कि सरहदों के चक्कर में कई मनुष्यों को जीवन बलिदान कर देना पड़ा है. जब सभी देशों कि अपनी सीमा है उस देश के लोग उसी देश में सारी सुख सुविधाएं भोग सकते हैं यदि किसी अन्य देश में किसी से मिलना है या और किसी कार्य से जाना है तो वह भी बन्द नहीं है. आप पर हमला करने वाले को तो कहीं भी उसका परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना ही होगा चाहे वह सीमा पर हो या घर पर.                 सीमाएं तो सदा ही इंसान को बचाने में सहायक हुई है यही सच्ची इंसानियत भी है. क्योंकि हर भोगोलिक परिस्थिति में इंसान कि डील डौल में परिवर्तन हुआ है.क्या होता यदि शारीरिक असंतुलन वाले बलशाली कमजोर को गुलाम बना कर रखते शायद वह ज्यादा खतरनाक होता. पुनः विचार करें.

के द्वारा: akraktale akraktale

अच्छे को अच्छा कहना कामयाब को कामयाब कहना मेरी राय में तो गलत नहीं हो सकता और फिर फर्क क्या पड़ता है सुनीता विलिअम आज कहाँ रहती हैं? वे कहीं रहें? उनके नाम के साथ भारतीय मूल की रहने वाली महिला कहलाना तो जारी ही रहेगा अगर हम उनकी तारीफ न भी करें तो पूरा विश्व तो उनको जानता है आज. रही बात कन्या भ्रूण हत्या की तो अगर एक बार को हम सुनीता विलियम्स को तवज्जो न भी दें तो क्या इससे भ्रूण हत्या यहाँ रुक जाएगी हाँ इतना जरुर है अगर उनके बारे में हम ज्यादा प्रचार करेंगे तो लोग उससे प्रेरित होकर उतसाहित होकर शायद अपने इस कुकृत्य पर दुबारा सोंचे और इसको बढ़ावा न दें उनको भी समझ आये की जिस कन्या भ्रूण की हत्या करने जा रहें हैं वह कल को इस तरह विश्व में अपन नाम कमा कर देश और परिवार के नाम को रौशन कर सकती है हमें पाजिटिव सोंच का होना चाहिए निगेटिव सोंच हमें और हतोत्साहित कर देगा मेरी राय में

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

इंसानियत , मानवता जो की दुनियां के सभी धर्मों रीती रिवाजों से सर्वोपरि शायद यह पथ न किसी स्कुल में पढाई जाती है न किसी कालेज में यह तो लोग अपने घर परिवार अपने परिवेश और समाज से हिन् सीखते हैं क्या आपको कहीं इंसानियत नजर आती है केवल घृणा द्वेष ,नफरत ,दरिंदगी हैवानियत यही कुछ देखने पढने को मिलता है शायद देश भक्ति भी वैसे हिन् नफरत की ज्वाला में भष्म हो चुकी है वर्ना देश भक्तों का इस तरह से अपमान अपना देश न करता उनकी क़ुरबानी को यूँ न भुला देता आज तो शहीद भगत सिंह को मरवाने वाले शोभा सिंह जो प्रसिद्ध लेखक के पिता श्री हैं उनके नाम से सड़क का नाम रखने की तय्यारी है इससे जाना जा सकता है वर्तमान कांग्रेस पार्टी जिसको सत्ता शुरू में मिली उनकी नजर में देश भक्त कितना मायने रखता है बस इसमें हिन् सारा सत्य छिपा है देश भक्ति का आपके द्वारा प्रकट किया गया उद्गार अपनी जगह सही हो सकता है पर जिन्होंने कुर बनियान दीं उनके परिवार वालों को तो दुःख पहुचता हिन् है .

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

तमन्ना जी, पूर्ण विनम्रता के साथ कहना चाहूँगा आपके इस लेख पर कुछ तर्क के आधार पर कहना संभव ही नहीं है क्योंकि इस लेख का तर्क के आधार पर न तो पूँजीवाद के साथ ही कोई साम्यता है और न व्यावहारिकता से ही.! आपके लेख को दो ही दृष्टिकोण से सराहा जा सकता है- या तो व्यक्ति अन्ना व उनके आन्दोलन से व्यक्तिगत खुन्नस रखता हो अथवा उसे पूँजीवाद समाजवाद का क ख ग घ कुछ न आता हो.! बस एक यही तर्क आपके लेख के समर्थन में खड़ा होता है कि आप अपने एक लेख में जिसकी सराहना करती हैं दुसरे लेख में उसकी ही आलोचना.. चाहे वह पहले गाँधी जी को महान राष्ट्रपिता बताना और बाद में उन्हें पूंजीवाद का एजेंट... अथवा फिर अन्ना को बौद्धिक मंडली से सुसज्जित कुशल आन्दोलनकारी बताकर उन पर भी पूँजीवाद स्टीकर लगा देना..!! मेरी समझ से लेख का कुछ आधार भी होना चाहिए.!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

राजू जी... जिस कला की आप बात कर रहे हैं क्या वास्तव में आज के दौर में उस तरह जीना संभव है. गांधी जी ने स्वदेशी की आड़ में देश में पूंजीवाद स्थापित किया और देश के तथाकथित दूसरे गांधी माननीय अन्ना हजारे संयम के रूप में पूंजीवादियों का हित साध रहे हैं. अगर आप अन्ना के जीवन को आदर्श मानते हैं तो फिर आपके लिए भी जॉब में इंक्रीमेंट का ना होना या ज्यादा काम के एवज में कम पैसे लेना मायने नहीं रखता होगा. राजू जी भोग-विलास और जरूरत में बहुत अंतर होता है. आपके लिए अपने आर्थिक जीवन स्तर को सुधारना एक विलास से परिपूर्ण हो सकता है लेकिज्न मुझे लगता है अपने अधिकार मांगना और आदरपूर्वक जीवन जीना हमारी जरूरत है. जिस पर अन्ना की यह जीवन कला नकारात्मक सिद्ध हो रही है.

के द्वारा: Tamanna Tamanna

तमन्ना जी नमस्कार मुझे ये तो अच्छी तरह से मालूम हो चुका है आपके अब तक के लेखों को पढने के बाद की आप कांग्रेस समर्थक हैं और लेख भी उसी हिसाब से कांग्रेसी बोली में लिखतीं हैं| चलिए लोकतंत्र में जब हर किसी को बात रखने का अधिकार है तो हर किसी को उचित तरीके से विरोध भी करने का अधिकार है| मैं अपने उसी अधिकार का प्रयोग कर रहा हूँ| आपने ये लेख लिख के अन्ना को पूंजीवाद का समर्थक तो बता दिया लेकिन आप ये भूल गईं की उदारीकरण के नाम पर दुनिया भर के पूंजीपतियों के लिए भारतीय बाजार को मनमोहन सिंह जी ने बतौर वित्तमंत्री खोला था| आपको ये भी याद नहीं आया की वही मनमोहन सिंह आज प्रधानमंत्री के तौर पर FDI के नाम पर खुदरा क्षेत्र में भी पूंजीपतियों को लाकर गरीबों की आखिरी रोटी तक छीनने में लगे हैं| आपने अन्ना की मितव्यतिता को जिस निंदनीय तरीके से पेश किया है उसके लिए मैं आपकी तारीफ तो नहीं ही कर सकता| अन्ना ने जिस तरह से कम खर्च में जीने की बात कही वो किसी पूंजीवादी के समर्थन में नहीं बल्कि अपरिग्रह की भावना में कही है| संचय का लोभ ही मनुष्य को पूंजीपति बनाता है| संचय का त्याग ही समाजवाद के मार्ग पर ले जा सकता है| लेकिन ये बात आपको समझ में नहीं आनेवाली| आपको ही क्या पूरी कांग्रेस पार्टी को समझ में नहीं आएगी| हो सके तो समझने की कोशिश कीजियेगा, शायद कुछ सही सोच सकें आप|

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

आपने इस पूरे परिप्रेक्ष्य को नए दृष्टिकोण से देखा और दिखाया , हालांकि मैं फ़िर भी नहीं समझ पा रहा हूं कि पिछले साठ बरसों से सत्ता और सियासत द्वारा बनाई जा रही नीतियों से ऊपर अन्ना का अनशनकारी रास्ता कैसे पूंजीपतियों के विकास और विस्तार का रास्ता बन गया । हां और एक बात इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का भले ही कुछ हो ना हो अन्ना के साथ-साथ उनकी टीम का राजनैतिक कॅरियर तो हिट हो ही जाएगा. आप शायद भूल रही हैं कि इनकम टैक्स और दिल्ली पुलिस भी कम मलाईदार महकमा नहीं रहा है राजनीति के अनिश्चित भविष्य के करियर से कहीं ज्यादा बेहतर और सुरक्षित , जो इसे लात मारकर निकल गए उन्हें अब चमकने चमकाने के लिए किसी और सहारे की जरूरत होगी ऐसा नहीं लगता । इतना ही सोचना काफ़ी है कि हममें से कितनों ने नौ दिन तो दूर आज तक नौ घंटे भी देश के लिए बिना खाए पीए रहे हैं । सब कुछ समय को तय करने दीजीए । आम आदमी को अपनी लडाई खुद भी लडनी होगी

के द्वारा: अजय कुमार झा अजय कुमार झा

माननीया तमन्ना जी , अन्ना हजारे जी का जीवन-दर्शन सही मायनों में जीवन जीने की कला है ! आज आदमी भोग-विलासता के संसाधनों की पूर्ति में अपनी नैतिकता तक त्याग चुका है ! यह सारा पूंजीवाद का ही परिणाम है ! संयम से जीवन जीने की पद्धति को वह बहुत पीछे छोड़ आया है ! जितनी ज़रूरतें कम होंगी जीवन-प्रवाह उतना ही सरल होगा ! यह मात्र किताबी ज्ञान नहीं वरन यह भारतीय मनीषियों का जीवन-दर्शन रहा है ! जिसे गाँधी-अन्ना जैसे लोंगों ने आत्मसात किया ! वैसे देखने-समझने का सबका अपना अलग नजरिया है , कोई गिलास को आधा-भरा तो कोई आधा-खाली देखता है ! यहाँ आपको संयमित तथा भोग-विलास रहित जीवन जीने का आह्वान करने वाला शक्स पूंजीवादी समर्थित मालुम पड़ता है यह आपकी रुग्ण मानसिकता का परिचायक है ! शेष , बंधू अजय सिंह जी ने अपनी प्रतिक्रिया में स्पष्ट कर ही दिया है !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

वाह तमन्ना जी वाह... जैसी व्याख्या आपने पूँजीवाद की की है ,हम सभी को फिर से पूँजीवाद का अध्ययन करना पड़ेगा। मैं तो समझता था कि पूँजीवाद लोगों को भोगवादी बनाता है, न कि संयमी। अगर लोग अन्ना एवं गांधी जी की तरह संयमी एवं विलासितारहित जीवन बिताना आरम्भ कर देंगे ,कम से कम खर्चे में निर्वाह करना सीख गये तो मंदी की चपेट में पूँजीपतियों का व्यवसाय मिट जायेगा। पूँजीवाद का आधार है बचत, ब्याज और लाभ। लोग जितना स्वयं उपभोग नहीं कर सकते हैं उससे कई गुना अधिक भविष्य के लिये बचत करते हैं,ये बचत बैंक बैलेंस और शेयर मार्केट की शोभा बढ़ाते हैं और यही बनती है पूँजी।    जब लोग कम में जीवन निर्वाह करने लगे तो इसका सीधा अर्थ है (1)कि बचत न करना या बहुत अधिक बचत न करना, फिर पूँजी कहां से पैदा होगी! (2) कि मात्र आवश्यक आवश्यकता के लिये ही व्यय किया जाये, फिर विलासिता के उत्पादों पर आधारित 80% बाजार कहां जायेगा! जो भी हो आपके इस लेख ने अर्थशास्त्र,कामर्स,समाजशास्त्र आदि के विद्यार्थियों एवं विद्वानों को हँसा कर उनका अच्छा मनोरंजन कर दिया। धन्यवाद.

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

तम्मान्ना जी, जब आती हो मंच पर एकदम उम्दा विषय लेकर इस बात के लिए हमें आप पर गर्व है.और आप निश्चय ही बधाई की पात्र हैं. अब रही बात सुनीता जी की भारत भूमि से उनका कोई सम्बन्ध नहीं फिर भी हम पीठ थपथपा रहे हैं.पर एक बात यह भी गौर करने की है की हमारे देश के ही कितने उत्पादों को विदेशी कंपनियों ने बगैर हमारा नाम बताये अपने नाम पर पेटेंट करवा दिया.आज भी जिन नए अविष्कारों की बात होती है उसमें से आधे तो मौलिक रूप में भारतीय प्रतिभाओं के ही सुझाए हुए होते हैं.हम आइन्स्टीन को गर्व से याद करते हैं पर ठीक उसी समय वराहमिहिर जैसे भारतीय प्रतिभा को भूल बैठते हैं. "हमारे देश में प्रतिभाओं का अकाल पड़ गया है और हम बिना कोई मौका गंवाए बेवजह अपनी उपलब्धियों का बखान करना चाहते हैं.प्रतिभाओं का अकाल कहते समय "हम कल्पना चावला को भी भूल जाते हैं वह तो भारतीय थी. हमारे देश में प्रतिभाओं का अकाल नहीं है कई hidden talent हैं बस सुविधाओं के अभाव में explore नहीं हो पा रहे हैं.हाँ ,इस ओर ज़रूर सरकार को ध्यान देना चाहिए. धन्यवाद

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

हमारे भारत मैं प्रतिभाओं का अभाव नहीं है......अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा प्रणाली को हमारी अपनी संस्कृति को मार दिया है और हमारी वर्त्तमान व्यवस्था भी उनका ही अनुशरण कर रही है..........कोई भी व्यक्ति बिना मौलिक चिंतन के मौलिक शोध नहीं कर सकता.......वर्त्तमान हम जो विद्यार्थी हैं हमारे दिमाग में अंग्रेजी और विदेशी technology भर दी जा रही है......हमारा जो मौलिक चिंतन है वह अपना रूप ही नहीं ले पा रहा है.........आप भारत का इतिहास देखिये सभी ज्ञान की उत्पत्ति यहीं से हुई है...क्यूंकि उस समय हमारा चिंतन हमारी संस्कृति मौलिक थी......आज व्यवस्था ही ऐसी बनी हुई है की न चाहते हुए भी हमें नक़ल करना पड़ रहा है.........और क्यूंकि हम नक़ल कर रहे हैं इसलिए भारतीय प्रतिभा भारत में विकशित नहीं हो पा रही........दोष व्यवस्था का है........व्यवस्था परिवर्तन से ही भारत का पुन: विकाश संभव है..........! प्रीतीश

के द्वारा: pritish1 pritish1

मुझे दुःख है की आप जैसे लोगों की संख्या भारत में अधिक है जो गाँधी जी के बन्दर हैं न बुरा देखो न सुनो न कहो...........अर्थात बुरा करने की खुली छुट होनी चाहिए कोई आपत्ति करे भी तो कैसे? गणाधी जी महान कभी नहीं थे अंग्रेजों ने उन्ही महान बनाया और हम उनका ही गुणगान करते हैं जिनके कारण आज देश तड़प रहा है हो सकता है आप उस भारत से भिन्न है जहाँ भूख है डर है तनाव है ………भर पेट भोजन नहीं……कुछ करने का अवसर नहीं……..जहाँ कोई सपने नहीं………किन्तु मैं उसी भारत का निवासी हूँ जब ऐसे भारत को देखता हूँ अहसास करता हूँ यही जीता हूँ तो मेरी रूह कांप उठती है…….खून खौल उठता है…….भारत में उपस्थित सभी देशद्रोहियों का अंत निकट है…..

