सरोकार

शोषित मानवता के लिए नवज्योति और आत्मविश्वास का सृजन करता ब्लॉग

54 Posts

1772 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5462 postid : 242

ये कैसा फरमान है कि पत्नी को रोजाना छड़ी से मारो तभी वैवाहिक जीवन में सुख मिलेगा

Posted On: 27 Mar, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

हम ऐसा मानकर चलते हैं कि कोई भी धर्म व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित नहीं करता, वह केवल जीवन यापन करने का सही तरीका ही दर्शाता है लेकिन फिर भी ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो इस्लाम को एक कट्टर और रुढ़िवादी धर्म के रूप में देखते हैं. विशेषकर महिलाओं के संदर्भ में इस्लाम को कहीं अधिक रुढ़िवादी समझा और देखा गया है. अभी हाल ही में मैंने एक वेबसाइट पर एक आर्टिकल पढ़ा जिसे पढ़ने के बाद मैं यह निर्णय नहीं कर पा रही हूं कि इसमें उल्लेखित निर्देशों को धर्म विशेष का मसला समझकर नजरअंदाज कर देना चाहिए या फिर महिलाओं के प्रति रुढ़िवादिता और अमानवीय सोच को प्रदर्शित करने वाली निम्न कोटि की सोच मानकर विरोध करना चाहिए.


domestic violenceइंगलैंड में एक इस्लामिक मैरेज गाइड आजकल चर्चा का विषय बनी हुई है. इस गाइड में यह निर्देश दिया गया है कि अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी पर क्रोध उतारना चाहता है, उसे पीटना चाहता है तो वह कौन-कौन से तरीके अपना सकता है. एक विदेशी समाचार पत्र में इससे संबंधित खबर का प्रकाशन किया गया जिसके अनुसार पति को चाहिए कि वह अपनी पत्नी को छड़ी या फिर हाथ से पीटे. इतना ही नहीं अगर कोई पति अपनी बीबी को दंडित करना चाहता है तो उसे अपनी पत्नी की कान खिंचाई करनी चाहिए, क्योंकि यह एक सबसे अच्छा तरीका है.


उपरोक्त निर्देशों को अगर आप किसी की शैतानी समझकर नजरअंदाज कर रहे हैं तो आपके लिए यह जानना भी जरूरी है कि इसे किसी नौसीखिये या फिर मनचले ने नहीं लिखा क्योंकि इन निर्देशों को जन मानस तक पहुंचाने का जिम्मा स्वयं इस्लाम के महान दार्शनिक और विद्वान मौलाना अशरफ़ अली थानवी ने लिया है.


आदरणीय मौलाना जी के अनुसार अगर विवाह को टूटने से बचाना है तो पति को अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार करना ही चाहिए. लेकिन ऐसे दकियानूसी विचारों की, जिसे इस्लाम की आड़ देकर लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, जितनी निंदा की जाए उतनी कम है.


समय बदलने और आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद हम आज भी ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां महिलाओं को अपने पृथक और स्वतंत्र अस्तित्व को तराशने के लिए निरंतर प्रयास करने पड़ रहे हैं, लेकिन फिर भी जब महिलाओं के जीवन और उनकी स्वतंत्रता में धार्मिक हस्तक्षेप बढ़ने लगता है तो उनकी सामाजिक और पारिवारिक स्थिति सुधरने की संभावना न्यूनतम या ना के बराबर ही रह जाती है.


हालांकि इस्लाम धर्म के वे अनुयायी जो समय के साथ-साथ बदल चुके हैं और महिलाओं को समान अधिकार देने में गुरेज नहीं करते, इन निर्देशों का कड़ा विरोध कर रहे हैं. लेकिन आज जब महिलाएं पुरुषों के समान खुद को योग्य और काबिल प्रमाणित कर चुकी हैं तो ऐसे में उन्हें मारने-पीटने जैसी बात आश्चर्य से कहीं ज्यादा निराशा का भाव पैदा करती है.


dvपत्नी को मारना-पीटना, उस पर हाथ उठाना घरेलू हिंसा का सबसे बड़ा उदाहरण है जिसे कोई भी महिला कभी सहन नहीं कर सकती और सहन करे भी क्यों? जब महिला स्वतंत्र है, अपने आप को साबित कर चुकी है, पुरुषों के समान या उनसे कहीं ज्यादा प्रभावी ढंग से सफलता के नए-नए आयामों को छू रही है तो वह क्यों किसी पुरुष, भले ही वह उसका पति ही क्यों ना हो, के द्वारा शोषित होना मंजूर करेगी, उनके ऐसे बर्ताव को क्यूं स्वीकार करेगी!!