के द्वारा: pritish1 pritish1

के द्वारा: pritish1 pritish1

आदरणीय तमन्ना जी, सादर प्रणाम | प्रेम के कई स्तर हैं , शुरू में इसमें स्वार्थ हो सकता है , वासना हो सकती है , रिश्ते हो सकते हैं , पर अगर हम इन स्तरों से थोड़ा आगे बढ़ सकें या ऊचां उठ सकें तो उच्च स्तर पर प्रेम /इश्क/मुहब्बत /लव हमारा स्वभाव हो जाता है /हो सकता है , रिश्ते गिर जाते है , जैसे फूल खिलता है या महकता है , फूल किसी खाश मौके , ब्यक्ति , रिश्ते या परिस्थिति के लिए नहीं खिलता या महकता ....बस खिलता महकता है , कि जैसे नदी बहती है , झरना गिरता है , हवा चलती है ,,,,ये सभी , किसी के लिए कुछ नहीं करते , बस करते हैं कि ऐसा इनका स्वभाव /नेचर है ....इसी तरह प्रेम जब आदमी का स्वभाव हो जाय जैसे नमक का नमकीन स्वाद .....ईशा ने कहा '' हे मनुष्य ! तुम पृथ्वी के नमक हो , अगर तुम्हारा स्वाद खो गया तो उसे किससे नमकीन किया जाएगा ? आदमी में यही नामक , '' प्रेम '' है .....इसको उचाई चाहिए ......... आपको मेरे ब्लॉग पर आमंत्रण हैं |आपका अजय

के द्वारा: ajaykr ajaykr

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

तमन्ना जी , सर्वप्रथम प्यार की परिभाषा समझनी होगी ! विपरीत लिंगियों के यौनाकर्षण मात्र को आज प्यार कहा जाता है !यह है आज के तथा-कथित प्यार की परिभाषा ! जिस्मानी आकर्षण पात्र की मनोदशा पर निर्भर करता है वहाँ उम्र का कोई बंधन नहीं होता ! आज किसी खूबसूरत लड़की से गाहे-बगाहे पूरा मोहल्ला प्यार करने लगता है , उम्र को दरकिनार कर ! फिल्म मेरा नाम जोकर में राजेन्द्र कुमार राजकपूर जी से पूछते हैं ,क्या आप मीना से प्यार करते हैं ? ज़वाब मिलता है , हाँ मैं प्यार करता हूँ नदियों से / पहाड़ों से / पेड़ों से / पत्थरों से ! सच ही तो है प्यार तो प्यार है ! जहाँ भाव है समर्पण है ,खुद को मिटा देने का जज्बा है ! किसी शायर ने कहा है ............ किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार , किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार , जीना इसी का नाम है !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

आदरणीय तमन्ना जी, सादर ! ""दुनिया में व्यभिचारियों ने अपने नाजायज संबंधों को जायज ठहराने के लिए इसी तरह के अनेक गंभीर जुमलों व विचारों की तोड़-मरोड़ कर व्याख्या की है जिससे अनेक तरह के भ्रम फैले हैं. इस पर तुर्रा ये कि आज की नौजवान पीढ़ी इन सबको अपना आदर्श बना कर किसी भी सीमा को पार कर जाने पर उतारू है."" बिलकुल सही और सटीक व्याख्या की है आपने ! दरअसल इन बातों के पीछे छिपी भावनाएं महत्वपूर्ण होती हैं उनके शाब्दिक अर्थ नहीं ! "प्यार" शब्द माता के लिए, भाई के लिए, बहन के लिए, पत्नी के लिए, पिता के लिए, बुजुर्ग के लिए, देश के लिए आदि-आदि अनेक सन्दर्भों में प्रयुक्त किया जा सकता है, पर वर्तमान परिवेश में यह स्त्री-पुरुष के वासनात्मक सन्दर्भ में ही प्रायः देखा और समझा जाता है ! आपने सही कहा है की नजरिया बदलने की जरुरत है, शब्दों और वाक्यों को नहीं, बल्कि भावनाओं को समझना आवश्यक है ! बहुत बहुत धन्यवाद !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

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मेरा अनुभव !!! अगर मेरी आवाज सरकार तक पहुचे तो , मै यहीं सलाह देना चाहूँगा की दोनों अर्थात लड़के और लड़की की शादी की उम्र टीनेज में ही निर्धारित कर दी जानी चाहिए और मिनिमम उम्र १६ कर देनी चाहिए ....क्यूंकि यही उम्र होती है जिसमे कोई बच नहीं पाया । और कोई खुद को रोक नहीं पाता..। मुझे लगता है की इससे समाज में बहुत सारे सुधार होंगे और संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी. आइये जाने ये मशवरा कितना साही है .....? १- इस उम्र में लगभग सभी सिनिअर सेकंड्री के इर्द गिर्द रहते है । इस उम्र में शारीरिक एवं मानशिक विकाश चरम पे रहता है । २- इस अवस्था में सबसे ज्यादा किशोर एवं किशोरियां सेक्स के बारे में ज्यादा सोचती है। ३- अगर पेरेंट्स इस समय अपने पुत्र/पुत्री की शादी किसी से तय कर दें तो ९० परसेंट किशोर/किशोरियां गलत संगत से बच जाएँगी. कारण ये है की उस उम्र में पेरेंट्स जिस तरह से चाहेंगे और जैसा आप्सन देंगे वैसे बच्चों को स्वीकार हो जायेगा क्यूंकि ये उम्र ही वैसी है की बिपरीत लिंगी जैसा भी हो अच्छा लगता है। और पेरेंट्स ढूढेंगे तो सही ही ढूढेंगे । ४- जब बच्चों का दिमाग एक तरफ केन्द्रित हो जायेगा तो उसकी पढाई भी अच्छी होगी । ५- इस उम्र में जो फिक्स हो गया वो किसी और के तरफ ध्यान नहीं देता । और साथ साथ बच्चे अपने अति उत्तेजित अवस्था से बाहर आ जायेंगे उस उम्र की सीमा को पर कर जायेगें और उन्हें पता भी नहीं चलेगा । उसके बाद उनको शारीरिक आकर्षण जो होता है विपरीत लिंगी के तरफ वो बहुत कम हो जायेगा। इससे समाज में दुराचार भी ९८ परसेंट कम हो जायेगा। ६- आज हो रहे समाज में दुराचार रेप के पीछे एक ही कारण है | उदाहरण के तौर पर- कोई खूब भूखा, कई दिनों से उसको खाने नहीं दिया जा रहा , अचानक उसको मौका मिलता है खाने का तो वह कुत्ते और गीधों की तरह नोच-नोच के खायेगा क्यूंकि वह भूखा है । ठीक उसी तरह सामाजिक बंधनों की वजह से लोगों को वह सब नहीं मिल पाता जिसकी जरुरत प्रकृति पैदा करती है उम्र के अनुसार । जैसे ही लोगों को मौका मिलता है दुराचार को अंजाम दे देतें है... ७- आज के बच्चे ही कल के दुराचारी होते है ......इस लिए हमें जरुरत है इस बात पर गौर करने की . ८- शादी शुदा लोगों के तरफ बहुत कम लोग ध्यान देते है । और जब सभी शादी शुदा नजर आएंगे तो किसी की ध्यान उस तरह से नहीं जाएगी जिस तरह से किशोरियों पे जाती है...। हाँ हर चीज का एक साइड इफेक्ट होता है ...उन बातों के लिए कड़े कानून बनाया जा सकता है जैसे - १- जनसँख्या बृद्धि। इस पर रोक लगाने की लिए सरकार कोई कदम उठाये... और भी इसके साइड इफेक्ट हो सकते है... फ़िलहाल इतना ही ... धन्यबाद !!! अमित देहाती

के द्वारा:

तमन्ना जी आपने इस विषय को बहुत ब्यापक तौर से समझा और लिखा है मैं आपके विचारो से पूर्णतया सहमत हूँ और इसमें एक बात और जोड़ना चाहूँगा वह यह की जब आज हमारे देश में महिलाओं को समान अधिकार देने की बात की जा रही है और हमारा समाज कमो बेश इस पर अपनी रजा मंदी दिखा भी रहा है ऐसे में महिलाओं के लिए कोई विशेस प्रावधान की जरुरत नहीं रही हाँ गाँव में अभी हमारा समाज काफी पिछड़ा है और वहां नाबालिगो पर अब भी अत्याचार होते रहते हैं जरुरत है सिक्छा को गाँव गाँव तक पहुचाने की आपने पुरुष पक्छ को भी न्याय दिया है इसके लिए धन्यवाद महिलाओं को और सशक्त होने की जरुरत है और उनका आत्म निर्भर होना आज की जरुरत है और इसी से उनपर होनेवाले अत्याचार का खात्मा हो सकता है अंत में एक अच्छा लेख लिखने और जागरण द्वार सर्वश्रेस्ट ब्लाग घोषित किये जाने के लिए आपको बधाई

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: satish3840 satish3840

जागरण समूह ने आपको बेस्ट ब्लागर के सम्मान से नवाजा है यह आपके लिए बहुत सम्मान की बात है पर मैं आपके इस लेख से यही जान पाया हू की समस्यायों को उजागर करने वाले बहुत सारे लेखक हैं उन में से आप भी एक हैं इसमें संदेह नहीं भीखारी होना एक कलंक के सामान है और उनको सभी घृणा की नजर से ही देखते हैं और दुत्कारते भी हैं कई मामलों में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है की एक हठ्ठा कठ्ठा आदमी ,बच्चा , औरत या लड़की भी भेख मांग रहे हैं क्या उनको देखकर कोई उन्हें सच मुच किस्मत का मारा कहेंगे जरुर उनको पेशेवर भिखारी ही कहेंगे और जरुर भीख मांगना एक अभिशाप है पर इस समस्या का समधान क्या है? क्या सर्कार ही इस समस्या को दूर कर सकती है क्या ऐसा कोई संगठन नहीं बन सकता जो ऐसे लोगों के कल्याण का काम करे अगर लिखना ही है तो लेखन के माध्यम से ऐसे लोगों का आह्वान कीजिये जो इस सामाजिक बुराई के लिए आगे बढ़कर कुछ करें अतः बुरा न मानियेगा मैं तो यही जनता हूँ समस्याएं अनेको हैं समधान की जरुरत है और उसके लिए कुछ लिखा जाये कुछ किया जाये तो बेहतर लेखन कहा जायेगा मेरी राय में धन्यवाद

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

आदरणीय राजकमल जी........सादर अभिवादन... हमें अच्छा लगा...आपका इस तरह से हम से मुखातिब होना..... होना भी चाहिए.....ये आपका बड़प्पन है.....अगर यही नजरिया उस वक़्त आपने अख्तियार किया होता तो बात इतनी आगे कभी भी ना जाती.....ख़ैर...पुरानी बातों को याद ना करना ही बेहतर है..... हम आपको बताना चाहेंगे कि ये संबोधन किसी दुर्भावना या दुराग्रह से प्रेरित नहीं है....हम अपने से छोटों या खासकर शरारती बच्चों के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं....और तमन्ना जी तो हमारी छोटी बहन जैसी हैं.....अपने बच्चों की भांति...ही शरारती...जिद्दी...इनके किसी भी ब्लॉग पर आना.....मतलब वाद-विवाद.....आप इनकी कोई भी पुरानी रचना देख लीजिये....देखिये किस पर विवाद नहीं हुआ....? इसलिए हम बहुत कम आते हैं इन के ब्लॉग पर....और तो और हम ने तो इन से ना बहस करने की कसम भी खाई हुई है....हमें नाम तो याद नहीं लेकिन कांग्रेस के बारे में थी कोई पोस्ट जब हमारी बहस हुई थी तमन्ना जी के साथ....आप देख सकते हैं.....आप हमारा कमेन्ट भी तो देख चुके हैं....कैसा है? विवादित है क्या...? तमन्ना जी ने खुद एक बार हम से कहा था....'आपको टॉर्चर करने के लिए जल्दी ही एक पोस्ट लेकर आ रहे हैं..' तो प्रभु हम ने इनके ब्लॉग पर आना ही छोड़ दिया....कहीं फिर कोई बहस ना हो जाये.......लेकिन इस पोस्ट पर लिखने से अपने आप को रोक नहीं पाए...क्योंकि सच्चाई के बहुत करीब है ये पोस्ट.....फिर भी पूर्णतया संतुलित और इन्ही की भाषा में हम ने कमेन्ट दिया.....फिर प्रभु बताइए...कहाँ तक सही और कहाँ तक गलत हैं हम.... क्षमा चाहेंगे.....देरी से जवाब देने के लिए....किन्तु प्रभु....उस विवाद के बाद हम ने अपनी आदत बदल ली है...क्योंकि कमेन्ट देकर फिर उसको देखने जाना बहुत महंगा साबित होता है...आप तो अच्छी तरह से जानते हैं.....इसलिए हम २३ तारीख के बाद आज ही इस पोस्ट पर आये थे...सिर्फ बेस्ट ब्लोगर की बधाई देने के लिए...तभी आपके इस कमेन्ट का पता चला.....क्षमा प्रार्थी हैं..... आपका बात करने का ये अंदाज़ भी अच्छा लगा....ना आपका ब्लॉग ना हमारा ब्लॉग (वो तो है ही नहीं) तमन्ना जी भी क्या याद रखेंगी.........दो विपरीत ध्रुवों का मिलन जो हुआ है उनके ब्लॉग पर... उम्मीद करते हैं आपकी शंकाओं का समाधान हो गया होगा.......... एक बात.......हमारी तरफ से आप बे-फ़िक्र रहिये....मर्यादा में रहना किसको कहते हैं...ये हमें भली प्रकार मालूम है.....फिर भी.... आपकी सतर्कता के लिए बधाई आपको.....और हाँ...हमें भी अच्छा लगा...कि कोई तो है...जो हम पर निगाह रखे हुए है.....भरोसा है....अगर कदम डगमगाए तो आप साथ हैं.......कि नहीं....????? आपका हार्दिक धन्यवाद.......

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

तमन्ना जी, भीख मांगना निश्चित रूप से एक समाज राष्ट्र के लिए कलंक है किन्तु फिर भी इतना अवश्य कहूँगा कि आजकल भीख मांगना मजबूरी कम की पेशा ज्यादातर का है!! मैं चूंकि घूमता अधिक रहता हूँ अतः पचासों उदहारण मैंने देखे हैं, कुछ बताना चाहूँगा| एक औरत को गाज़ियाबाद स्टेशन पर एक आदमी 2 रुपये भीख देता है तो वही औरत जो 1 मिनट पहले रिरिया रही थी 2 का सिक्का उसके मुंह पर मार देती है,... स्पष्ट करना चाहूँगा कि वास्तव मे मार देती है यह कहते हुए शर्म नहीं आती तेरे को 2 रुपए देते हुए.... 10 तेरे को देती हूँ। बदायूं मे एक भिखारी के बारे मे पता चला कि उसके 2 बेटे 1 बेटी मे बेटी मेडिकल और बेटा इंजीन्यरिंग पढ़ रहा है छोटा निचली कक्षा मे!! लखनऊ मे भिखारी मर गया तो पास से पुलिस को 2.5 लाख रुपए फटे कपड़ों से मिले। गाज़ियाबाद मे हापुड़ रोड पर कुछ गाँव हैं जहां लोग अपने बच्चों को सुबह सुबह भीख के धन्धे पर भेज देते हैं और शाम तक हर एक बच्चा ५०० से 1000 तक ले आता है। दिल्ली मे आप आसानी से ऐसे भिखारियों को देख सकते हैं जो 1-2 रुपये देने पर सीधे गाली देते हैं। धार्मिक स्थानों पर अधिकतर पेशेवर भिखारी ही होते हैं एक मेहनतकश मजदूर से पूंछिएगा तो बताएगा कि शाम तक कितना ये लोग झाड लेते हैं.... आप भी एक प्रयोग करके देखिएगा किसी भिखारी से बोलिए चलो काम दिलाते हैं फिर देखना..... मेरे कहने का आशय यह बिलकुल भी नहीं है कि यहाँ गरीब नहीं हैं.... किन्तु गरीब अधिकांश मजदूरी करते रिक्शा चलाते मिलेगा..!!! कुछ विवश बेचारे भीख मांगने पर मजबूर होते हैं तो धन्धे के बींच असली जरूरतमंद की पहचान बहुत मुश्किल है। बांग्लादेशी घुसपैठियों ने तो सबसे ज्यादा भीख मांगने को ही पेशा बना के रखा है क्योंकि भारत मे इसका बड़ा स्कोप है। जब तक इन धंधेबाजों पर लगाम नहीं लगेगी असली जरूरतमंद गरीबी मे मरते रहेंगे और उस खबर का फिर धंधेबाज भिखारी लाभ उठाते रहेंगे,.... ब्लॉगर ऑफ थे वीक बनने पर हार्दिक बधाई।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

हम हर प्रकार के विषयों पर सोचते तो हैं परन्तु हमारी समस्या यह है कि हम समस्या की तह तक जाकर उसके निराकरण के बारे में नहीं सोचते हैं . सरकार या जनमानस को कोसकर क्या हम किसी समस्या का समाधान कर सकते हैं? वास्तविकता यह है कि हमें उपाय सुझाने होंगे. यक़ीनन सत्य यह है कि भिक्षावृत्ति से निपटने का तरीका यह है कि भिछुकों को हरसंभव रोजगार करने के लिए प्रेरित किया जाये . व्यक्तिगत एवं सरकारी स्तर पर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयास होने चाहिए . कई बार हम पाते हैं कि भिखारियों से यदि काम करने को कहा जाये तो वे हँस कर टाल जाते हैं या किसी और कि तरफ मुड़ जाते हैं .इसका कारण क्या हो सकता है ? क्या वे आत्मसम्मान कि कीमत पर अकर्मण्य हो गए हैं ? क्या वे काम नहीं करना चाहते हैं या उन्होंने परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया है ? उन्हें हाथ फैलाना काम करने से आसान लगता है ? यदि नहीं तब तो समस्या का निदान फिर भी आसान है उन्हें सरकारी तंत्र किसी प्रकार जागृत हो कर काम दे सकता है . परन्तु समस्या तो तब भयावह है जब इन अनेक प्रश्नों के उत्तर हाँ हैं . तब तो उन्हें आत्मसम्मान कि कीमत समझानी पड़ेगी. ये कौन कर सकता है ? जहाँ तक मैं समझती हूँ अधिकांश व्यक्ति प्रयास करते हैं लेकिन सफल नहीं हो पाते हैं . फिर तो इनका पता लगाकर इनके पास जाकर रोजगार देना होगा . एक महिला को तो शायद अधिकांश परिवार रोजगार दे सकते हैं. पुरुष अन्य मजदूरों की तरह कम से कम मजदूरी कर सकते हैं . रही बात वृद्धों और अपाहिजों की तो उनके लिए सरकार वृद्धाश्रम के द्वार खोल सकती है. अपाहिजों के लिए अवश्य किसी प्रकार का प्रबंध सरकार को करना होगा. बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा के लाभ के साथ आवास की सुविधा भी उपलब्ध करानी होगी. जो अनाज सड़कों पर सड़ रहा है, जिसे रखने की समुचित व्यवस्था नहीं है उसे इन भिखारियों में बंटवाना होगा. हम भिखारियों के साथ उन कर्मठ गरीबों की अवहेलना नहीं करना चाहते जो मजदूर हैं, रिक्शा चलाते हैं , जो लोगों के घरों में बर्तन धोकर अपनी जीविका चलाती हैं .और रात के अंधेरों में फुटपाथ पर सो जाते हैं . इस कर्मठता को मेरा प्रणाम है . मैं तो यही चाहूंगी की हमारे देश से भिक्षावृत्ति समूल नष्ट हो जाये. आइये हम संकल्प करें की इस दिशा में आवश्यक कदम जरुर उठाएंगे . चल पड़े जिधर दो डग-मग चल पड़े कोटि पग उसी ओर.

के द्वारा:

तमन्ना जी, नमस्कार सर्वप्रथम ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने के लिए बधाई !! "जो सोना पड़े कभी सड़क किनारे खुले आसमां के नीचे तो पता चले सर्द हवाओं का दर्द " भिक्षावृति के लिए हम सारे भीख माँगने वालों को दोषी नहीं ठहरा सकते | बहुत हद तक इसके लिए हमारा समाज और हमारी सरकार इसके लिए दोषी है | भिक्षावृति को कम करने के लिए कारगर कदम उठाए जाने चाहिए और कुछ ऐसे उपाय अपनाए जाने चाहिए जिनसे उनकी स्थिति सुधरे और उन्हें भीख माँगने की जरुरत न महसूस हो | अक्सर हम इस मुद्दे पर कुछ अच्छी बातें लिखकर या फिर सोचकर बैठ जाते हैं और हमें लगता है कि हमने अपना फर्ज पूरा कर लिया | हम चाहें तो मिलकर कुछ कर सकते हैं | आखिर सोचिए क्या हम (कहने का तात्पर्य 'समाज' से है ) अपने स्तर पे कुछ नहीं कर सकते ,,,,,, कुछ तो जरुर कर सकते हैं ,,,,, सुन्दर लेख !!!!!!!

के द्वारा: shivnathkumar shivnathkumar

आपने जो लिखा है वह छोटा मूह और बड़ी बात जबही है | तमन्न्जी अगर आप रामदेवजी की जगह होती तो क्या करती | आप से अच्छी तो राजबाला ही थी जिसने रामदेवजी के शांतिपूर्वक अन्धोलन के लिए अपना बलिदान दे दिया | आप के लिए तो रामदेवजी गायब हो गए जब की भारत सरकार उन्हें हेलिकोप्टर में बिठा हरद्वार ले गई | रामदेवजी के समर्थकों अब भी उनके साथ हैं | कायर लोग तो अपने आपको छूपा कर कुछ भी लिख देते हैं | परदे के पीछे कैसे स्वार्थी लोग होते हैं आप भलीभांति जानती हैं | रामदेव के मुंह पर काली स्याही फैंकनेवाले ने तो अपना मूह काला किया आप उस कालिख में कयूं भागीदारी करनी चाहती हैं | यह जनता की आवाज नहीं अपितु सोची समझी हरकत थी | मुझे तो आपका लिखा ब्लॉग भी दुराग्रह और पूर्वाग्रह का आभास दे रहा है | समाज सुधारकों की आवश्यकता हमेशा रही है और रहेगी | आप जैसे लेखक तो भगत सिंह, सुभाष के खिलाफ भी उल्टा-पुल्टा लिख सकते हैं | कौन से लम्बे समय से होने वाले अन्याय और अत्याचारों का जवाब आप रामदेवजी से चाहती हैं | रामदेवजी हमारे दिलों में रहते हैं और बहुत पहले से ही लोकप्रिय हैं, नहीं तो सोनियाजी के तीन बन्दर कयूं एयरपोर्ट पर सर निवाने जाते | दर्शन शर्मा

के द्वारा: aryasanskritikendra aryasanskritikendra

नमस्कार, तमन्ना जी आप का लेख बहोत ही अच्छा है,इसके लिए आप को बहोत बहोत बधाई हो.आप भिखारी की बात कर रही है तो ये तो सही बात है की भिखारियों का कुनबा है ओ हमारी सर्कार की लापरवाही की देन है.आप की बात सही है लेकिन कुछ लोग मजबूरी में भिखारी बनाते है,कुछ लोगो का ये पेसा है उन्हे भीख मागने की आदत सी हो गयी है वे काम नहीं करना चाहते है.और हमारे समाज में भीख माफिया भी तो है जो बच्चो से भीख मगवाते है.आप ये सही कह रही है की भीख मागने पर कितने लोग दुत्ताकर कर कहते है की जा कर कोई कम क्यों नहीं कर लेते हो ?तो कितने लोग खरी खोटी सुनते है.इसी जगह पर कोई नहीं कह सकता है,चलो मै तुम्हे काम दिलाता हूँ.लेकिन मै ये बात कहता हूँ.आप को मै बता दू की मै कही किसी कम से जा रहा था.मै बस पर बैठा तो पता चला की बस में अभी टाइम है तो मै टाइम पास करने के लिए निचे उतर गया और बगल में एक चाय की दुकान पर पेपर पढ़ने लगा तभी एक नौजवान भिखारी आकार मेरे आगे हाथ फैलाकर भीख मागने लगा,मै उसे देखा और एक तक देखते रह गया.मै उसे कहा की तुम तो अभी जवान हो भूढ़े भी नहीं हो,तुम मेरे साथ चलो मै तुममे काम काम दिलाता हूँ.इस पर ओ मुझे एसा जवाब दिया की मै उसे कभी नहीं भूल सकता हूँ. ओ बोला मेरे ऊपर गुस्सा हो कर की फालतू बाते मत करो भीख देना है तो दो.ये कहा कर ओ तुरंत चल दिया और मै उसे देखता रह गया और यही सोच रहा था की भिखारी एसे भी होते है.अब आप बताईये एसे लोगो को आप क्या कहेगी.मुझे जो भी भिखारी मिलाता है मै यही बात कहता जवाब में कोई कुछ कहता है तो कोई बोलता ही नहीं है.मै मनाता हु की बहोत लोग लाचार होकर भीख मागते है,लेकिन जो आदमी ओ इसके जगह पर ये भी तो कह सकता है की मुझे कोई काम दिलादो मै कोई भी काम करुगा.तमन्ना जी अगर काम खोजा जय तो काम की कमी नहीं है बस करने वाला चाहिए.हा ओ बात अलग है की जो अपांग है,बूढ़ा है,अँधा है उसे भीख दे देना चाहिए.मै गाडी में देखा हु की अंधे भी कुछ न कुछ बेचते रहते है.औए सही लोग भीख मागे तो गलत है की नहीं.

के द्वारा:

तमन्ना जी नमन आपके ब्लॉग पर आने का समय ही नहीं मिला और आपको प्रतिक्रिया भी नहीं दे पाया हाँ में आपकी रचनाएँ पढता था और प्रतिक्रिया इसलिए नहीं कर पाया था क्योंकि मुझे समय नहीं मिल पाया क्योंकि मुझे स्कूल से आकर homework करना पढता था और फिर उसके बाद tution भी जाना पढता था आप तो जानती होंगी की दसवी कक्षा में बहुत मेहनत करनी होती है तो में पढाई में ही लगा था और आलेख भी नहीं लिखता था तो अब जरा छुट्टी में हूँ तो आपके ब्लॉग पर आने का समय मिला है आपने भिक्षाव्रती पर इस आलेख के द्वारा चोट करने का बढ़िया प्रयास किया है इस लेख में सरल सरस व्यंग्य है और गद्य की विवेचनात्मक करती है और इस लेख के द्वारा सर्कार को ध्यान देना चाहिए और खोजना चाहिए की भिक्षाव्रती कहाँ कहाँ पर हो रही है और उन्हें खोजकर मदद करनी चाहिए विचारणीय आलेख और बेहद विवेचनात्मक कृति बढ़िया और सटीक लेख बधाई लें धन्यवाद अजय पाण्डेय

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

तमन्ना जी, सबसे पहले तो एक सार्थक लेख लिखने के लिए बधाई आप कि बात से पूरी तरह सहमत हूँ मगर मैंने कई बार जब कोई सक्षम या कहे हष्ट पुष्ट इंसान को भीख मांगते हुए देखा है और कहा है कि पहले मेरा ये काम कर दो उसके बदले कुछ दूंगी मगर वो अनाप शनाप बकते हुए चला जाता है हमारे इधर एक कहावत कही जाती है जिसे मिले यूँ खेती करे क्यूँ यानि जब बैठे बिठाये लोग कुछ दे देते है तो इनको कामकरने से परेहज हो जाता है | जरूरत मंद को कभी खाली नहीं भेजा मगर जो मेहनत कर के खा सकता है उसे कभी दिया भी नहीं है | सरकार इनके लिए कुछ करे ये सोचना बेमानी बात है क्यूँ कि सरकार के पास मुद्दे के रूप मे कार्टून विवाद ही बचा है |

के द्वारा:

आदरणीय हरीबोल जी आप पशुओं की भाषा में बहुत पारंगत हैं,  शायद आपका पूर्व  जन्म में विश्वास है। अरे पूर्व  जन्म को छोड़ियें यहाँ कोई पूर्व  जन्म में विश्वास नहीं करता, मैं तो विल्कुल  ही नहीं। आप पूर्वजन्म में क्या थे। इसे भूल  जाइये। इस   जन्म में इंसान हैं और इंसान  बनकर रहिये। क्योंकि यहाँ सभी को आपकी जरूरत है क्योंकि आप काई तरह की भाषाओं में पारंगत  हैं। मेढ़क , कुत्ता, गधा आदि। यह कला ईश्वरीय कृपा के बिना नहीं मिलती।  जहाँ तक  पागल पन का सवाल  है तो सभी में कुछ  न कुछ  लक्षण   पागलपन के पाये जाते हैं। दस  पागलों में एक  पागल  इतना महान होता है कि उसके सामने सारी दुनिया बोनी लगने लगती है। ईसा मसीह, सुकरात, मीरा बाई, कबीर, सूरदास, सुकरात  आर्कमिटीज महात्मा गाँधी, भगत  सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, मजनूँ, चाणक्य आदि  पगल  ही तो थे। यदि हम  इन्हें पागलखाने में भरती कर देते तो मानवता का कितना अहित होता। शायद आपने कल्पना नहीं की होगी।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आर्थिक परिबल ही ऐसी करवट ले रहे हैं की भीक मांगनेवालों की तादाद बढेगी । नौकरी नही मिलती या काम धन्धा नही चलता तो कोइ भूख से कब तक निबटेगा । चोरी करना अपराध, भीक मांगना अपराध, आदमी करे तो क्या करे, मरे ? मरना भी अपराध है । खून के अपराध से ये दोनो अपराध छोटे हैं । अपने को जिन्दा रखने के आदनी ये अपराध करेगा । आर्थिक परिबल के सामने समाज का कुछ नही चलता । एक आदमी दूसरों को मदद रहता है तो वो खूद एक दिन मदद लेनेवालों की कतार में खडा हो जाता है । भारतिय धर्मों में शायाद ईसी कारण से दया दान और भिक्षा महत्व दिया गया था । ताकी भूक के ही कारण कोइ अपराधी न बने या मरे नही । सक्षम लोग दान करे और उस दान से गरिब अपना जीवन जी सके । भीक मांगना अपराध है ऐसा कानून ही गैर कानूनी है । ये कानून उठया गया है योरोप से जहां खिखारी होते ही नही है । वहा की सरकार ही गरिबों के खाने पिनेका प्रबन्ध करती है । यहां तो अनाज सड जायेगा लेकिन, कोर्ट की फटकार के बावजूद भी अनाज गरिबों तक नही पहुचता । लेकिन फॅशन मारनी है विदेशी कानून की । आप ने बहुत ही सार्थक बात लिखी है ईस लेख में । आप अपनी जगह बिलकूल सही है । मेरी बात अलग हो तो वो मेरी बात है । आप की कोइ बात नकारने की कोइ बात नही है । -

के द्वारा: bharodiya bharodiya

तमन्ना जी, सही तो यह है कि आपको हर गलत बात को सही ढंग से कहने की आदत है और वो भी शायद नहीं यक़ीनन. ठीक है आप अकेले दम पर नहीं कर सकती है , पर अपना बेशकीमती समय निकालकर अपने आस-पास के भिखारियों के सुख और दुःख में बैठ सकती है न. तो करिए न क्यों अपने भावनाओं और संवेदनाओं को बेचकर अपने सपनों का महल खड़ा करना चाहती है. अब आप इस पर सफाई मत दीजियेगा....इंसान दूसरों को धोखा दे सकता है पर खुद को नहीं और जो खुद को धोखा नहीं दे सकता, वो खुदा को धोखा नहीं दे सकता और जो खुदा को धोखा नहीं दे सकता वो अलीन को धोखा नहीं दे सकता. लगता है कुछ जटिल बात कर दिया हूँ जिसपर आपके चिंतन करने से आपका बेशकीमती समय बर्वाद होगा. अतः चलिए कुछ आसान कर देता हूँ. एक आदमी एक समय में एक या बहुत समय में बहुत लोगों को मुर्ख बना सकता है परन्तु हरेक समय हरेक व्यक्ति को मुर्ख नहीं बना सकता.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

हमारे समाज की विडंबना ही यही है कि जब-जब भारत की राजनीति असफल साबित हुई है उसकी असफलता को आम जनता को ही ढोना पड़ा है. भिक्षावृत्ति एक अपराध, यह वे पंक्तियां हैं जो कभी पोस्टरों तो कभी विज्ञापनों द्वारा अकसर दिखाई दे जाती हैं, इन पंक्तियों को पढ़कर हम भिखारियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि हमारी घृणा का वास्तविक हकदार आखिर है कौन, वो जो अपनी भूख मिटाने के लिए 1-1 रुपए के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाते हैं, धूप, बारिश, तूफान हर मौसम में आसमान को ही अपनी छत समझकर रहते हैं, कूड़े के ढेर से खाने का सामान एकत्रित कर खाते हैं या फिर वो लोग जो इनकी ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार हैं? आदरणीय तमन्ना जी , सादर नमस्कार ! आपने सही विषय पर सटीक लेखन दिया है ! आपने कहा है की भिक्षव्रती को रोकने की जिम्मेदारी सरकार की है ! मानता हूँ ! अब ज़रा हट के बात करते हैं - मैंने कई साल पहले पढ़ा था की एक भिखारिन बुधिया जब मरी तो उसकी पोटली ( जिसे वो हमेशा अपने साथ रखती थी ) से 13 लाख रुपये मिले ! एक और उदहारण लीजिये - जून 1999 की मनोहर कहानिया उठाइए , उसमें एक कथा है ! एक साहब मुंबई में , मारुती 800 से स्टेशन आते थे , गाडी पार्क करी और suited -buited होकर ट्रेन में चढाते और पूरे दिन जेब काटते थे , शाम को क्योंकि भीड़ ज्यादा होती थी , वेश बदलकर स्टेशन के बाहर ही भीख मांगते थे ! मारुती ८०० का जिक्र इसलिए किया क्योंकि उस वक्त ये बड़ी बात थी ! तो ऐसे भिखारियों को भी consider करना पड़ेगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

फॉली जी... आपको हर सीधी बात गलत ढंग से कहने की शायद आदत है. और आदतें बहुत जल्दी पीछा भी नहीं छोड़ती.. आपको हार्दिक शुभकामनाएं की आपने अलीन जी को अपनी मानसिकता से प्रभावित कर दिया है. खैर अब तो मुझे आपकी किसी बात का बुरा लगना भी बंद हो गया है इसीलिए अब आपका कमेंट पढ़कर मुझे कुछ सोचने की जरूरत भी नहीं पड़ती. मैंने सीधी सी बात लिखी, इस उद्देश्य से की शायद जैसे कन्या भ्रूण हत्या औरदहेज हत्या पर सरकार की नींद खुली है तो शायद आज नहीं तो कल उन्हें भिक्षावृत्ति पर भी अपनी कृपा दृष्टि पड़ जाए. मेरी नजर में भीख मांगने वाले भी इंसान है और मैं कभी किसी असहाय व्यक्ति की निंदा नहीं कर सकती. मैं अभी इतनी सक्षम नहीं हूं कि अकेले अपने दम पर इनके लिए कुछ नहीं कर सकती. लेकिन जिन लोगों को हमने वोट देकर सत्ता पर बैठाया है उनका यह कर्तव्य है कि वहब उनके लिए कुछ करें. मेरे एक-दो रुपए से भिख मांगने वालों का जीवन नहीं सुधरने वाला. लेकिन अब जब आप लोगों को हर बात गलत तरीके से ही लेनी है तो यह आपकी और मिस्टर अलीन जी की सोच है..... लेख को अपना समय देने के लिए धन्यवाद