हम खुद को आधुनिक कहलवाते नहीं थकते लेकिन जब महिला और पुरुष की बात आती है तो ना जाने क्यों एक को सर्वोपरि और दूसरे को हमेशा निम्न दर्शाने में अपना समय बर्बाद करते हैं.  हमारे कपड़े पहनने का तरीका मॉडर्न हो गया है, खान-पान, रहन-सहन सब आधुनिक है लेकिन सोच और मानसिकता आज भी सदियों पुरानी ही चली आ रही है. हमें यह समझना होगा कि जब तक समाज में महिलाओं के अस्तित्व और उनकी स्वतंत्रता को सम्मानपूर्वक स्वीकार नहीं किया जाएगा तब तक स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी जैसा हम हमेशा से देखते आ रहे हैं. मेरा यह लेख किसी भी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है. इस पर व्यवहारिकता से विचार होना नितांत आवश्यक है.




Tags:                           

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 4.30 out of 5)
Loading ... Loading ...

38 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ajay के द्वारा
April 1, 2012

तमन्ना जी नमस्कार , किसी के मज़हबी मामलातों में दखल न दिया जाए तो बेहतर होगा| यदि इस्लाम मुस्लिम पुरुषों को ऐसा अधिकार देता है, तो वो अपने मज़हबी अधिकारों का पालन क्यों न करें? क्या आप इस्लामी रिवाजों और कानूनों को बदलना चाहती हैं? वैसी भी मोहम्मद पैगम्बर इस्लाम में आदर्श पुरुष माने जाते हैं, हर कोई चाहता है कि वो अपने आदर्श कि बातों का और उसका अनुकरण करे| (..ऐसे दकियानूसी विचारों की, जिसे इस्लाम की आड़ देकर लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है…|) दरअसल, इस्लाम कि आड़ लेकर कुछ नहीं कहा जा रहा| जो सच है उसको ही कहा जा रहा है, और सिखाया जा रहा है ताकि लोग आने मज़हब को पूरी तरह मानें| इस्लाम कि आड़ लेकर तो आप आधुनिक विचारों को आप मज़हब में ज़बरदस्ती घुसा रही है| रही बात आधुनिक बनने की, तो आधुनिक कोई तब तक नहीं हो सकता या सकती जब तक वो इस या उस क्लब में जुड़ा रहता या रहती है| धर्म और मज़हब या रिलिजियन में अंतर बहुत बड़ा है, ज़रा इसको भी समझें| इस्लाम धर्म नहीं, मज़हब है| और, यह मज़हब अपने में एक क्लब की ही अवधारणा लिए है|

vikramjitsingh के द्वारा
March 29, 2012

प्रिय तमन्ना जी, अति उत्तम लेख है, आपका, लेकिन कल आप अख़बारों में ‘दारुल उलूम देवबंद’ का एक नया फतवा पढ़ेंगी, ”चाहे नशे की हालत में, सिर्फ फोन पर तीन बार कहा गया, ‘तलाक – तलाक – तलाक’ तलाक ही माना जायेगा” लेकिन अगर पति दूसरे दिन कहे, कि मैं तो नशे में था, गलती हो गयी, मैं तलाक नहीं चाहता, तो भी उसकी पत्नी को किसी और पुरुष से शादी करके उसके साथ ‘इद्दत’ खत्म होने तक रहना पड़ेगा, फिर मियाद खत्म होने पर अगर उसका दूसरा पति उसको तलाक दे देगा, तभी वो अपने पहले पति के पास वापस आ सकेगी, अन्यथा नहीं…… क्या ये ‘अत्याचार’ की पराकाष्ठा नहीं है? या इसको कोई और नाम देना चाहेंगी आप………?