के द्वारा: Tamanna Tamanna

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय तमन्ना जी सर्वप्रथम तो हमें भिखारी शब्द की सही परिभाषा परिष्कृत करना होगी। भिक्षावृति जीवन यापन का सबसे अंतिम  सोपान होना चाहिये। शारीरिक निष्क्रियता एवं मानसिक  अक्षमता इसकी प्रथम योग्यता होनी चाहिये। रोजगार की अनुपलब्धता भी एक  कारण  हो सकता है। इसके अतिरिक्त जो भी भीख  माँगते हैं वे अपराधी की श्रेणी में आना चाहिये। फिर तो सभी नेताओं को जेल  का  निवासी  होना चाहिये। हम आप भी इस अपराध से नहीं बचे रह सकते। कौन  भिखारी नहीं है बताइये, सब एक  दूसरे से माँग  रहे हैं, जोमाँगने की कला मैं निपुण  नहीं हैं, वे छीन रहे हैं। वह तो माँगने से भी बड़ा अपराध  है।  कल  जिसे हम  अपराध  समझते थे, आज  वह इस अर्थ  युग में व्यापार बन गया है। मैं किसी शारीरिक  रूप से सपन्न व्यक्ति को भिक्षा नहीं देता, और  उनसे कहता हूँ कि "भाई मेहनत  करो, कोई काम करो।कुछ  करके दिखाओ।" लेकिन  उनका उत्तर मुझे निरुत्तर कर देता है। "भाई भीख  माँगना भी एक  काम  है, मेहनत का, साहस  का। आप भीख  माँगके दिखा दो। सारे दिन धूप में घूमते हैं, लोगों के ताने सुनते हैं।"

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय तमन्ना जी, नमस्कार हर सिक्के के दो पहलु होते है पहला आपने दिखाया जिसमें कोई संदेह नहीं और किया भी नहीं जाना चाहिय क्यूंकि अपनी मर्जी से वास्तव में कोई भीख मांगने का काम नहीं करेगा............किन्तु इस तथ्य का दुसरा पहलु यह है की आज यह एक ट्रेंड के रूप में उभरा है जहाँ इसे एक आसान जरिया बना लिया गया है............इस तथ्य को समझने के लिए हमें ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है कभी गौर से देखिएगा समझ में आ जाएगा की भीख मांगने वालों में कितने असली हैं और कितने बनावटी..........फिर भी इसबात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की बच्चों को जबरन यहाँ भीख मंगाया जा रहा है जिसका की विरोध होना चाहिए .......बहुत ही सुन्दर आपकी पिछली पोस्ट भी पढ़ी थी किन्तु समझ नहीं पाया की गाँधी जी का विरोध करूँ की आपके कथनों का क्यूंकि आपके भी तर्क अपनी जगह बिलकुल सही लग रहें थे ...............पर गांधीजी को........अभी भी समझ नहीं पाया हूँ क्षमा करें

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: sinsera sinsera

अदरणीय तमन्ना जी, .....अपने लेख तो बड़ा लम्बा-चौड़ा लिखा है....लेकिन मेरे कुछ मित्र जो की भिखारी है उनका कुछ प्रश्न है आपके लिए, जो मैं आपसे उनके बदले पुछना चाहता हूँ......1.अपने इस लेख को लिखने के अलावा अब तक क्या कुछ किया है भिखारियों के लिए......? 2. आप ख़ुद को क्या मानती है राजा या भिखारी......?  3. उन लोग जो मंदिर, मस्जिद और जिरजा में हाथ फैलाए हुए है क्या मानती है.....वो क्या हैं आपकी नज़र मे......भिखारी या सम्राट....... 4. क्या आपकी सभी माँगें समाप्त हो चुकी है.......? और अगर आपके हिसाब से सड़क पर रहने वाले लोग दुखी हैं...दया के पत्र.....तो इसका अर्थ ये हुआ की जो अच्छे घरों मे राहतें है उनको अच्छी नींद आती है.....वो सूखी है....... अपने जो अपने इस अतरंगी लेख से भिखमंगों का मज़ाक उड़ाया है वो अत्यंत ही निंदनीय है......अगर आपको अपनी महानता और बैभव का ही प्रदर्शन करना था तो उसके अनेक रसतें है....इस तरह समाज के किसी खास वर्ग को नीच और दयनीय दिखा कर ख़ुद को महान सवित करना कहाँ तक उचित है........ मुझे समझ नहीं आता है कि लोग भिखमंगों को लेकर इतनी राजनीति क्यों करतें है......

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

तमन्नजी नमस्कार गान्धी भारत आने से पहले अफ्रिका में रहते हुए लोकप्रिय हो गये थे । तभी तो वो जब भारत आये तब मुम्बई बन्दरगाह पर लोगों का मजमा लग गया था उनका स्वागत के लिए । लोकप्रिय होने की सोच नीचले दरजे के नेता रख सकते हैं, गान्धी नही । आप को पता होना चाहिए की बीना धन के कोइ काम कोइ युग में नही हुआ है, न हो सकता है । गान्धी को गुड समजकर मख्खी जैसे उद्योगपति उनके आसपास मन्डराते रहे, गान्धी ने उन के धन को आजादी की जंग में लगा दिया क्या गलत किया । बाद में कोंग्रेस सरकार की जिम्मेदारी थी की उपकार की भावना से प्रेरित हो कर उस उद्योगपतियों को गलत सहकार न दें । कौन कहता है गान्धी अन्ग्रेजों भगाना चाहते थे । बिलकुल भगाना नही चाहते । भारत में आर्य, हूण, मुस्लिम ये सब आक्रमणकारी भारत आये और भारत के बनकर रह गए । अन्ग्रेज भी भारत के बनकर रह जाते । बस, राज करना छोड दें । मोतिलाल नेहरु, विठ्ठलभाई पटेल और जीन्ना । ये तीन बडे बडे वकिल और जीस सभा में भगत ने बम्ब छोडे उस सभा के सदस्य । वो तिनों जानते थे की आज बम्ब फुटेगा और कोइ मरनेवाला नही है । भगत के संगठन द्वारा पहले से ही बताया गया था । इन्डारेक्टली ये तीन भी साजीदार थे । इन का फर्ज था की वो भगत का केस लडे । नकली बम्ब की सजा मौत नही होती ये बात जरूर वो साबित कर देते । और गान्धी पर भी दबाव डाल सकते थे । लेकिन वो सब वकिल से ज्यादा पोलिटिशियन थे । और पोलिटिशियन का ऊंट किधर करवट ले कोइ नही जान सकता । क्या परिस्थियां रही होगी, क्या कारण रहा होगा वो सच्चाई कभी बाहर नही आएगी । सच्चाई एक ही सामने आई, भगत को फान्सी ।-

के द्वारा: bharodiya bharodiya

भरोडिया जी... इच्छा के आगे उम्र कोई मायनें नहीं रखती. गांधी जी हमेशा बड़े उद्योगपतियों से घिरे रहते थे. उनका रहना खाना सब आलीशान जगहों पर होता था. अहिंसा के सिद्धांत को उन्होंने हर जगह अपनाया. जहां हिंसा की ही जरूरत थी वहा भी अहिंसा को ही हथियार बनाया गया. यह साफप्रदर्शित करता है कि गांधी जी जनता में लोकप्रिय होना चाहते थे. उन्हें अंग्रेजों को भारत से भगाने में कोई रुचि नहीं थी. इसके विपरीत उम्र में छोटे ही सही क्रांतिकारी भगत सिंह हर दांव पेंच खेलकर भारत से अंग्रेजों को खदेड़ना चाहते थे. कभी कभार सही उद्देश्य को पाने और गलत इंसानों को सबक सिखाने के लिए हिंसा का सहारा लेना ही पड़ता है. गांधी जी के उद्देश्यों में भगत सिंह रुकावट पैदा कर रहे थे इसीलिए उनकी फांसी रुकवाने के लिए कोई काम नहीं किया गया.

के द्वारा: Tamanna Tamanna

तमन्ना जी मैं गान्घी समर्थक या असमर्थक नही हुं । जब आदमी बडा बन जाता है तो उन को कहां जाना कैसे जाना, कहां रूकना वो उन के आस पास के लोग तय करते हैं । बापूने कहा होगा मेरे लिए घोडागाडी लाओ । लोगोने समजाया की बापू घोडागाडी मे जाओगे तो शाम हो जाएगी, कार्यक्रम कब करेंगे । ठीक है, मोटर में ही बैठता हुं । बापू को मोटरमें बैठना मजबूरी थी । बापूने कहा होगा की मुझे एक कुटिया में ठहरना है । लोगोने समजाया, बापू हर जगह कुटिया नही होती और बनाने में समय लगता है । आप अकेले नेही हो, आप के साथ काफी लोग है । सब को सुविधा मिले ऐसे मकान मे ठहरना होगा । बापूने कहा ठीक है । ये भी मजबूरी ही थी । नेहरु की सोच आपने गान्धी पर डाल दी । गान्धी तो मशीन और बडे उध्योग के ही विरोध में थे । ये आने से हजारों कारीगर जो अपने ही घर में सामान बनाते हैं वो बेरोजगार हो जाते हैं । गान्घी को चरखा चलाने का शौक नही था । पर चलाया । ये साबित करना चाहते थे की आपका या आपके आसपास लोगों के चरखों से बना कपडा पहनों, मील का या विदेशी कपडा मत पहनों । गान्धीजी गावों मे रहे हुन्नर उद्योग को बढावा देना और बचाना चहते थे । पर उन्हें स्वतंत्र भारत में जीने का मौका नही मिला और नेहरुने उस पर पानी फेर दिया, बडे बडे उद्योग डलवा कर । और लायसन्स राज लागू कर दिया ताकी कोइ छोटा कारीगर उद्योगपति बनने की न सोचे । गान्धी अन्ग्रेज के मित्र थे ये बात सही है । आफ्रिका में अंगेजों और युरोप के दूसरे गोरे लोग अपना कबजा जमाने के लिये लडाई करते रहते थे । ऐसी ही एक लडाई,(बोर-युद्ध), जीस मे गान्धी खूद अन्ग्रेज की सेना में सैनिक बने थे । बन्दूक नही दी गई थी, लाशें उठाने का काम सौंपा गया था । ये बात किसी को खटकनी नही चाहिए क्यों की गान्धी उस समय २८ साल के नौजवान थे और भारत की आजाकी उसे सपने में भी नही आई थी । अहिन्सा की राह उन्हों ने जैन दर्शन से ली है । जैनों को कोइ शत्रु नही होता । आजादी की लडाई में अन्ग्रेज गान्धी के शत्रु नही थे । उन की नीति विरोधी थे, भारत में राज करने की नीति । वो नीति ही गान्धी को बदलनी थी । उस में खून खराबा करने की क्या जरूरत थी । गान्धी को ये डर था की भारतिय एक अन्ग्रेज मरेगा तो वो हथियार के बल पर सौ भारतिय को मारेंगे । गान्धी ही पहला विष्व मानव था जो आदमी आदमी में भेद नही करता था । भारतिय और अन्ग्रेज उनके लिये बराबर थे । इन मे से क्यों कोइ मरे । आपने भगत सिह की बात कही । वो तो छोटी उमर का नौजवान, जनूनी, अन्ग्रेज को देखते ही जीस की आंख लाल हो जाए । वो क्या जाने पून्जीवाद या और कोइ आर्थिक वाद । उस का तो एक ही वाद था, अंग्रेज को मार भगाओ । माओवादियों की तरह उस का कोइ भी प्लान नही था की अंग्रेज जाएंगे तो हम गद्दी पर बैठ जायेन्गे । ८० साल का बुढा गान्धी अपने से ५० साल छोटे, बच्चे जैसे भगत सिन्ह के वाद की परवाह नही कर सकते । भगत सिन्ह का हिन्सा का मार्ग गान्धी को पसन्द नही था । अगर वाकई में गान्धी मे क्षमता थी भगत को बचाने की और नही बचाया तो वो उन्की बडी भूल थी । क्षमता थी या नही ये जाने बिना दोष देना गलत है । .

के द्वारा: bharodiya bharodiya

तमन्ना जी, सादर अभिवादन, आपकी पोस्ट पढ़कर जाना कि जागरण मंच पर वार्तालाप की जगह काफी फितूरी उत्पात हुआ है और कुछ लोगों ने तो टिप्पड़ियो की जगह फब्तियों और छींटाकशी में ज्यादा मज़ा लिया है| मेरी राय में आप एक बहुत ही स्पष्टवादी और गंभीर ब्लॉगर हैं और कुछेक चुनिन्दा लोगों में हैं जिन्हें मैं पढना पसंद करता हूँ सिर्फ इसी वजह से मैं आपको एक सलाह देना चाहता हूँ कि आप किसी भी ऐसी कमेन्ट जो शरारत की मंशा से लिखी हो पर ध्यान ना देकर उसे मिटा दें| व्यर्थ की बातों पर ध्यान देंगी तो आपको कष्ट भी होगा और लेखन में भी मुश्किल आएगी| आशा है कि आप इतनी तुच्छ बातों पर अपना बहुमूल्य समय बर्बाद नहीं करेंगी| शुभकामनाओं सहित

के द्वारा: chaatak chaatak

 तमन्ना    ये बताओ भ्रष्टाचारी सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला (रामदेव जी ) अगर खुद भ्रष्टाचारी है तो जनता  का सेवक कौन है क्या बाटला हाउस में रहने वाले देश भक्त थे और मोहन चंद देशद्रोही  जिसे विरोध में उस आदमी  ने बाबा पर काली स्याही फेंकी  क्या बाबा ने ही उस मुठभेड़ का आदेश पुलिश को दिया था मोहतरमा न तो वो आदमी सनकी था और न ही वो इस देश की जनता की दबी हुई आवाज था  यकीन जानिए अगर मै उस जगह होता हो वो आदमी आज कब्रिस्तान में जमीन के अंदर सो रहा होता  मुझे बड़ा कष्ट हुआ आप जैसी सुन्दर सुशील बुदिमान युवती ऐसे आपति जनक कथन देशभक्तों के प्रति देती है  बड़ी आशा के साथ मैंने आपका पेज खोला था  पर आपके लेख पढ़ के मुझे निराशा हुई                 अब तो ये सोचना पड़ता है की क्या यही आदर्श भारतीय नारी के स्वरुप है   अगर यही नारी का असली रूप है तो भगवान से मेरी प्रार्थना है की ऐसी नारी न कभी मेरी माँ बहन मित्र पत्नी या कोई भी संबंधी हो     रही बात रामदेव के धन की तो वो राम देव को दिया गया जनता द्वारा दान है   अब साधू संतो को ये सेक्कुलर सरकार तो दान देगी नही क्योंकि मुसलमान नाराज़ हो जायेगा और आप जाकर रामदेव के साथ कुछ दिन प्रवास कीजिये आपको खुद पता चल जायेगा की बाबा इस पैसे से कितना आनंद उठा रहे है प्रातः ३ बजे जागना   सदैव धोती पहनना  चाहे कितनी भी ठण्ड हो अल्प भोजन व दूध मट्ठा पीकर जीवन जनता व देश को समर्पित कर देना   किसी साधारण पुरुष के लिए संभव नही             इतिहास पड़े आप तो पता चलेगा की अंग्रेजो के खिलाफ पहला आंदोलन इन्ही भगवा वेश धारी सन्यासियों ने ही शुरू किया था  और धोती व सलवार पहनने से कोई अगर कायर हो जाता है तो इस देश की कोई भी महिला वीरांगना नही है  और हम सब जानते है की इस देश में वीरांगनाओ की एक सतत श्रंखला चली आई है  अगर रामदेव जी ने भी स्त्री वस्त्र धारण किये तो  वे धन्य हो गए............ साधू और साध्वियों का कोई लिंग  और जात नही होती है रामदेवजी ने देश को स्वदेश प्रेम के लिए एकजुट किया है  हमारी देश की जनता की  गाढ़ी कमाई को विदेशो से वापस लाने को अपूर्व प्रयास किया है................. अगर इसमें आपको राजनीती दिखती है तो मुझे आपको भारतीय नारी कहने में संकोच है

के द्वारा:

ज्ञानेंद्र जी... मैंने यह बिल्कुल नहीं कहा कि सभी महात्मा धर्म को अर्थ से जोड-अते हैं, मैंने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि अगर धर्म के नाम पर पैसा कमाया जा रहा है तो यह कोई हैरानी का विषय नहीं होना चाहिए. विशेषकर आज के हालातों के अनुसार तो यह एक अच्छा व्यवसाय है. मैं बाबा को ठग या चमत्कारी इसीलिए नहीं कह सकती क्योंकि अभी तक मैंने व्यक्तिगततौर पर कभी उनका पाखंड या चमत्कार देखा नहीं है. और शायद कोई भी पुख्ता तौर पर उन्हें पाखंडी या चमत्कारी नहीं कह सकतें. बिना किसी को जाने किसी भी व्यक्ति के बारे में धारणा बना लेना पूरी तरह गलत है. मीडिया के ऊपर जागरुक करने और अंधविश्वास ना फैलाने का दायित्व है, पर मुझे ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई. इसीलिए मुझे लगता है मीडिया को पहले साक्ष्य तलाशने चाहिए और फिर उन्हें प्रचारित करना चाहिए.

के द्वारा: Tamanna Tamanna

आदरणीय सिंह साहब नमस्कार, वास्तव में बाबा का समागम गरीबों के लिए थोड़े ही है. वहां पैसे वाले और पढ़े-लिखे ही जाते हैं. उनकी श्रद्धा है, उनका विश्वास है. वह जब खुद ही लुटने को तैयार हैं तो दूसरों के पेट में ऐंठन क्यों हो रही है......? मिडिया का क्या... मिडिया को भी पैसा और प्रचार चाहिए. वह अपना काम कर रही है. नैतिकता का पाठ पढ़ के आज के युग में ऐशो-आराम तो मिल नहीं सकता तो वह जो कर रही है वह भी सही है. एक तरफ बाबा की फोटो दिखा कर पैसा वसूल रही है दूसरी तरफ उन्हीं को गरिया के. उन्हें तो बस एक मुद्दा चाहिए. कुछ गरमा-गर्म नहीं परोसेंगे तो जयका ख़राब नहीं हो जायेगा....... जनता भी सदा गरमा-गर्म ही चाहती है. इसलिए ही मैंने कहा कि कुछ लोग सियारों जैसे बेमतलब में हुआं-हुआं करने लगते हैं.

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

श्रीमान अजय दुबे जी, नमस्कार! ऊपर से नीचे तक पढ़ते पढ़ते मेरी नजर यहाँ ठहर गयी और लगा कि यही अपनी मुंडी घुसेड़ दूं! मैं अभी भी देख रहा हूँ कि जो मीडिया दिन भर निर्मल जीत सिंह नरूला की बघिया उघेड़ता रहता है वही शुबह शुबह निर्मल बाबा की शक्तियों का अहसास कराता है. अब कहने सुनने को क्या है. मीडिया के दोनों हाथ में लड्डू है. हाँ निर्मल बाबा को अभी तत्काल आर्थिक लाभ कम होने लगा है. पर अभी भी उनके कार्यक्रमों में भक्तों की भीड़ कम हुई है, ऐसा नहीं लगता! .... दरअसल ये बहुत जल्दी ऊपर पहुँच गए थे इसलिए नीचे भी गिरना ही था. आज के युग में हर ब्यक्ति बहुत ही जल्द बिना कुछ मिहनत किये बड़ा आदमी बन जाना चाहता है. दो हजार चंदा देनेवाला और अपनी आय का दस प्रतिशत जमा करनेवाला गरीब तो नहीं हो सकता!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

तमन्‍ना जी, पहली बात तो यह कि मैं धर्म को अर्थ कमाने का जरिया नहीं मानता, आज भी ऐसे संत और महात्‍मा है तो धर्म से अर्थ लेते भी हैं तो मानव जीवन को सुखमय बनाने और गरीबी को दूर करने के लिए। बच्‍चों, गरीबों, कुष्‍ठ रोगियों व विकलागों के लिए ऐसी संस्‍थाएं हैं, दूसरी तरफ बहुत से ऐसे संत है जो भगवा धारण कर सियासत में हैं, वे भी लोकतंत्र को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। ऐसा कुछ भी नहीं करते दिखते निर्मल बाबा, दूसरी बात आप यह भूल रही हैं कि उनके खिलाफ मुकदमा भी उनके भक्‍तों ने ही दर्ज करया है, साथ ही उनके भक्‍तों में कुछ ऐसे हैं जो उनके वेतन भोगी भक्‍त हैं। और एक बात और जो आप ने कहा है कि निर्मल की न तो आप भक्‍त रही हैं और न ही उनके चमत्‍कार के बारे में जानती हैं, इसलिए सब कुछ कहने के बाद भी आप उन्‍हें न तो ठग कह सकती है और न ही महात्‍मा, इससे काम नहीं चलने वाला, क्‍योंकि इतिहास कोई जीता नही है, लेकिन उसकी समीक्षा तो की ही जाती है, कोई अच्‍छा कहता है और कोई बुरा। आप ही की तरह मीडिया भी एक बात कह सकती है, मेरा काम है तथ्‍य को सामने रखना, फैसला तो पाठक, स्रोता को करना है, निर्मल का पहला रूप भी रखा और दूसरा आया तो उसे भी रखा। मीडिया भी आप ही की तरह कह रहा है कि मैं निर्मल बाबा का भक्‍त नहीं था, जो देखा, सुना सो बताया। आप के लेख और मीडिया के व्‍यवहार एक जैसे लगते हैं।

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

ज्ञानेंद्र जी...विश्वास और अविश्वास जैसी चीजों का समाधान निकाल पाना वाकई बहुत मुश्किल है. आज के हालातों को देखें तो धर्म और अर्थ आपस में बहुत जुड़े हुए हैं. धर्म का स्पष्ट तौर पर धन कमाने का जरीया है. बाबा के चमत्कारों में कितनी सच्चाई है यह मैं बता ही नहीं सकती, क्योंकि यह उनका और उनके भक्तों के बीच की बात है. ना ही मैं उन्हें ठग कह सकती हूं, क्योंकि मैंने उनकी ठगी अनुभव नहीं की... पहले मीडिया ने बाबा को आसमान पर बैठा दिया आज उन्हें गिराने पर तुल गया है... बाबा के पास कोई अशिक्षित या निर्धन लोग नहीं जा रहें, वहां दान देने वाले वे लोग है जिनकी मासिक आय दस लाख से भी ऊपर है, तभी तो दस प्रतिशत के हिसाब से बाबा को चंदा दिया जाता है. शिक्षा, अर्थ का भावनाओं से कोई वास्ता नहीं है, वह तो किसी के भी पास हो सकती है.. अगर बाबा के चमत्कारों को उनके भक्त सच कह रहे हैं और अपनी खुशी से उन्हेंदान दे रहे हैं तो इसमें आपको या मुझे क्या आपति होनी चाहिए.... अगर बाबा अपनी शक्तियों को बिजनेस के रूप में प्रयोग कर रहे हैं तो इस बिजनेस का फायदा भी उन्हें और उनके भक्तों को मिल रहा है.

के द्वारा: Tamanna Tamanna

आदरणीय तमन्ना जी , नमस्कार ! ये हमारे मुल्क की किस्मत है या बदकिस्मती , मैं नहीं जानता लेकिन जब जब बाबाओं की बात चलती है तब तब हम इन लोगों को जी भर भर के गालियाँ देते हैं और फिर हम भी ऐसे ही किसी और बाबा के चेले हो जाते हैं ! समय है चलता रहता है चलता रहेगा ! हम में से ज्यादातर लोग किसी न किसी बाबा को मानते हैं , आप लोगों के घरों में लगे मंदिर देखें तो पाएंगे की भगवान् की तस्वीर के साथ इनकी तस्वीर भी लगी रहती है ! मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ की भारत के लोगों की मानसिकता कुछ इस तरह की है की बाबाओं से अलग नहीं रहा जा सकता ! हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे दुःख और मुश्किल आती हैं जब वो एक चलता फिरता भगवान् ढूँढने लगता है , और उसे भगवन के रूप में यही बाबा नज़र आते हैं ! उस समय अगर उसकी मुश्किल संयोगवस ही सही लेकिन हर हल हो जाती है तो उसका बाबा पर विश्वास और गहरा हो जाता है ! अब ये व्यक्ति विशेष के ऊपर निर्भर करता है की वो किसे सच माने और किसे झूठ ! ओह ! इस पर तो मैं भी लेख लिख देता ! हहहाआआआआआ

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

अगर निर्मलबाबा ढोंगी हैं, तो इस ढोंग को हाईलाइट करने के इतने दिनों बाद ही मीडिया के एक धड़े तथा कुछ चप्पलघसीटू टाइप के पत्रकारों को यह बात क्यों समझ में आ पाई ? मतलब साफ़ है, कि अपनी ऐँठती अँतड़ियों के बीच जबतक दूसरे की कमाई देख पाना हजम होता रहा, तबतक तो बर्दाश्त किया, लेकिन जब अपच हो गया, तो दोनों तरफ़ से उलटने की क़वायद शुरू हो गई । बहुत मुश्किल है निर्मलबाबा की बातों को समझ पाना । जब खुद निर्मलबाबा ही सारा विश्लेषण कर पाने के लिये सही शब्द नहीं निकाल पाते, तो कोई और क्या निकाल पाएगा । दरअसल अंधविश्वास का ही एक पहलू यह भी है, कि जिस चीज़ को समझ नहीं पाए, उसपर विश्वास ही मत करो । जब उस तथ्य से ही अंधे हो, तो विश्वास भी मत करो, पीछा छुड़ाने का सबसे आसान तरीक़ा यही है । जो लोग बुराइयाँ छोड़ मंदिरों की ओर भाग रहे हैं, वे अंधविश्वासी और जाहिल हैं । सबसे बड़े सुशिक्षित और क़ाबिल ये चप्पलघसीटू ही बन गए हैं । निर्मलबाबा के यहाँ आज तक के सबसे ज़ोरदार शब्दों में भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, गंडे-तावीज़, जादूटोना और चमत्कारों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई जाती है, और ये अक्ल के अंधे बार-बार यही मनगढ़न्त आरोप मढ़ रहे हैं । अगर इनमें हिम्मत है, तो साईं बाबा के भभूत को भी ज़रा टोटका क़रार देकर देख लें । जो आदमी बहू को मुँह दिखाई तक मुट्ठी बाँध कर देना चाहता है, वह अगर बिना किसी फ़ायदे के निर्मलबाबा को चढ़ावा चढ़ा रहा है, तब तो मानना ही होगा कि सारे श्रद्धालु पागल हो गए हैं । लेकिन ऐसा होता नहीं है । पैसे आने के बाद ही लोग भेज रहे हैं, कारण चाहे जो हो । हो सकता है कि स्वभाव का कपट किसी के रास्ते का काँटा रहा हो, जिसे बदल देने से उसकी उत्पादकता और उपार्जन के प्रति एकाग्रता बढ़ जाती हो । आज तक किसी और बाबा के प्रति श्रद्धा पूरे जनमानस को ईश्वरीय शक्तियों और मन्दिरों की ओर उन्मुख नहीं कर पाई । निर्मलबाबा को खुद न तो किसी मंत्र की जानकारी है, न ही वह अपनी बातों को किसी प्रखर वक्ता के अंदाज़ में समझा पाते हैं । लेकिन जो कुछ भी है, वह आमजन की समझ में भली भाँति आ जाता है । सत्ता और समाज के सताए व्यक्ति को उसके फ़ायदे की बात उसकी ज्ञात भाषा में समझाने वाला कोई मिल जाय, और उसे लाभ भी प्राप्त हो, तो फ़िर समझाने वाले के पीछे चल पड़ना आदमी का स्वभाव है । हो सकता है कि निर्मलबाबा को आज उनकी शक्तियाँ ही किसी अतिक्रमण की सज़ा दे रही हों, लेकिन कुछ तो है उनके पास, जो काफ़ी कुछ लोगों के अंदर झाँक कर देख पाने में सक्षम है । अब वो साक्षात भगवान तो कतई नहीं हैं ।

के द्वारा:

तमन्‍ना जी, बहस का एक मात्र सूत्र होता है- समाधान न बन पाएं तो समस्‍या नहीं बनें- मेरा मानना है आप के लेख से समाधान नहीं निकला। जहां तक लोगों पर दोषारोपण की बात है तो पहले यह जान लेना ही चाहिए कि अपने देश की साक्षरता दर क्‍या है। यह देश धर्म प्रधान रहा, बाद के दिनों में कषि प्रधान हो गया, अब अर्थ प्रधान हो गया है। इतनी तेजी से किसी भी देश्‍ा के विकास का आधार बदलेगा तो कुछ जरूर छूट जाएगा, यहां भी कुछ ऐसे लोग छूट गए जो धर्म से कषि में, कर्षि से अर्थ में अपने को नहीं बदल पाए। कुछ पूरी तरह बदल गए। निर्मल बाबा आस्‍था यानी धर्म की बात करते हैं, लेकिन वे अर्थ प्रधान भारत के नागरिक हैं। उनके अनुवायी अर्थ के अपेक्षा में वहां जाते है यानी नौकरी आदि, लेकिन वे आज भी धर्म प्रधान भारक के सहयात्री हैं। ऐसे में अर्थ की गाडी छोडने के लिए ये जिम्‍मेदार हो सकते हैं, लेकिन गाडी पर लिखे अर्थ यात्रा एक्‍सप्रेस की पट़टी नहीं पढ पाने के लिए जिम्‍मेदार नहीं हैं, क्‍योंकि हम लोकतंत्र में हैं और लोकतंत्र का सबसे बडा कर्म न पढ पाने वालों को भी पटटी पढने योग्‍य बनाना है। यह काम सरकार नहीं कर पा रही है तो हम और आप भी नहीं कर पा रहे हैं। निर्मल बाबा को मैं दोषी मानता हूं, इसलिए नहीं की उन्‍होंने ठगा, इसलिए कि इतनी बडी चम्‍त्‍कारी शक्ति का उपयोग उन्‍होंने शिक्षा के बडे संस्‍थानों में नहीं किया, संसद में नहीं किया, देश के विकास के लिए नहीं किया, परमाणु क्षेत्र में नहीं किया, जल समस्‍या को दूर करने में नहीं किया, आतंकवाद से निपटने में नहीं किया, भूखों के घर रोटी पहुंचाने में नहीं किया। इस देश ने उन्‍हें इस लायक बनाया कि वह चमत्‍कार का प्रचार कर सके तो उनका धर्म बनता है कि वे अपने चमत्‍कार का कुछ अंश देश की बडी समस्‍याओं के समाधान को भी देते। इसलिए वह दोषी है और जो लोग उनकी बात मानते हैं वे इसलिए दोषी नहीं है कि हमने उन्‍हें धर्म प्रधान भारत में छोडे रखा, अर्थ प्रधान भारत की गाडी मैं बैठे तो उन्‍हें साथ नहीं बैठाया। बाप बेटा को छोड दे तो आप क्‍या कहेंगी।

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

वासुदेव जी... वर्तमान समय में परोपकार और धर्म पूरी तरह से एक व्यवसाय बन चुका है. और व्यवसाय का पहला उद्देश्य और आधार ही यही होता है कि किसी भी तरह दूसरे लोगों को अपने प्रोडक्ट पर विश्वास दिलवा दिया जाए. निर्मल बाबा का प्रोडक्ट है उनकी कृपा. मैं किसी भी रूप में निर्मल बाबा को दोषी नहीं ठहरा पा रही, क्योंकि यह कोई पहला व्यक्ति नहीं है जिसने जनता के तथाकथित उद्धार करने का दावा किया है. मैं तो हमेशा से ही किसी ना किसी बाबा के बारे में सुनती आ रही हूं. हर बार कोई आता है और जनता को बेवकूफ बनाकर चला जाता है. एक सीमा तय होने चाहिए कि हम इतनी बार ठोकर खाने के बाद तो सीख ही जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता. हम हर बार विश्वास करते हैं, हर बार ठोकर खाते हैं.जिस व्यक्ति का काम हे धोखा देना है हम क्यों उसे दोष दें, वह तो सिर्फ अपना काम कर रहा है. गलती तो हमारी ही है. वहीं इन हालातों का दूसरा पहलू यह भी है कि जब तक हम किसी के चमत्कार या ढोंग का व्यक्तिगत अनुभव ना कर लें, तब तक किसी पर अंगुलियां उठाना भी तो सही नहीं है.

के द्वारा: Tamanna Tamanna

तमन्ना जी, मीडिया में जितने भी कार्यक्रम आ रहे हैं वे पेड कार्यक्रम का हिस्सा हैं, ये बात कोर्ट में निर्मल के वकील ने स्पष्ट की है और जो मीडिया खिंचाई कर रहा है वो उसका अपना काम ही है..!! हमारे देश का मीडिया तो है ही ऐसा इसमें किसी को क्या शक..!!! लेकिन आपकी ये बात मुझे समझ नहीं आ रही है कि दोषी वे लोग हैं जो ठगे जा रहे हैं निर्मल नहीं.... अगर ऐसा है तो थानेदार से लेकर नेता तक सभी निर्दोष हैं दोषी तो जनता है जो मूर्ख बन रही है..!!! वाकी क़ानून की नजर में दोषी है या नहीं ये अदालत का फैसला बतायेगा.. निर्मल के नाम पर किसी भी भगवा पहनने वाले को गाली देने का भी क्या मतलब.. यदि वो लूट रहे हैं तो उनके खिलाफ भी केस दर्ज कराइए जैसे लोगों ने निर्मल के खिलाफ दर्ज कराये हैं... कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्हें कुछ कॉन्वेंट स्टाइल वाले लोग सिखाये गए पाठो के कारण लुटेरा कहते हैं किन्तु बस मुंह से ही... हकीकत में सरकार तक पीछे पड़ी है किन्तु एक मुकदमा तक नहीं.!! अपनी सोच के कारण भगवा की व्यर्थ मानहानि करने से फायदा?? क्या आपको पता है कि आपका तर्क किसी भी देश के क़ानून को उलट देगा..?? विश्वास करना मनुष्य का स्वभाव है और जानकारी का आभाव ठगे जाने का कारण!!! आप भी बाजार से शौपिंग माल में खरीदे गए कपड़ों से लेकर मैगी के पैकेट व दवा की गोली तक वेबकूफ बनायीं जाती है और मैं भी..!! हर मनुष्य को सामान ज्ञान व् विवेक नहीं होता.! २०००-२००० जमा करने वाले पचासों निर्मल को गाली देते फिर रहे हैं, मैं बीसों को जनता हूँ इसलिए ये कहना कि जिन्होंने विश्वास किया वो तो कुछ कह नहीं रहे बिना जानकारी के बात कहने जैसा है.!! यद्यपि मैं जानता हूँ कि आप निर्मल का पक्ष नहीं ले रहीं किन्तु जिस तर्क का आप सहारा ले रही हैं वो वैसा ही है जैसे कोई कहे कि ग्लास आधा खाली है तो आधा भरा है... इसलिए अगर पूरा खाली है तो पूरा भरा है....