sinsera के द्वारा
March 29, 2012

तमन्ना जी नमस्कार , आप की जागरूकता के लिए आप को बधाई देना चाहती हूँ… हमारे देश भारत में तो घरेलु हिंसा काफी हद तक रोकी जा चुकी है. संविधान, एन.जी . ओ. और महिला संगठन आदि ऐसा करने नही देते हैं लेकिन कट्टरपंथी देशों में स्थिति बड़ी चिंतनीय है. आप ने कुछ दिनों पहले पढ़ा होगा की पाकिस्तान में एक लड़की को प्रेम करने के अपराध में चौराहे पर पत्थरों से मार कर जान ले ली गयी. गोया उस ने अकेले ही प्यार किया हो…… हमारे यहाँ “honour killing” के नाम पर इसी किस्म के अत्याचार हो रहे हैं , दहेज़ हत्या का भी समूल नाश नही हुआ है.और इंग्लैंड में अब स्त्रियों को टॉर्चर करने की विधियाँ भी सिखाई जा रही हैं. यह एक वैश्विक समस्या है.कहीं कम कहीं ज्यादा. हम से जितना हो सके , रोकथाम और भर्त्सना करनी चाहिए…

yogi sarswat के द्वारा
March 29, 2012

तमन्ना जी नमस्कार ! अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहना चाहता हूँ ! पुरुषों से ज्यादा तो महिलाएं ही महिलाओं पर जुल्म करती हैं ! मैं भारतीय समाज की बात कर रहा हूँ ! आपने जो इंग्लैंड का वृतांत दिया है उसे सही नहीं ठहरा रहा हूँ , उसकी जीतनी निंदा की जाये कम है , लेकिन क्या हर किसी प्राणी को एक मर्यादा में नहीं रहना चाहिए ?

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    योगी जी…  सही कहा लेकिन ऐसी महिलाओं की संख्या थोड़ी सीमित है. और उनकी भूमिका धन पर आश्रित है. लेकिन अगर पुरुषॉं की बात करें तो वह महिलाओं को अपने अधीन रखने में कहीं अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं इसीलिए उनसे यह उम्मीद हमेशा अधिक रहती है.

nishamittal के द्वारा
March 29, 2012

अत्याचार का समर्थन कहीं नहीं कियाजा सकता,दुखद

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    निशा जी.. सटीक प्रतिक्रिया… हार्दिक आभार

jlsingh के द्वारा
March 29, 2012

आदरणीय तमन्ना जी, महिलाओं पर हो रहे अत्याचार किसी भी तरह से वाजिब नहीं कहे जा सकते! चाहे वह धर्म के आर में हो या उसकी विवशता के चलते! दिनेश जी की प्रतिक्रिया में दम है – महिलाओं को खुद आगे आना होगा, जब तक वे आगे नहीं आयेगी पुरुष उनका शोषण करते रहेंगे! अनिल जी थोड़े उतावले हैं और आवेश में कटु शब्दों का भी प्रयोग कर जाते हैं. यह बात मैं अनिल को अपना प्रिय मन कर ही कह रहा हूँ! इस मंच पर विचार विमर्श उचित है पर मर्यादा का ख्याल रखा जाय! ज्वलंत विषय पर प्रस्तुति के लिए तमन्ना जी का आभार!

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    जवाहर जी…अगर पुरुषों के आधिपत्य वाला समाज, महिलाओं को सम्मान ना देने के लिए रोज नए-नए बहाने बनाता रहेगा. उनके ऊपर अत्याचार करने के लिए धर्म का सहारा लेगा तो आप कैसे उम्मीद करेंगे कि सदियों से शोषित रही महिला अचानक अपनी आवाज बुलंद कर देगी. दोनों को मिलकर काम करना होगा.

March 29, 2012

ये रूढ़ियाँ, और न जाने और कितनी बर्बर, अमानवीय रूढ़ियाँ…सिर्फ नारियों के प्रति ही नही, अमीर-गरीब, उंच-नीच..जात-पात.. ये किसी दलदल से कम नही हैं. और स्वस्थ समाज की कल्पना भी नहीं हो सकती इनके मध्य रहते हुए.. न जाने कब बड़ा होगा इंसान..! विचारों से भिगोने वाली प्रस्तुती हेतु बधाई.. सादर.