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

तमन्ना जी, इसी विषय पर हाल ही में जंक्शन पर दो और भी ब्लॉग पोस्ट हुए हैं.संभवता आपकी नज़र उन पर नहीं पड़ी है इसलिए लिंक दे रहा हूँ. http://tripathivasudev.jagranjunction.com/2012/04/14/real_mahatma_gandhi/ http://yamunapathak.jagranjunction.com/2012/04/10/%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%b8/ और नीचे मैंने पढ़ा है कि कहा जा रहा है कि इस चर्चा से " क्या फर्क पड़ता है " "सब व्यर्थ है " मुझे लगता है कि किसी भी विषय पर चर्चा करने से कुछ न कुछ सीखने को ही मिलता है और अगर इसी तरह इतिहास पर चर्चा को क्या फर्क पड़ता है कहकर नज़रंदाज़ करने लग जायेंगे तो फिर तो इतिहास की कोई कीमत ही नहीं रहनी चाहिए क्योंकि इतिहास भूतकाल है जिससे कि वर्त्तमान पर कभी कोई फर्क नहीं पड़ता. और इस चर्चा कि ही वजह से बहुत से लोगों को बहुत सी छिपी जानकारी प्राप्त हुई है जो उन्हें पहले ज्ञात नहीं थी. इस बात को मैं भी मानता हूँ कि महात्मा गाँधी महान थे और उस काल के बहुत से अन्य नायक भी. ऊपर दिए गए ब्लॉग को देखकर अपना नजरिया व्यक्त करने का कष्ट कीजिये. धन्यवाद

के द्वारा: prateekraj prateekraj

के द्वारा: Tamanna Tamanna

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

तमन्ना जी, यही बात मैं बात आपके लिए कहूँ कि आप साडी दुनिया में खुद को अकेली बुद्धिमान स्त्री समझती हैं तो कैसा लगेगा. एक बात कहूँ, अच्छा बनने और अच्छा होने में बहुत फर्क है. एक बार अपने अन्दर झक कर देखिएगा, साडी गलत फहमी दूर हो जाएगी....मैं मानता हूँ कि इस शख्स में अभिमान भरा हुआ है और इसने कुछ लोगों के साथ अशिष्टता का व्यव्हार किया है. परन्तु कमसे कम वह किसी के पीछे से वार नहीं किया है. मैंने भी इस व्यक्ति के बातों का विरोध किया था. परन्तु आप तो सीधे व्यक्ति का विरोध करके अपनी मानसिकता सिद्ध कर दी है. एक बात तो स्पष्ट हो गयी कि वह आपसे बेहतर साहित्य और गरिमा को समझता है..........और मैं भी आज बुरा हो गया क्योंकि बुराई का विरोध न करके व्यक्ति का विरोध किया हूँ. मैं आज मैं खुद को गुनाहगर पाता हूँ. मैं चाहता हूँ कि मुझे इस बात की सजा मिलनी चाहिए....आप चाहें तो मेरा ब्लाग दिलेत करावा सकती है, मुझे इस बात से आप से कोई शिकायत नहीं रहेगी.......

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

प्रिय तमन्ना जी, आखिर 'टॉर्चर' करने आ ही गए, तो रोका किसने है, हम तो यही कहेंगे...स्वागत है आपका, क्या लेंगे 'ठंडा' या 'गर्म', चलो आज पहला दिन है....'ठंडा' ही ठीक रहेगा. आज हम आपसे सहमत हैं, महात्मा गाँधी 'स्वयंभू' राष्ट्रपिता नहीं बने थे, भारत के सविंधान में इस उपाधि से किसी को भी आज तक नवाज़ा नहीं गया, और न ही इसका उल्लेख कहीं मिलता है, और न ही इस बात का कोई लिखित प्रमाण है,.....हम भी मानते हैं, लेकिन फिर भी थे और आज भी हैं.....पता नहीं क्यों? सवाल ये है, कि अगर ये 'अहिंसा के पुजारी' थे तो इनको 'नोबल परुस्कार' से क्यों नहीं नवाज़ा गया? 'नेल्सन मंडेला' क्या इनसे भी बड़े 'अहिंसा के पुजारी' थे, जो उनको 'नोबल' दे दिया गया...?

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ..........आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार... यह खेल चले दो तीन महीने लगातार.... फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार..... डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार..... फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार...... तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार..... तमन्ना जी आपको मेरी ये रचना कैसी लगी.......?

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

तमन्ना जी...मैं आपकी बात से सहमत हूँ की ब्लॉग्गिंग का मतलब किसी को डिस्टर्ब करना नहीं है.और जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ कि मैं मानता हूँ कि उनकी बहुत सी बाते गलत हैं जो कि बदलनी भी चाहिए पर उन्हें ऐसा नहीं लगता है तो मैं बस ये कहना चाहता हूँ कि आपको उन सब बातों को तवज्जो नहीं देनी चाहिए उससे ये सब स्वतः ही बंद हो जायेगा. रही बात कमेंट्स कि तो आपके लेखों को बहुत से कमेंट्स मिलते हैं जिनमे से ज्यादातर मर्यादित होते हैं उनमे से एक को नज़रंदाज़ करना मुश्किल नहीं होना चाहिए ये जानने के बाद कि आप उन्हें समझाने कि कोशिश कर चुकी हैं. इस मंच पर बहुत सी पोस्ट्स हैं जिनमे कि महिलाओ के हक के लिए लिखा गया है तो हम समझ सकते हैं कि यहाँ महिलाओ का सम्मान करने वालो कि संख्या कहीं ज्यादा है.

के द्वारा: prateekraj prateekraj

Sinsera जी ने मेरे उपरोक्त कमेंट पर जवाब मे क्या लिखा ये भी पढ़िएगा! “dear mr. wise man, there is one thing correct in ur comment that i’m not a poetess, and i dont want to be. acording to the definition of poem i.e. soft feelings, touchy words, superflous emotions..i find myself unable to write a single word. these lines are not a poetry. this is somewhat u can say a whistle of pressure cooker after getting high pressure, in order to prevent the fusion of safety valve. once i said about myself… “चुभे गा जो ख़ंजर तो ग़ज़लें बहें गी, रगों में शायर के जज़्बात रवां होते हैं…” और फिर मैंने क्या लिखा ये पढ़िए....... follyofawiseman के द्वारा April 2, 2012 ‘Sinsera जी, आपने लिखा हैं…….”i’m not a poetess, and i dont want to be.” पर, अगर चाहने से कोई कवि बन सकता था तो फिर क्या था(सबसे पहले मैं ही बन जाता)…… I don’t think one can will anything thing that is beautiful…….मेरे ख़याल से either you are a poetess or you are not……but you cannot make it happen…..! effort से बस तुकबंद हुआ जा सकता हैं….. आगे अपने लिखा हैं “acording to the definition of poem i.e. soft feelings, touchy words, superflous emotions..i find myself unable to write a single word.” but i am not interested in poem, i am concerned with poetess herself…….you may easily write or repeat that which is written in Gitanjali or Upnishand, but it does not mean that you yourself have become one who gave birth to Geetanjali or Upnishad…. मैंने आपकी कविता से शिकायत नहीं की थी, मुझसे तो आपसे शिकायत थी…और वो अभी भी हैं……मेरे ख़याल से सारे शब्द सुंदर हैं अगर वो किसी सुंदर हृदय वाले व्यक्ति से निकले…..बार बार आपको परेशान करने के लिए माफ़ी चाहता हूँ……’ आज मेरे मेरे ब्लॉग पर Sinsera जी ने क्या लिखा ये भी पढ़िए.... “शाबाश…. अपनी तकलीफ का काफी अच्छी तरह वर्णन कर गए आप… लेकिन एक बात तो मानते हैं न की आप मनुष्य ही हैं…”अनलहक़” कह देने भर से कोई खुदा तो नहीं हो जाता … फिर भी हर मनुष्य विचारवान भी नहीं होता , सब की ब्रेन केपेसिटी एक जैसी तो है नहीं…अब देखिये न ..आप ही की क्लास में पढ़े हुए बाकी बच्चे नौकरियां कर के मस्त हैं, खा पी कर सो रहे हैं और आप हैं की सरहदें मिटाने में लगे हैं…किताबी ज्ञान को थोथा कह रहे हैं…..पर अच्छा है कि आप ने साधु की तरह सार सार को रख कर थोथा उड़ा दिया.. आग अच्छी होती है लेकिन चूल्हे की…जंगल में लग जाये तो तबाही करती है… आप को आप की आग की बधाई, अब आप पर निर्भर है की आप इसको निर्माणकारी बनाते हैं या विनाशकारी….. कुछेक सौ साल पहले कार्ल मार्क्स ने भी ऐसे ही विचारों के साथ समाजवाद की कल्पना की थी…. अभी तक तो नहीं आया…” उनके इस कमेंट पर मेरे जवाब भी पढ़िए.... ‘एक दिन च्वांग-त्जु और उसका एक मित्र एक तालाब के किनारे बैठे हुए थे। च्वांग-त्जु ने अपने मित्र से कहा- “उन मछलियों को तैरते हुए देखो, वे कितनी आनंदित हैं”। “तुम स्वयं तो मछली नहीं हो”- उसके मित्र ने कहा,- “फ़िर तुम ये कैसे जानते हो कि वे आनंदित हैं?” “तुम ‘मैं’ तो नहीं हो”- च्वांग-त्जु ने कहा,- “फ़िर तुम यह कैसे जानते हो कि ‘मैं’ यह नहीं जानता कि मछलियाँ आनंदित हैं?” आप मेरे ब्लॉग पर आयीं इसके लिए मैं अनुग्रहित हूँ…….’

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: Tamanna Tamanna

फ़ॉली जी के अनुसार मैं self-obsessed हूं.. मांफ कीजिएगा फॉली जी इस बार मैं आपका ही हथकंडा अपना रही हूं लेकिन यह दिखाने के लिए कि वास्तव में self-obsessed कौन है, मैं ऐसा करने के लिए विवश हूं... कुछ दिन पहले सिंसेरा जी कि जिस रचना को जागर्ण जंक्शन के अनुभवी लोगों ने बेस्ट श्रेणी में रखा था महाश्य ने सरिता को जी अपना नायाब कमेंट देकर सम्मानित किया... नीचे उनका कमेंट पोस्ट कर रही हूं ...!!! वैसे तो कविता भाव जगत की चीज़ है, और वहाँ बुद्धि को लाना ठीक नहीं है और उचित भी नहीं, लेकिन मैं अपने आदत से मजबूर हूँ, और आपकी इस कविता को पढ़ने के बाद मेरे सर मे खुजलाहट हो रही है…..मैं अब खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ ….कुछ कहने से पहले, मैं ‘आँख से म्यूजिक सुनने के लिए आपसे माफी चाहता हूँ’……… शब्दो को आपने सुंदर ढंग से सजाया है……संदेश भी अच्छा दिया है आपने……..लोगो ने तारीफ भी खूब की है….तारीफ तो आप ने अब-तक खूब सुन ली, अब मेरी शिकायत सुनिए…..और वो भी कठोर शब्दो मे……….! ये कविता बुद्धि की उपज है, ख़ालिस विचार हैं,……इस कविता के जरिये आपने सिर्फ और सिर्फ अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है…….अगर किसी पुरुष ने इस कविता को लिखा होता तो मुझे कोई एतराज़ नहीं होता ….उसे माफ किया जा सकता था…..लेकिन आपके मामले मे……..इसे निगल पाना मुश्किल है,……काश ये आपके हृदय से उठी होती, अगर कहीं भी थोड़ी झलक भी भाव की मिलती, प्रेम की मिलती जो मे इसे झेल जाता, सिवाय मन के उदीग्नता के मुझे कहीं कुछ भी न दिखा,,,,अभी मैं जागरण पर ही किसी पुरुष लेखक की कविता पढ़ रहा है…..बकवास कविता थी लेकिन मैंने वाह…वाह कर दिया…..लेकिन आपके मुआमले मे ऐसा करना मुझसे संभव नहीं है…….मैं ऐसे कई स्त्री को जानता हूँ जो कवि है लेकिन उन्होने कभी कविता नहीं लिखा है……लेकिन आपके मामले मे बात उल्टी है…..आपने खूबसूरत कविता लिखी है…लेकिन आप कवित्री नहीं है………I am really sorry for saying so….but….I have to say this because I feel if one can really become mother, then why to adopt child…Can’t you get rid of your mind and really become a poet…? I am again sorry if i have said something offensive……! I had not said anything If I wouldn’t have loved your poem…..I felt like writing this because I really liked ur words…..but i felt these words are lacking soul,……! If you still find my comment offensive then, remove my comment and forget everything…..! सोच लीजिएगा कोई पागल यूँ ही कुछ बकवास करके चला गया…..!

के द्वारा: Tamanna Tamanna

पवन जी...इस मंच पर सभी लेखक अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र हैं, इसमें अहम को ठेस पहुंचाने जैसी बातें कर आप यहां विवाद खड़ा ना करें. मुझे आपके मित्र फॉली जी के अलग सोचने से कोई आपत्ति नहीं है, मुझे आपत्ति उनकी सोच से हैं. उनके निम्न विचारों से हैं...जो व्यक्ति महिलाओं को सम्मान देने जैसी बात सोच भी नहीं सकता पता नहीं क्यों उसकी पैरवी की जा रही है. यह मंच गरिमामय है और इसकी गरिमा बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है. जहां तक आप घटिया और छिछोरा शब्द प्रतोग कर रहे हैं तो आपको कुछ भी बोलने से पहले यह भी समझ या जान लेना चाहिए कि आपके आदरणीय मित्र के विरुद्ध मैंने इन शब्दों का प्रयोग किया ही नहीं है. बेवजह आप जिस बेबाकी की आप बात कर रहे हैं वह बेबाकी नहीं छोटी और घृणित मानसिकता से अधिक और कुछ नहीं है. अन्य लोगों से भिन्न दिखाना तो ठीक है लेकिन यह भिन्नता कितनी हो और किस सीमा तक हो यह बात बहुत ज्यादा मायने रखती है. सभी की सोच एक जैसी नहीं हो सकती, ना ही सोचने का दायरा सीमित हो सकता है लेकिन विचारों को परिष्कृत रखना हमें खुद ही सीखना होता है, जैसे हम सोचते हैं हम वैसा ही व्यवहार करते हैं. खुद को इतना अधिक स्वच्छंद भी नहीं रखना चाहिए कि आप दूसरों के लिए मुश्किले पैदा कर दें.

के द्वारा: Tamanna Tamanna

तमन्ना जी नमस्कार , किसी के मज़हबी मामलातों में दखल न दिया जाए तो बेहतर होगा| यदि इस्लाम मुस्लिम पुरुषों को ऐसा अधिकार देता है, तो वो अपने मज़हबी अधिकारों का पालन क्यों न करें? क्या आप इस्लामी रिवाजों और कानूनों को बदलना चाहती हैं? वैसी भी मोहम्मद पैगम्बर इस्लाम में आदर्श पुरुष माने जाते हैं, हर कोई चाहता है कि वो अपने आदर्श कि बातों का और उसका अनुकरण करे| (..ऐसे दकियानूसी विचारों की, जिसे इस्लाम की आड़ देकर लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है...|) दरअसल, इस्लाम कि आड़ लेकर कुछ नहीं कहा जा रहा| जो सच है उसको ही कहा जा रहा है, और सिखाया जा रहा है ताकि लोग आने मज़हब को पूरी तरह मानें| इस्लाम कि आड़ लेकर तो आप आधुनिक विचारों को आप मज़हब में ज़बरदस्ती घुसा रही है| रही बात आधुनिक बनने की, तो आधुनिक कोई तब तक नहीं हो सकता या सकती जब तक वो इस या उस क्लब में जुड़ा रहता या रहती है| धर्म और मज़हब या रिलिजियन में अंतर बहुत बड़ा है, ज़रा इसको भी समझें| इस्लाम धर्म नहीं, मज़हब है| और, यह मज़हब अपने में एक क्लब की ही अवधारणा लिए है|

के द्वारा:

तमन्ना जी, afreen.....afreen, ख़ुदा कसम क्या अलख जगाई हैं आपने.......! मेरे जुबान पे तो आपने curfew लगा दी लेकिन लोगों का क्या करेंगी......? लोगों को आपका self-obsessed होना रास नहीं आ रहा हैं....... प्रतिक्रियाओं की बाढ़ देख कर आपको भी शायद इसका इल्म हो गया होगा......अगर कुछ कसर बाँकी हैं तो एक लेखक Pawansirivastwa(Laptop wala soofi) का आप पे लिखा लेख पढ़ लीजिए.......आपकी सुविधा के लिए.....उनका लेख आप तक forward कर रहा हूँ............HERE IT IS… " वो लेखिकाएं थी या WWF की पहलवान ? रात की स्तब्धता को चीरते जैसे कोई रात्री प्रहरी टाह देता हैं- “जागते रहो..जागते रहो”, यह जानते हुए भि कि कोई जगा नहीं , हर कोई रजनी की बाँह मे बेसुध लेटा हैं, मैं भी दरवाजे दरवाजे दस्तक देता था हिन्दी के अनकहे शब्दों का टोकरा लिए , यह जानते हुए भी कि कोई कदरदान नहीं , कोई मेरी पहुनाई करने वाला नहीं . मैं कौन- हाशिए पे खड़ा हिन्दी का एक लेखक, एक अफ़साना निगार, जिसे फक्र था, गौर कीजियेगा फक्र था कि - कुछ इस तरह हमारा अंदाज़े किस्सागोई होता है कि, खुद कहानी भी हमे बड़े शिद्दत से दाद दिया करती है भ्रम जल्दी हीं टूट गया, जब जद्दोज़हद और नाकामी के लंबे दौर के बाद मेरे ज्ञान चक्षु खुले और एहसास हुआ कि हाय - ‘गर ने रखते ये शौक-ए-सुख़न हम जो, दौरे मुफ़लिसी कब कि रवां हो गई होती पर आदत तो आदत है, गज़ब कि ढीठ….. मेरे बोधिसत्व पे भी हावी रही, और लिखवाती रही मुझसे, इधर उधर, कभी इस ब्लॉग पे तो कभी उस ब्लॉग पे ,तो कभी फ़ेसबूक पे! एक दिलचस्प वाकया सुनिए- फ़ेसबुक पे मैं अनवरत दिल के तह से निकली, जज़्बातों के फोहे मे लिपटी अपनी रचनाएं परोस रहा था, पर कोई भुला भटका भी, भूले से मेरे लिखे रचनाओं को पढ़ नहीं रहा था….दिल पे कटार तो तब चल गई जब देखा कि एक खूबसूरत नरगिसी बाला के, “आज मैं pizza खाऊँगी” पे १०४ liking और ५२ कमेंट थे !ज़िल्लत ने जोरों कि लात जमाई मुझे और मैं बेआबरू हो फिर ढूँढने लगा एक मुकम्मल मंच, अपने विचारों को पदासीन करने के लिए ….किसी ने बताया जागरण जंक्शन के बारे में….टोहता, तलाशता मैं पहुँचा जागरण जंक्शन के दरवाजे पे, पर ये क्या ! वहाँ तो कुछ लेखिकाओं का अहंकार सुरसा जैसा विकराल मुँह बाये खड़ा था ,सबको लीलने के लिए आतुर .जी हाँ लेखिकाएं …..चंद के नाम लेने की ज़ुर्रत कर रहा हूँ – कोमल नेगी, रश्मी खाटी , तमन्ना …सभी अपने नाम की सार्थकता भूलाए एक अज़ब हीं रूप में दिखीं….. देखा कोमल अपना कोमलत्व खोए बैठी है, तमन्ना कि सारी तमन्ना उसके निज-अस्तित्व को सींचने मे लगी है और रश्मी प्रचंड-दाह-विकर्ण बन हर उस लेखक को स्वाहा करने मे लगी है जो उसका थोड़ा भी वैचारिक प्रतिकार करता है…ऐसे एक भुक्तभोगी का नाम लेना चाहूँगा—-संदीप कुमार (wise man’s Folly)…वो लेखिकाएं थी या डबलू-डबलू-एफ़ की पहलवान ? हिन्दी के कलमकारों को बामुश्किल इज्ज़त मिलती है और हिन्दी के हीं हम-विरादरों के बीच इतनी खींचमतान,इतना जूतमपैजार देखकर बडा अफ़सोस हुआ….संदीप बेचारे पर अमर्यादित होने का आरोप लगाया गया था ….विडम्बना यह थी कि लेखिकाओं ने खुद बडा हीं अमर्यादित शब्दों क चयन किया था -’घटिया’ ’ छिछोरा’ जैसे शब्द …यह तो वही बात हो गयी कि किसी गाली देने वाले से जब जबाब-तलबी कि जाये तो वह कहे -कौन साला कह रहा है कि मैं गाली दे रहा हूं. मैंने संदीप जी के लिखे लेख को बार-बार पढा पर मुझे हर बार वो लेख मतान्तर दर्शाने वाला लेख मात्र लगा …..मर्यादा के हर सम्भावित प्रतिमानो पे मैंने उसे परखा पर किसी भी नज़रिये से मुझे संदीप जी का लेख अमर्यादित न लगा….मैंने उन लेखिकाओं के सुन्दर चेहरे का सुमिरन कर अपने अन्दर एक पुर्वाग्रह भी पैदा की पर तब भी संदीप जी के मर्यादा कि डंडी डिगती दीखाई न पडी …..अंतोगत्वा जो समझ में आया वह यह कि ऐसी लेखिकाओं को तल्खियत भरी सच्चाई से रुबरू कराना भी एक अपराध है ……समझ में आया कि हर वो लेख जो इन लेखिकाओं के प्रति जरा भी विरोधाभास का पूट लिये है-अशोभनीय है,अमर्यादित है,असंसदीय है और आज मैंने भी यह अपराध कर दिया है .अब देखना है कि लेखिकाओं की ये राखी सावन्त मुझे किन विशेषणो से नवाज़ती हैं-घटिया ,छिछोरा या कुछ और ……अंत मे उन लेखिकाओं के प्रतिक्रियात्मक और रोष भरे उस लेख के बारे में यही कहना चाहुंगा कि- वह लेख था या किसी के आत्ममुग्धीकरण में की गई आत्म-वंचना थी वह लेख था या किसी के अहंकारों के इती-वृत की संप्रेषणा थी वह लेख था या कलम की पहुनाई थी वह लेख था या चाकरी करती रौशनाई थी" PAWAN SRIVASTAVA

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

तमन्ना जी मुझे संदीप के ब्लॉग में कोई खामी समझ में नहीं आती .... बल्कि उनका लिखने का अंदाज अलग है... आप को अपने ब्लॉग में तारीफे तो बहुत मिलती हैं... मगर आलोचना को भी स्वीकार करना चाहिए .. अक्सर तारीफ़ लिखने वाले लेख को एक नज़र पढ़ते हैं... जबकि आलोचना करने वाले गहन विचार करते हैं... अपने आप में किसी ने अगर आप का लेख पढ़ा और कमेंट किया तो ये एक ख़ुशी की बात है उसने कुछ समय निकला आपके विचारों के प्रति.... जबकि आजकल जमाना तो ऐसा है की लोग सड़क पर मरते आदमी के लिए समय नहीं निकाल पाते अपनी व्यस्त जिंदगी से... और ये Mr FOLLY के लिए भी सौभाग्य की बात हैं जो आपने उनके लिए इतना समय निकाला.. बहुत ही क्लिष्ट भाषा में उनका महिमा मंडन किया...

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

तमन्ना जी ! मैंने संदीप जी का ब्लॉग देखा है और उसे देखने के बाद मैं उन्हें गलत नहीं कह सकता. क्योंकि उनके ब्लॉग के ऊपर लिखा है "लोगो को डिस्टर्ब करने के लिए" जो कि शायद उन्होंने किया भी है,मंशा जो भी रही हो.हो सकता है कि उनके कमेंट्स कटु हों पर उन्होंने पहले ही कह रखा है कि वो डिस्टर्ब करने के लिए लिख रहे हैं तो इस तरह से तो वो अपने काम में खरे साबित हो रहे हैं.और अगर हमें उनकी बातें पसंद नहीं हैं तो फिर हमें उस पर ध्यान नहीं देना चाहिए. मुझे भी उनकी कुछ बातें सही नहीं लगी थी(जैसे कि समाज को नहीं बदला जा सकता) और इससे मैंने उन्हें अवगत भी कराया पर मैं इतना समझ गया था कि उनके ब्लॉग कि टैग लाइन(डिस्टर्बिंग ब्लॉग) पढने के बाद अगर हम आगे ब्लॉग पढ़ते हैं तो उसके बाद हमें ये नहीं कहना चाहिए कि वो गलत कर रहे हैं.क्योंकि एक तरीके से देखा जाये तो वो अपनी कथनी को ही करनी में बदल रहे हैं. अगर हमें लगता है कि वो गलत हैं, हमें नापसंद है तो फिर उन्हें नज़रंदाज़ कर दिया जाये.फिर कोई परेशानी नहीं होगी और कोई विवाद भी नहीं होगा. रही बात जंक्शन का गलत इस्तेमाल करने की तो लोग कहते हैं की चाँद में दाग है पर अगर हम देखना चाहे तो हम उस चाँद की अपार सुन्दरता को भी देख सकते हैं.वैसे ही इस जंक्शन में भी बहुत से अच्छे लेखाकगड़ मौजूद हैं उनकी रौशनी से भी आनंदित हुआ जा सकता है. आप मुझसे काफी अनुभवी हैं फिर भी राय देने कि कोशिश कि है क्षमा कीजियेगा. धन्यवाद

के द्वारा: prateekraj prateekraj

तमन्ना जी, चुंकि आप तहज़ीब की ज़बर्दस्त तलबगार हैं ,आदाब से भी ज़यादा तहज़ीबदार लफ़्ज़ अगर कोई है तो वो अर्ज़ है आपको.आपने जिस संदीप जी(wise man folly )को घटिया और छिछोरा कहा है,वैसी बेबाकी और पोशिदगी अगर सब अपने दिल मे ले आयें तो यकीन मानिये इस जहां का काया-कल्प हो जाए….काश आपके दनिश्गी में वो पैनापन होता,आपके जज़्बातों में वो बारीकी होती तो आप संदीप जी के लिखे शब्दों का मतलब समझ पातीं….आपको जो बेलौस,बेतरीब,बेअदबी से भरे उनके अल्फ़ाज़ दिख रहे हैं,उनके दबीज़ सतहों को तोडकर तो देखिये,अन्दर शफ़कत का समन्दर दिखेगा आपको…संदीप जी ने कोई बेअदबी नहीं की है ….हां गलती उन्होने ज़रूर की है,आपके अहम को ठेस पहूंचाने की ….वही हिमाकत मैं भी कर रहा हूं….मुझपे भी ’छिछोरा’ या ’घटिया’ जैसा कोई विशेषण नवाज़ दिजियेगा ….आपके लिये अपनी लिखी दो कवितायें भेज रहा हूं,हो सके तो कोशिश किजियेगा उन्हें समझने की….आपका शुभेच्छू -पवन श्रीवस्तव. 1) एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है वो पागल है कि चांद को महबूबा नहीं कहता है वो पागल है कि भीड की भाषा से जुदा रहता है दिन को दिन कहता है रात को रात कहता है देखिये पागल को, कैसी बहकी बात कहता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है दुनियां आती है जब तहज़ीबों का चोला पहनाने फ़ेंक के काबा-ए-तकल्लुफ़ वो नंग रहता है नफ़ासत की तलवारों से कटते सिर देख के, जाहिल उज्जड वो बडा दंग रहता है सिर गिनता है वो मकतूलों के, कातिलों के खंज़र गिनता है देखिये पागल वो दुनियां के कैसे मंज़र बिनता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है वो पागल है कि उसकी ज़ुबां में तल्खियत है सच्चाई की , तंज़ बहुत है; वो अहमक है जो नहीं जानता कि इस दुनियां में सच्चों से लोगों को रंज़ बहुत है; झूठ की लानत-मलामत करता है वो सच की खुशामद करता है, देखिये कैसा पागल है वो कि न अदा-ए-बनावट करता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है 2) चलो पाबंदियों के कैंचुल उतार थोडा हल्के हो लें और पुरकैफ़ हवाओं में हम आज़ाद डोलें उडें मरज़ी के आसमान में हम इधर-उधर चलो बेफ़िक्री के आलम में थोडा खो लें; इस अदब और तहज़ीब की दुनियां में है हीं क्या, झूठी मुस्कराहट,नकली सलाम और अनमनी दुआ; परम्पराओं के परकोटे हैं, मज़हब की सददें हैं, बंदिशें हैं,बेडियां हैं और मुल्कों की सरहदें हैं; चलो अब हर दिवार गिरा दें और बंदिशों की हर बेडियां काटें चलो अब हर अदना-ओ-आला में सुख-दुख बराबर बांटें अब प्यास को चुनने दें प्याला हम और रिंद को मैकदा चुनने दें, अब ज़ुबां को चुनने दें तकल्लुम हम और होठों को तबस्सुम चुनने दें अब आंखों को चुनने दें मंज़र हम और ज़िस्म को कबा चुनने दें, अब रियाज़त को चुनने दें मसीहा हम और ज़ुर्म को सज़ा चुनने दें; चलो पाबंदियों के कैंचुल उतार थोडा हल्के हो लें और पुरकैफ़ हवाओं में हम आज़ाद डोलें;

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

तमन्ना जी सादर नमस्कार, आपने श्रीमान संदीप को पढने के लिए लिखा था मैंने भी गलत आंकलन हो इसलिए इनके अब तक के सारे आलेख पढ़ डाले और मुझे लगता है की व्यर्थ बहस को यदि ये ब्लॉग पर नहीं लाते तो विवाद जैसा कुछ भी नहीं है. हाँ इनके लेखन में उन्मुक्तता है. युवा है, भावावेग में कुछ अधिक ही लिख जाते हैं मगर लेखन में एक नयापन है.धीरे धीरे समझ जायेंगे की कितना उन्मुक्त लेखन यहाँ ठीक है.बेहतर है हम अपना लेखन जारी रखें और उनके नयेपन को स्वीकार नहीं कर सकते तो प्रतिक्रया देने से भी परहेज ही करें. फिरभी यदि कोई व्यक्तिगत विवाद की स्थिति आती है तो इनकी अवश्य ही शिकायत करेंगे. किन्तु मुझे नहीं लगता की यह युवा विवाद करने के लिए लिख रहा है.

के द्वारा: akraktale akraktale

तमन्नाजी बिना धन के तो राजनीती हो ही नहीं सकती ऐसा चुनाव दर चुनाव इस देश के लोग देखते आये हैं रही बाबा रामदेव की तो हमलोग ऐसा क्यूँ नहीं सोचते की उन्होंने अपने मंच और सभाओं के माध्यम से जनताको जागरूक करने का कम किया है वर्ना कितने लोग जन पाते यह कांग्रेस जो पहले आदर सहित बाबा को हवाई अड्डे से ले आती है फिर सौदा करती है वे सौदा करने से मुकर जाते हैं तो उनको और उनके समर्थकों जो की साधारण लोग थे निहथ्थे थे उनपर आधी रात को लाठियां बरसाई जाती है क्या आप कांग्रेस द्वारा किये गए इस अमानवीय और अलोकतांत्रिक कृत्य का भी समर्थन करती हैं ?आज कितने लोग बिना धन के राजनीती में काम कर रहे है या देश की राजनीती को प्रभावित कर रहे है जो कुछ कर भी रहें हैं उनको भी किसी गैरसरकारी संगठन का समर्थन प्राप्त है जिनकी पास खर्च करने को पैसे हैं .अतः बाबा रामदेव की गलतियाँ निकालने के पहले जो लोग इस देश में लूट मचा रखे है उनको कुछ अच्छी सीख देने की बात किया जाये तो देशहित में होगा

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

तमन्नाजी , मिला जुलकर सभी पार्टियाँ अब वंशवाद का हीं समर्थन करती नजर आ रही है और इस देश की जनता भी उनको स्वीकार कर रही है उन्ही को चुनाव में जीत भी दिला रही है यूपी के चुनाव परिणाम क्या दर्शाते हैं? यह किसको मालूम नहीं समजवादी पार्टी कल तक गुंडों की पार्टी कहलाती थी और चुनाव में पूर्ण बहुमत लाकर सर्कार में काबिज हो गए और तो और चुनाव जीतते ही इनके सिपहसलार गुंडे अपना असली रूप दिखाने लगे कई जगह हत्या ,मारपीट की घटनाएँ प्रकाश में आई हो सकता है यह हारी हुयी पार्टी के समर्थको का काम हो बदनाम करने एवं राजनितिक बदला लेने के लिए पार्टियाँ कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं पर इसमें संदेह नहीं अभी भी आपराधिक छबि वाले नेता एसपी में भी जीतकर आये हैं क्या वे अब सुधर जायेंगे अगर ऐसा होता है तो एक अजूबा कहा जायेगा और अखिलेश यादव जो युवा मुख्यमंत्री बने हैं उनसे यूपी की जनता आस लगाये बैठी है जरुर वे चुनाव में किये गए वायदे पूरे करने की और अपना मजबूत कदम उठाएंगे आनेवाले तीन महीने में कुछ अगर नजर आया तो यह एक युवा नेता की उपलब्धि कही जाएगी और लोग फिर से नेताओं के वायदे पर भरोसा करने लगेंगे .

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

के द्वारा: Tamanna Tamanna

के द्वारा: Tamanna Tamanna

तमन्ना जी नमस्कार , आप की जागरूकता के लिए आप को बधाई देना चाहती हूँ... हमारे देश भारत में तो घरेलु हिंसा काफी हद तक रोकी जा चुकी है. संविधान, एन.जी . ओ. और महिला संगठन आदि ऐसा करने नही देते हैं लेकिन कट्टरपंथी देशों में स्थिति बड़ी चिंतनीय है. आप ने कुछ दिनों पहले पढ़ा होगा की पाकिस्तान में एक लड़की को प्रेम करने के अपराध में चौराहे पर पत्थरों से मार कर जान ले ली गयी. गोया उस ने अकेले ही प्यार किया हो...... हमारे यहाँ "honour killing" के नाम पर इसी किस्म के अत्याचार हो रहे हैं , दहेज़ हत्या का भी समूल नाश नही हुआ है.और इंग्लैंड में अब स्त्रियों को टॉर्चर करने की विधियाँ भी सिखाई जा रही हैं. यह एक वैश्विक समस्या है.कहीं कम कहीं ज्यादा. हम से जितना हो सके , रोकथाम और भर्त्सना करनी चाहिए...