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    टिम्सी जी.. सोच बदलना बहुत मुश्किल है. हम भले ही खुद को आधुनिक कहते ना थके लेकिन जब ऐसी हकीकत सामने आती है सारी आधुनिकता धरी की धरी रह जाती है.

alkargupta1 के द्वारा
March 28, 2012

तमन्ना जी , अति गंभीर विषय पर अच्छा लिखा है…..बहुत विचारणीय और अर्थपूर्ण आलेख के लिए बधाई

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    धन्यवाद अलका जी.

rekhafbd के द्वारा
March 28, 2012

तमन्ना जी ,महिलाओं पर सदियों से जुल्म होते आ रहे है \धर्म की आड़ में हो या सामाजिक कुप्रथा ,प्रताड़ित तो नारी ही होती है \बहुत बढ़िया लेख \

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    सही कहा आपने रेखा जी, प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए हार्दिक धन्यवाद

omdikshit के द्वारा
March 28, 2012

तमन्ना जी, बहुत ही अच्छा मुद्दा उठाया है आप ने.बर्बरता की निंदा होनी ही चाहिए.

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    दीक्षित जी.. प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए हार्दिक आभार

priyanka rathore के द्वारा
March 28, 2012

सार्थक लेख … आभार

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    प्रियंका जी, धन्यवाद

dineshaastik के द्वारा
March 28, 2012

तमन्नाजी, मैं आपकी इस पोस्ट का अति समर्थन करता हूँ,  यह समर्थन की अंतिम स्थिति है। मेरा मानना है कि ये सम्प्रदाय (क्योंकि धर्म केवल एक ही होता है मानवता, बाकी सभी सम्प्रदाय हैं) हमें मानव नहीं शैतान बनाते हैं, मैं किसी एक सम्प्रदाय की बात नहीं कर रहा, लगभग सभी ऐसे हैं। हम तथाकथित उच्चवर्गीय हिन्दुओं ने दलितों पर कितना अमानवीय अत्याचार किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। सभी सम्प्रदाय हमें हिंसक बनाते हैं। सम्प्रदाय एक जहरीली शराब की तरह होते हैं। ये सम्प्रदाय ही हमें दूसरों का शोषण करने का अधिकार देते हैं। ईश्वर की इच्छा का हवाला देकर विरोध करने का अधिकार भी छीन लेते हैं। अगर कोई विरोध करता है तो उसे काफिर या नास्तिक कहकर प्रताड़ित किया जाता है। यदि किसी अन्य सम्प्रदाय  के आप जैसा बुद्धिजीवी विरोध करता है, तो उसे यह कह कर चुप करा दिया जाता है कि आपको हमारे धार्मिक मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।      कुछ शिक्षित एवं बुद्धिजीवी परिवार के अपवाद को छोड़ दें तो हिन्दुओं के परिवारों में भी स्त्रियों की स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि हम खुश हो सके।     बेटा-बेटी में भेद अधिकांश परिवारों में प्रत्यक्ष दिख जायेगा। स्त्रियों को वास्तिविकता में सम्पत्ति का कोई अधिकार नहीं हैं। बचपन से ही बेटी को पराया धन कह कर सम्बोधित करना, क्या अमानवीय नहीं है। बेटी को धन शब्द से सम्बोधिकत करना, कितना शर्मनाक है। बेटा तो हीरा है और बेटी, पराया धन….    अरे नारियों तुम्हारे पास सबसे बड़ी शक्ति है, जन्म देने की, अगर तुम कर दोगी विद्रोह…. त्याग दोगी अपने प्रजनन के अधिकार को….तो झुक जायगा तुम्हारे सामने वह खुदा भी….जिसने रची है यह भेदभाव पूर्ण सृष्टि। खुदा, भगवान या गोड भूल जाता है कि उसे जन्म देने वाली कोई माँ ही होगी। फिर नारी का इतना अपमान कैसे देख लेता है वह, यह भी एक  कारण है, जो सिद्ध करता है कि वह नहीं है।     आप जैसी नारियों से निवेदन है कि इस तरह से अलेखों से नारी शक्ति को जागृत करके उन्हें उनके  अधिकारों से अवगत करायें। तथा अत्याचार न सहने के लिये प्रोत्यसाहित करें, उसका विरोध करने के लिये भी उकसायें। बहुत कुछ बदल चुका है…शनैः शनैः बहुत कुछ बदल रहा है….शायद…अति शीघ्र…या शाघ्र… या कुछ समय लेकर सब कुछ बदल जायेगा….लेकिन यह संभव है आप जैसी लेखिकाओं के  प्रयासों से ही।     गद्य विधा में लिखने में परिपक्य नहीं हूँ, अतः विषय वस्तु से भटक जाता हूँ। अतः निवदन है कि इन भूलों का मेरी कमजोरी समझ कर नजर अंदाज कर दें।     यही उम्मीद करूँगा कि आगे भी आपसे इसी तरह के आलेख पढ़ने को मिलेंगे।

    March 28, 2012

    दिनेश भाई ! कभी-कभी आप इतनी बड़ी बात कर जाते हो कि पढ़ने के बाद औरों का शर्म से सर झुकता है की नहीं पता नहीं. मुझ बेशर्म का सर जरुर झुक जाता है खुद को मानव की औलाद कहने पर शर्म आती है…..परन्तु आप चिंता क्यों करते हो वास्तविक जीवन इसी को कहते हैं…यह कल भी था, आज भी है और….परसों …………आप वास्तविकता का समर्थन करों. यह कल्पना मुझे ही करने दो!……..वैसे जो बात आज आप कहें हो फक्र से मेरा सर उंचा हो गया है और खुद को आपका छोटा भाई कहलाने पर फक्र महशुस कर रहा हूँ. भाई मैं राम-राज की कल्पना नहीं करता परन्तु एक बात कहूँगा आप बस मेरा साथ दो ….यदि हम इस वास्तविकता को बदल नहीं दिए तो हम-तुम इंसान की औलाद नहीं………बस आप अपने तरफ से प्लानिंग करों की किन-किन क्षेत्रों में और कैसा सुधार चाहते हो. मैं अपनी तरफ से प्लानिंग कर रहा हूँ. समय आने पर हम सब एक साथ होंगे और साथ काम करेंगे. कल्पना को हकीकत में बदलने के लिए नहीं और न ही हकीकत को कल्पना में बदलने के लिए………बस इस हकीकत को हकीकत में बदलने के लिए…….तेरा-मेरा साथ रहे और साथ रहें उन सबका जो मानवता के समर्थक है……..आमीन!

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    आदरणीय दिनेश जी एवं अलीन जी… आज की महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर बहुत हदतक जागरुक हैं. लेकिन कभी-कभार अपने पति का मान-सम्मान बचाने या अपने परिवार वालों के लिए वह बहुत कुछ सहन करने के ल;इए विवश हो जाती है. मुझे लगता है महिलाओं के साथ-साथ पुरुष वर्ग और ऐसे निंदनीय निर्देश देने वालें तथाकथित धार्मिक सलाहकारों को भी महिलाओं के सम्मान की कद्र करनी चाहिए. सम्मानजनक जीवन जीना सभी का अधिकार है और कोई भी महिलाओं से यह अधिकार छीनता है तो वह स्वयं दंड का भागी है.

Rajesh Dubey के द्वारा
March 27, 2012

पत्नी को पीटना बहुत ही बेहूदी बात है. मौलाना अशरफ़ अली थानवी हों चाहे शंकराचार्य हो, या कोई पादरी महोदय हों,इस तरह के बिचार को मानव मन स्वीकार नहीं कर सकता. हाँ पशु मन को ये बाते अच्छी लग सकती है. तमन्ना जी आपने बिलकुल ठीक लिखा है, अगर सच्चाई पढ़ कर किसी की भावना आहत होती है तो होने दीजिये.

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    राजेश जी.. सही कहना है आपका. सभी मनुष्य समान हैं. केवल इसी आधार पर कि वह महिला है उसपर अत्याचार करना किसी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती..

vinitashukla के द्वारा
March 27, 2012

तमन्ना जी, ऐसी मानसिकता के कई कारण हो सकते हैं. पारिवारिक संस्कारों के अतिरिक्त एक कारण है- स्त्री के आत्मनिर्भर होने से उत्पन्न हुई कुंठा. केरल प्रान्त का उदाहरण देना चाहूंगी. १००% साक्षरता के कारण यहाँ पर अच्छी नौकरियां मिलना, भगवान मिलने के समान दुर्लभ है . मिलता भी है तो – चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी का पद. पढ़े- लिखे पुरुष, निचले स्तर की नौकरी करने से कतराते हैं, पर गृहस्थी व परिवार की जरूरतों के प्रति अधिक संवेदनशील होने के कारण, बहुधा उनकी पत्नियाँ, छोटे दर्जे के काम( जैसे घरेलू नौकरानी, आया इत्यादि) करने पर विवश हो जाती हैं. पत्नी पर निर्भर करने के कारण, पति को भय सताता रहता है कि पत्नी कहीं उनके अधिकारक्षेत्र से बाहर न चली जाये. इस कारण, घरेलू हिंसा एवं नशे आदि के मामले में केरल का नाम शीर्ष पर आता है. घरेलू हिंसा, राजस्थान के बाद सबसे अधिक यहीं पर ही है. राजस्थान जैसे प्रांत में रूढ़िवादिता एवं स्त्री को समग्र विकास का अवसर न मिलने के कारण, कई महिलाओं का सामाजिक रूतबा संतोषजनक नहीं है. एक अर्थपूर्ण व सोचने पर विवश करने वाली पोस्ट पर बधाई.

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    विनीता विचारणीय प्रतिक्रिया.. स्त्रियों के विषय में हमेशा हमारा समाज उदासीन रहा है. लेकिन शायद अब समय आ गया है कि उन्हें भी बराबरी के सम्मान का हकदार समझ जाएं अन्यथा हम कभी भी खुद को सम्मानजनक स्थिति में नहीं रख पाएंगे… प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए हार्दिक धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 27, 2012

आदरणीया तमन्ना जी. सादर अभिवादन. ज्वलंत समस्या है. हिंसा किसी भी स्तर पर माफ़ी योग्य नहीं है. बधाई.

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    सही कह रहे हैं आप प्रदीप जी.. प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 27, 2012

आदरणीया तमन्ना जी, सादर नमस्कार. यह तो आपने एक छोटा सा उदाहरण दिया है. मुस्लिम समाज में स्त्रियों के साथ कितनी क्रूरता होती है यह सोच कर ही दिल घबरा जाता है. अफगानिस्तान की स्थिति देख लीजिये, पाकिस्तान में ही देख लीजिये. सबसे विभत्स स्थिति तो अफ़्रीकी देशों में है. वहां महिलाओं के साथ क्या होता है यह बताने में भी शर्म आती है. गनीमत है कि हमारे देश या फिर कुछ विकसित देशों में इतनी क्रूरता नहीं है. सार्थक लेख. बधाई….

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    अजय जी.. हमारे देश में भी घरेलू हिंसा जैसी जघन्य वारदातें अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहते हैं. हम भी इन सभी कुव्यवस्थओं से बचे नहीं है.

March 27, 2012

औरों देशों की मैं नहीं जानता क्योंकि अपनी यहाँ की समस्याओं से फुर्सत मिलता ही नहीं कि मैं किसी और जगह की बात करूँ…..मैं भी ऐसे कई केसेज देखा हूँ जहाँ पत्नी, पति द्वारा प्रताड़ित की गयी पर आजकल देख रहा हूँ कि पत्निय कम और पति ज्यादे पिता रहें है, अनजानी भी यही कहा कराती थी, जिस दिन पत्नी बनकर आपके यहाँ आउंगी, उसी दिन से आपकी पिटाई शुरू कर दूंगी……तब से लेकर अबतक इंतजार करता हूँ उसके हाथों से पिटाने का…….कभी-कभी इस बात को यद् करके आँखें भर आती है,,…माफ़ी चाहूँगा….

    Tamanna के द्वारा
    March 30, 2012

    अनिल जी… आप पत्नी द्वारा पति को प्रताड़ित करने की बात कर रहे हैं.. पर मुझे लगता है यह मसला बहुत कम ही देखने को मिलता है… हां, कुछ महिलाएं है जो अपने फायदे के लिए पति को चोट पहुंचाती हैं.. लेकिन उन्हें मुख्य तौर पर नहीं लिया जा सकता… महिलाएं अत्याचार का शिकार हैं और यह बात आप चाह कर भी नकार नहीं सकतें……

SHANI के द्वारा
March 27, 2012

hi you are right , we are adopting western culture and face right now little problems as written. if we really modern by education , culture and secrify where needed then i think no problem.

    Tamanna के द्वारा
    March 30, 2012

    thanx for ur comment

yamunapathak के द्वारा
March 27, 2012

एक नयी जानकारी के साथ प्रस्तुत लेख शुक्रिया तम्मान्ना

    Tamanna के द्वारा
    March 30, 2012

    यमुना जी.. हार्दिक आभार

Sagar Shayar के द्वारा
March 27, 2012

बहुत अच्छे तमन्ना जी बहुत अच्छे विचार है थैंक्स फॉर देट

    Tamanna के द्वारा
    March 30, 2012

    thanx


topic of the week



latest from jagran