के द्वारा: sinsera sinsera

दिनेश भाई ! कभी-कभी आप इतनी बड़ी बात कर जाते हो कि पढ़ने के बाद औरों का शर्म से सर झुकता है की नहीं पता नहीं. मुझ बेशर्म का सर जरुर झुक जाता है खुद को मानव की औलाद कहने पर शर्म आती है.....परन्तु आप चिंता क्यों करते हो वास्तविक जीवन इसी को कहते हैं...यह कल भी था, आज भी है और....परसों ............आप वास्तविकता का समर्थन करों. यह कल्पना मुझे ही करने दो!........वैसे जो बात आज आप कहें हो फक्र से मेरा सर उंचा हो गया है और खुद को आपका छोटा भाई कहलाने पर फक्र महशुस कर रहा हूँ. भाई मैं राम-राज की कल्पना नहीं करता परन्तु एक बात कहूँगा आप बस मेरा साथ दो ....यदि हम इस वास्तविकता को बदल नहीं दिए तो हम-तुम इंसान की औलाद नहीं.........बस आप अपने तरफ से प्लानिंग करों की किन-किन क्षेत्रों में और कैसा सुधार चाहते हो. मैं अपनी तरफ से प्लानिंग कर रहा हूँ. समय आने पर हम सब एक साथ होंगे और साथ काम करेंगे. कल्पना को हकीकत में बदलने के लिए नहीं और न ही हकीकत को कल्पना में बदलने के लिए.........बस इस हकीकत को हकीकत में बदलने के लिए.......तेरा-मेरा साथ रहे और साथ रहें उन सबका जो मानवता के समर्थक है........आमीन!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: priyanka rathore priyanka rathore

तमन्नाजी, मैं आपकी इस पोस्ट का अति समर्थन करता हूँ,  यह समर्थन की अंतिम स्थिति है। मेरा मानना है कि ये सम्प्रदाय (क्योंकि धर्म केवल एक ही होता है मानवता, बाकी सभी सम्प्रदाय हैं) हमें मानव नहीं शैतान बनाते हैं, मैं किसी एक सम्प्रदाय की बात नहीं कर रहा, लगभग सभी ऐसे हैं। हम तथाकथित उच्चवर्गीय हिन्दुओं ने दलितों पर कितना अमानवीय अत्याचार किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। सभी सम्प्रदाय हमें हिंसक बनाते हैं। सम्प्रदाय एक जहरीली शराब की तरह होते हैं। ये सम्प्रदाय ही हमें दूसरों का शोषण करने का अधिकार देते हैं। ईश्वर की इच्छा का हवाला देकर विरोध करने का अधिकार भी छीन लेते हैं। अगर कोई विरोध करता है तो उसे काफिर या नास्तिक कहकर प्रताड़ित किया जाता है। यदि किसी अन्य सम्प्रदाय  के आप जैसा बुद्धिजीवी विरोध करता है, तो उसे यह कह कर चुप करा दिया जाता है कि आपको हमारे धार्मिक मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।      कुछ शिक्षित एवं बुद्धिजीवी परिवार के अपवाद को छोड़ दें तो हिन्दुओं के परिवारों में भी स्त्रियों की स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि हम खुश हो सके।     बेटा-बेटी में भेद अधिकांश परिवारों में प्रत्यक्ष दिख जायेगा। स्त्रियों को वास्तिविकता में सम्पत्ति का कोई अधिकार नहीं हैं। बचपन से ही बेटी को पराया धन कह कर सम्बोधित करना, क्या अमानवीय नहीं है। बेटी को धन शब्द से सम्बोधिकत करना, कितना शर्मनाक है। बेटा तो हीरा है और बेटी, पराया धन....    अरे नारियों तुम्हारे पास सबसे बड़ी शक्ति है, जन्म देने की, अगर तुम कर दोगी विद्रोह.... त्याग दोगी अपने प्रजनन के अधिकार को....तो झुक जायगा तुम्हारे सामने वह खुदा भी....जिसने रची है यह भेदभाव पूर्ण सृष्टि। खुदा, भगवान या गोड भूल जाता है कि उसे जन्म देने वाली कोई माँ ही होगी। फिर नारी का इतना अपमान कैसे देख लेता है वह, यह भी एक  कारण है, जो सिद्ध करता है कि वह नहीं है।     आप जैसी नारियों से निवेदन है कि इस तरह से अलेखों से नारी शक्ति को जागृत करके उन्हें उनके  अधिकारों से अवगत करायें। तथा अत्याचार न सहने के लिये प्रोत्यसाहित करें, उसका विरोध करने के लिये भी उकसायें। बहुत कुछ बदल चुका है...शनैः शनैः बहुत कुछ बदल रहा है....शायद...अति शीघ्र...या शाघ्र... या कुछ समय लेकर सब कुछ बदल जायेगा....लेकिन यह संभव है आप जैसी लेखिकाओं के  प्रयासों से ही।     गद्य विधा में लिखने में परिपक्य नहीं हूँ, अतः विषय वस्तु से भटक जाता हूँ। अतः निवदन है कि इन भूलों का मेरी कमजोरी समझ कर नजर अंदाज कर दें।     यही उम्मीद करूँगा कि आगे भी आपसे इसी तरह के आलेख पढ़ने को मिलेंगे।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

तमन्ना जी, ऐसी मानसिकता के कई कारण हो सकते हैं. पारिवारिक संस्कारों के अतिरिक्त एक कारण है- स्त्री के आत्मनिर्भर होने से उत्पन्न हुई कुंठा. केरल प्रान्त का उदाहरण देना चाहूंगी. १००% साक्षरता के कारण यहाँ पर अच्छी नौकरियां मिलना, भगवान मिलने के समान दुर्लभ है . मिलता भी है तो - चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी का पद. पढ़े- लिखे पुरुष, निचले स्तर की नौकरी करने से कतराते हैं, पर गृहस्थी व परिवार की जरूरतों के प्रति अधिक संवेदनशील होने के कारण, बहुधा उनकी पत्नियाँ, छोटे दर्जे के काम( जैसे घरेलू नौकरानी, आया इत्यादि) करने पर विवश हो जाती हैं. पत्नी पर निर्भर करने के कारण, पति को भय सताता रहता है कि पत्नी कहीं उनके अधिकारक्षेत्र से बाहर न चली जाये. इस कारण, घरेलू हिंसा एवं नशे आदि के मामले में केरल का नाम शीर्ष पर आता है. घरेलू हिंसा, राजस्थान के बाद सबसे अधिक यहीं पर ही है. राजस्थान जैसे प्रांत में रूढ़िवादिता एवं स्त्री को समग्र विकास का अवसर न मिलने के कारण, कई महिलाओं का सामाजिक रूतबा संतोषजनक नहीं है. एक अर्थपूर्ण व सोचने पर विवश करने वाली पोस्ट पर बधाई.

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

मै मुख्यमंत्री जी से निवेदन करता हूँ की वे किसानो के तरफ विशेष ज्यादा ध्यान देना चाहिए ? जिससे की गरीब लोगो को भी खाना और कपड़ा मिल सके , छात्रों को लैपटॉप और तबलेत देने से उनके घर की आर्थिक स्थिति ख़राब हो सकती है और बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देकर और बिरोज्गारो को बढ़ावा देना होगा ? अगर उत्तेर प्रदेश का विकास करना है तो निचे देये गए वाक्य पर ध्यान देना चाहिए ???? २४ घंटे बिजली की ब्यवस्था खाद का दाम कम कराना कल कारखानों का निरमान कराना छात्रों के लिए आचे स्कूल की ब्यवस्था करना और फ़ीस कम करना बेरोजगारों को रोजगार देना न की बेरिज्गरी भत्ता आचे आस्पताल की सुविधा करना यता यात की सुविधा प्रदान करना और सी बहुत आईसी चीजे है जिससे की देश का विकाश हो सकता है

के द्वारा:

के द्वारा: chaatak chaatak

तमन्ना जी नमस्कार / में आप की बात से सहमत हूँ / ये ही बात परिवार को जोडती हें व् परिवार के हर सदस्य के अन्दर जिम्मेदारी , त्याग का भाव पैदा करती हें / शायद ही ऐसा कोई घर होगा जहाँ परिवार के सदस्य के देर से आने पर परिवार चिंता न करते हें / में भी घर अपनी धर्मपत्नी के डर से जल्दी पहुँचने की कोशिश करता हूँ / मझे याद हें जब में मोनेट ग्रुप में बाराखम्बा रोड पर सर्विश कतरा था / सीनीयर मेनेजमेंट को रिपोर्टिंग करने के कारण रात में लेट होना पड़ता था / उन दिनों मोबाइल न के बराबर होते थे बात १९९० से १९९७ के बीच की हें / में रोजाना रात को दस से ११ या कभी १२ बजे तक पहुचता था / श्रीमती की हालत देख अन्दर से दहल जाता था / व् श्री मती जी व् बच्चे भी रात के समय लेट रात में मेरे साथ ही गर्म गरम खाना खाते थे / ये बात हें जो परिवार को एक प्रेम सूत्र में जोडती हें / इस लिए आप की बात सोलह आने सही हें / एक बात और आप पत्रकारिता में हें आप बड़ी ही सरल भाषा में बड़ी अच्छी तरह से लिखती हें / यूँ तो ब्लॉग में वाद मिवाद चलता रहता हें / परन्तु शालीनता से अपनी बात रखना एक संस्कारिक परिवार व् लालन पालन का ही परिणाम दर्शाता हें / सही बात रखने के लिए धन्यवाद व् शुभकामनाएं

के द्वारा: satish3840 satish3840

तमन्ना जी , एक अच्छे एवं कुरीतियों के विरोध में लिखे लेख के लिए मैं आपको बधाई देतीं हूँ ;लेकिन कुछ बात कहना चाहूंगी १- शायद अपवाद को छोड़ कर बाकि कहीं भी किसी होने वाली बहू / लड़की का नाम नहीं बदला जाता है २- हाँ, यदि कुंडली या किसी गृह नक्षत्रों के कारण नाम बदलना उचित हो तो लड़के " वर" का भी बदलना चाहिए यानि यदि लड़के का नाम बदलने से काम बनता हो तो लडके का नाम ; लड़की के नाम बदलने से काम बनता हो तो लड़की का नाम बदला जाये ३- वैसे कहीं -कहीं घर पे "दो व्यक्तियों के एक नाम" होने पर या बहुत कठिन नाम होने पर संभवतः परन्तु प्यार से शादी के बाद लड़कियों को / नई बहुओं को यदि उनके पति या ससुराल में भी कोई प्यार से उन्हें नया नाम देता है तो इसमें वो खुश होतीं है एक नए प्यार स्नेह की अनुभूति के साथ न की नफ़रत के साथ . क्योंकि प्यार से... सम्मान से बढ़कर दुनिया रखा क्या है ? बात सकारात्मक सोच पर निर्भर करती है . मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: Tamanna Tamanna

के द्वारा: Tamanna Tamanna

के द्वारा: sanjay dixit sanjay dixit

तमन्ना जी आज आपके ब्लॉग पर आकर अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि मैं आपके आलेख के एक एक शब्द से सहमत हूँ। अनुराधा जी की पोस्ट विचार मुझे भी विचित्र लगे थे। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, समाज परिवार से मिलकर बनता है। वह स्वतंत्रता की नहीं स्वछंदता की बात कर रहीं थीं। यह पाशविक जीवन में ही संभव हैं। स्वछंदता से तो मानवीय सभ्यता ही विलुप्त हो जायगी। आदरणीय यमुना पाठक जी ने भी आपकी ही तरह पोस्ट लिखी है- मैं अकेली हूँ।       कालान्तर में जीवन का अनुभव उन्हें हमारी आपकी बातों से सहमत होंने को विवश कर देगी। मैं भी दिल्ली से मध्य वर्गीय परिवार से आता हूं। बेटा एवं बेटी इंजीनियरिंग एवं सीए कर रहे हैं। उनकी माँ कालेज जाते एवं कालेज से आते समय प्रतिदिन कई फोन करती है। यदि किसी कारण से  वह नहीं कर पाती है तो बच्चे स्वयं फोन करके कालेज सकुशल पहुँचने एवं कालेज से निकलने की  सूचना दे देते हैं। बच्चों को खुशी होती है, कि हमारी माँ को हमारी कितनी फिक्र है। हम क्या बच्चे भी हमसे सवाल जवाब करते हैं और हम भी उन्हें खुश होकर उत्तर देते हैं। हम केवल हम नहीं हैं, अपितु एक परिवार हैं, एक समाज हैं। परिवार क्या समाज से प्रथक होकर जीना दुष्कर है। समाज की वंदिशें भी हम खुशी खुशी स्वीकारते हैं। 

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

प्रिय तमन्ना जी, सादर, हमने भी उनका ब्लॉग पढ़ा था, और अपनी राय भी दी थी, सिर्फ हमने नहीं, मंच के अधिकांश ब्लोगर्स ने भी उनके इस विचार को तर्क देकर समझाया था, लेकिन लगता है उनको तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता, आज सारा दिन उनके ब्लॉग पर बहस में ही बीत गया, आप एक बार उनके ब्लॉग पर जा कर देखें तो सही, लेकिन अंत में उनको ये मानना ही पड़ा, कि हम ही सही हैं..... हमारा भी काम सारा दिन इन्टरनेट पर ही होता है, कभी मेल्स आती हैं, कभी करनी होती हैं, इस हिसाब से तो हम हाई-टेक हैं, हमें कौन पूछेगा, लेकिन हमें भी अपने परिवार को, बड़ों को छोटो को, साथ लेकर चलना पड़ता है, हमसे भी सवाल पूछे जाते हैं, देर से आने का कारण पूछा जाता है, तो क्या हम भी कहें कि ये बंदिश है, हमें ये मंज़ूर नहीं, हम अकेले रहेंगे.....ऐसा थोडा न होता है, ये समाज है, हम किसी से मांग कर नहीं खाते, लेकिन समाज की शर्म भी कोई चीज़ है के नहीं अपने भारत देश में, खैर, ख़ुशी हुई ये जानकर कि आप जैसी बेटियां जो सदा ही अपने माँ-बाप, परिवार, को ही अपना सर्वस्व मानती हैं, उनका कहा मानती हैं, मेरी भगवान् से यही दुआ है कि वो आपको सदा सलामत रखे............

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

अशोक कुमार जी ... सर्वप्रथम तो प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए हार्दिक धन्यवाद.....यूपी की जनता के पास एक बार फिर समाजवादी पार्टी को अवसर देने के अलावा शायद कोई विकल्प ही नहीं दिया गया. राष्ट्रीय दल वहां लोकप्रिय है नहीं और बीएसपी ने जो उनके साथ किया हम सभी यह जानते हैं..... आप सही कह रहे हैं कि जब राजनीति अपना स्वरूप पूरी तरह बदल चुकी है तो ऐसे में जातिवाद और वंशवाद सब कुछ जरूरी और जायज हो गया है... आप अन्ना के अनशन पर बैठने की बात कर रहे हैं तो मुझे बिलकुल नहीं लगता कि अनशन जनता को प्रभावित कर सकते हैं..क्योंकि पूर्व में तथाकथित कांग्रेस विरोधी जो लहर उठी थी उसका कांग्रेस को कोई नुकसान नहीं हुआ अपितु फायदा ही हुआ है. 

के द्वारा: Tamanna Tamanna

जब राजनीती फायदे के लिए की जाएगी तब तो सब कुछ जायज हीं है क्या वंशवाद, क्या जातिवाद, क्या सम्प्रदायवाद , किसी नेता या पार्टी को समाज या देश की चिंता नहीं अपनी कुर्सी कायम रहे कोई जोड़ तोड़ करनी पड़े सब कुछ करते रहना ही राजनीती की परिभासा रह गयी है एसपी का इस तरह बहुमत प्राप्त करना यही सन्देश देता है अपने देश में जातिवाद वंशवाद और सम्प्रदायवाद बुरी तरह से हावी हो रहा है और जनता मन से कहो या बेमन से इसी को स्वीकार कर रही है वर्ना कल तक गुंडों की पार्टी कही जानेवाली एसपी आज यूपी का भविष्य सवारनेवाली पार्टी कैसे बन गयी . और इस पार्टी को इतनी बड़ी जीत कैसे हासिल हुयी . यूपी के युवा सीएम अखिलेश यादव ने यूपी की जनता को दिलासा दिया है की वे एक स्वक्छ प्रशासन देंगे और आगाज ऐसा हुवा की चुनाव परिणाम आते ही उनकी पार्टी के दबंग एवं गुंडे नेता गोलियां चलाने लगे अपना असली रूप दिखाने लगे, अगर आगाज ऐसा है तो भविष्य कैसा होगा? अब यूपी की जनता को ही सोचना होगा खैर कुछ समय और इन्तेजार की जरुरत है. अब देश के नेताओं ने देख लिया है जनता से कटने का क्या हश्र होता है ?अब तो दोनों राष्ट्रिय पार्टियों को गंभीरता से सोचना है आगे आने वाले लोकसभा चुनाव में ये पार्टियाँ जनता की अपेक्छओं पर कितने खरे उतरते हैं. भ्रष्टाचार एवं काले धन जैसे महत्वपूर्ण मसले पर क्या कार्रवाई करते हैं और उनका सरोकार जनता से कितना और अपनी कुर्सी से कितना रहता है यह वक्त बताएगा और देश की राजनीती की दिशा भी उसीसे तय होगी अन्ना फिर से २५ मार्च को जंतर मंतर पर बैठनेवाले हैं और पूरे देश में कांग्रेस की गलत नीतियों के विरोध जन जागरण का कम शुरू होनेवाला है .मेरे विचार से कोई भी सीएम बने जनता एवं देश का काम हो फिर चाहे वह नेता का बेटा है या रिश्तेदार जनता को क्या ?

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey