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जागरण मंच पर एक अजीबोगरीब नमूने folly wise man

Posted On 31 Mar, 2012 में

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गत कुछ दिनों से जागरण जंक्शन के बेहद मर्यादित मंच पर एक अजीबोगरीब या यूं कहें चित्र-विचित्र शख्सियत अवतरित हुए हैं folly wise man, जो अपने ब्लॉग नेम में शामिल wise  की बजाए cunning की रूपरेखा में ज्यादा नजर आते हैं. इन जनाब की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जिनका उल्लेख करने से मैं खुद को रोक नहीं पा रही, ताकि मंच के सभी समर्पित और निष्ठावान रचनाकारों को इनके बारे में जानने का अवसर मिल सके. हालांकि इन्होंने अपनी लेखनी से अपने बारे में बहुत कुछ कह दिया है, किंतु फिर भी इनके बारे में बताना मुझे उचित प्रतीत हो रहा है.


अपने विचारों में पूरी तरीके से उदारवाद का ढोंग रचा कर ओशो रजनीश के विचारों पर आश्रित इन शख्स का कहना है कि मंच के रचनाकारों के पास रचना की समझ नहीं है, लोग सिर्फ ऊलजलूल ज्ञान का प्रदर्शन करने में संलग्न हैं. इन्होंने अधिकांश लोगों के प्रति पूर्वाग्रह युक्त संभाषणों को निश्रित किया है और निरंतर यह प्रदर्शित करने की कोशिश करते रहे हैं कि सारी दुनियां में यह अकेले बुद्धिमान पुरुष हैं. इनकी रचनाओं को देखने के बाद कोई भी महोदय की आकांक्षाओं, अभीप्साओं और ग्रंथि युक्त मानदंडों के बारे में सहज ज्ञात कर सकता है.


बौद्धिक जंतु के रूप में अपनी पहचान कायम करने की नैंदिक प्रवृत्ति का खुलासा तो इन्होंने अपनी लेखनी से ही कर दिया है. तीखे और मर्म भेदी वचन, वैद्युत चिंगारियों की भांति मर्मांतक वाकबाण चलाने में सिद्धस्त और आत्म प्रशंसात्मक बोध से युक्त विभिन्न वाक शैलियों का प्रयोग करते हुए इन्होंने मंच के गरिमामय वातावरण में विघ्न आरोपित करने के कृत्य को अंजाम दिया है. इंसानी दुनियां की रवायतों से पूर्णत: अबोध, समुदायों के हितों के प्रति पूर्णत: कठोर, नर और नारी के सम्मान की हिफाजत से बिल्कुल इत्तेफाक ना रखते हुए इन स्वयंप्रभु की छिपी महत्वाकांक्षाओं के बारे में कौन अपरिचित रह सकता है.


ऐसे में सभी सम्मानित सदस्यों से यह अनुरोध है कि एक बार अवश्य इनकी रचनाओं पर दृष्टिपात करें कि इन्होंने अपने लेखन कार्य द्वारा साहित्य की किस प्रकार सेवा की है या मंच की गरिमा को बढ़ाने में कितना योगदान दिया है.




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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
May 4, 2012

तमन्ना जी, सादर अभिवादन, आपकी पोस्ट पढ़कर जाना कि जागरण मंच पर वार्तालाप की जगह काफी फितूरी उत्पात हुआ है और कुछ लोगों ने तो टिप्पड़ियो की जगह फब्तियों और छींटाकशी में ज्यादा मज़ा लिया है| मेरी राय में आप एक बहुत ही स्पष्टवादी और गंभीर ब्लॉगर हैं और कुछेक चुनिन्दा लोगों में हैं जिन्हें मैं पढना पसंद करता हूँ सिर्फ इसी वजह से मैं आपको एक सलाह देना चाहता हूँ कि आप किसी भी ऐसी कमेन्ट जो शरारत की मंशा से लिखी हो पर ध्यान ना देकर उसे मिटा दें| व्यर्थ की बातों पर ध्यान देंगी तो आपको कष्ट भी होगा और लेखन में भी मुश्किल आएगी| आशा है कि आप इतनी तुच्छ बातों पर अपना बहुमूल्य समय बर्बाद नहीं करेंगी| शुभकामनाओं सहित

April 12, 2012

तमन्ना जी, यही बात मैं बात आपके लिए कहूँ कि आप साडी दुनिया में खुद को अकेली बुद्धिमान स्त्री समझती हैं तो कैसा लगेगा. एक बात कहूँ, अच्छा बनने और अच्छा होने में बहुत फर्क है. एक बार अपने अन्दर झक कर देखिएगा, साडी गलत फहमी दूर हो जाएगी….मैं मानता हूँ कि इस शख्स में अभिमान भरा हुआ है और इसने कुछ लोगों के साथ अशिष्टता का व्यव्हार किया है. परन्तु कमसे कम वह किसी के पीछे से वार नहीं किया है. मैंने भी इस व्यक्ति के बातों का विरोध किया था. परन्तु आप तो सीधे व्यक्ति का विरोध करके अपनी मानसिकता सिद्ध कर दी है. एक बात तो स्पष्ट हो गयी कि वह आपसे बेहतर साहित्य और गरिमा को समझता है……….और मैं भी आज बुरा हो गया क्योंकि बुराई का विरोध न करके व्यक्ति का विरोध किया हूँ. मैं आज मैं खुद को गुनाहगर पाता हूँ. मैं चाहता हूँ कि मुझे इस बात की सजा मिलनी चाहिए….आप चाहें तो मेरा ब्लाग दिलेत करावा सकती है, मुझे इस बात से आप से कोई शिकायत नहीं रहेगी…….

    follyofawiseman के द्वारा
    April 18, 2012

    अनिल जी…नहीं ….नहीं मुझे आपको अनिल भाई बुलाना चाहिए……..अनिल भाई मैं आपका तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ……

sanjay dixit के द्वारा
April 9, 2012

नमस्कार तमन्ना जी, जानकारी देने के लिए धन्यवाद तमन्ना जी,आपके लिख ने इन शख्स के बारे मे मेरे अन्दर उत्सुकता पैदा कर दी है अब तो इनका ब्लाग देखना पड़ेगा

follyofawiseman के द्वारा
April 4, 2012

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ……….आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार… यह खेल चले दो तीन महीने लगातार…. फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार….. डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार….. फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार…… तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार….. तमन्ना जी आपको मेरी ये रचना कैसी लगी…….?

चन्दन राय के द्वारा
April 3, 2012

तम्मना जी , आओ सहृदय सबका स्वागत करे , अच्छा बुरा तय करने वाले हम कौन , जो जैसा होता है उसे दुनिया वैसी दिखती है , चलो परस्पर सध्भाव् बनाये http://chandanrai.jagranjunction.com

follyofawiseman के द्वारा
April 2, 2012

तमन्ना जी, आपने लिखा की मैं ‘मानसिक रूप से डिस्टर्ब्ड’, मैं ऐसा क्यों हूँ जानने के लिए मेरी नवीनतम परस्तुति ”इश्क़ बुझता हैं इसको हवा दे सावन”  पढ़ें……

Tamanna के द्वारा
April 2, 2012

फ़ॉली जी के अनुसार मैं self-obsessed हूं.. मांफ कीजिएगा फॉली जी इस बार मैं आपका ही हथकंडा अपना रही हूं लेकिन यह दिखाने के लिए कि वास्तव में self-obsessed कौन है, मैं ऐसा करने के लिए विवश हूं… कुछ दिन पहले सिंसेरा जी कि जिस रचना को जागर्ण जंक्शन के अनुभवी लोगों ने बेस्ट श्रेणी में रखा था महाश्य ने सरिता को जी अपना नायाब कमेंट देकर सम्मानित किया… नीचे उनका कमेंट पोस्ट कर रही हूं …!!! वैसे तो कविता भाव जगत की चीज़ है, और वहाँ बुद्धि को लाना ठीक नहीं है और उचित भी नहीं, लेकिन मैं अपने आदत से मजबूर हूँ, और आपकी इस कविता को पढ़ने के बाद मेरे सर मे खुजलाहट हो रही है…..मैं अब खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ ….कुछ कहने से पहले, मैं ‘आँख से म्यूजिक सुनने के लिए आपसे माफी चाहता हूँ’……… शब्दो को आपने सुंदर ढंग से सजाया है……संदेश भी अच्छा दिया है आपने……..लोगो ने तारीफ भी खूब की है….तारीफ तो आप ने अब-तक खूब सुन ली, अब मेरी शिकायत सुनिए…..और वो भी कठोर शब्दो मे……….! ये कविता बुद्धि की उपज है, ख़ालिस विचार हैं,……इस कविता के जरिये आपने सिर्फ और सिर्फ अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है…….अगर किसी पुरुष ने इस कविता को लिखा होता तो मुझे कोई एतराज़ नहीं होता ….उसे माफ किया जा सकता था…..लेकिन आपके मामले मे……..इसे निगल पाना मुश्किल है,……काश ये आपके हृदय से उठी होती, अगर कहीं भी थोड़ी झलक भी भाव की मिलती, प्रेम की मिलती जो मे इसे झेल जाता, सिवाय मन के उदीग्नता के मुझे कहीं कुछ भी न दिखा,,,,अभी मैं जागरण पर ही किसी पुरुष लेखक की कविता पढ़ रहा है…..बकवास कविता थी लेकिन मैंने वाह…वाह कर दिया…..लेकिन आपके मुआमले मे ऐसा करना मुझसे संभव नहीं है…….मैं ऐसे कई स्त्री को जानता हूँ जो कवि है लेकिन उन्होने कभी कविता नहीं लिखा है……लेकिन आपके मामले मे बात उल्टी है…..आपने खूबसूरत कविता लिखी है…लेकिन आप कवित्री नहीं है………I am really sorry for saying so….but….I have to say this because I feel if one can really become mother, then why to adopt child…Can’t you get rid of your mind and really become a poet…? I am again sorry if i have said something offensive……! I had not said anything If I wouldn’t have loved your poem…..I felt like writing this because I really liked ur words…..but i felt these words are lacking soul,……! If you still find my comment offensive then, remove my comment and forget everything…..! सोच लीजिएगा कोई पागल यूँ ही कुछ बकवास करके चला गया…..!

    follyofawiseman के द्वारा
    April 2, 2012

    Sinsera जी ने मेरे उपरोक्त कमेंट पर जवाब मे क्या लिखा ये भी पढ़िएगा! “dear mr. wise man, there is one thing correct in ur comment that i’m not a poetess, and i dont want to be. acording to the definition of poem i.e. soft feelings, touchy words, superflous emotions..i find myself unable to write a single word. these lines are not a poetry. this is somewhat u can say a whistle of pressure cooker after getting high pressure, in order to prevent the fusion of safety valve. once i said about myself… “चुभे गा जो ख़ंजर तो ग़ज़लें बहें गी, रगों में शायर के जज़्बात रवां होते हैं…” और फिर मैंने क्या लिखा ये पढ़िए……. follyofawiseman के द्वारा April 2, 2012 ‘Sinsera जी, आपने लिखा हैं…….”i’m not a poetess, and i dont want to be.” पर, अगर चाहने से कोई कवि बन सकता था तो फिर क्या था(सबसे पहले मैं ही बन जाता)…… I don’t think one can will anything thing that is beautiful…….मेरे ख़याल से either you are a poetess or you are not……but you cannot make it happen…..! effort से बस तुकबंद हुआ जा सकता हैं….. आगे अपने लिखा हैं “acording to the definition of poem i.e. soft feelings, touchy words, superflous emotions..i find myself unable to write a single word.” but i am not interested in poem, i am concerned with poetess herself…….you may easily write or repeat that which is written in Gitanjali or Upnishand, but it does not mean that you yourself have become one who gave birth to Geetanjali or Upnishad…. मैंने आपकी कविता से शिकायत नहीं की थी, मुझसे तो आपसे शिकायत थी…और वो अभी भी हैं……मेरे ख़याल से सारे शब्द सुंदर हैं अगर वो किसी सुंदर हृदय वाले व्यक्ति से निकले…..बार बार आपको परेशान करने के लिए माफ़ी चाहता हूँ……’ आज मेरे मेरे ब्लॉग पर Sinsera जी ने क्या लिखा ये भी पढ़िए…. “शाबाश…. अपनी तकलीफ का काफी अच्छी तरह वर्णन कर गए आप… लेकिन एक बात तो मानते हैं न की आप मनुष्य ही हैं…”अनलहक़” कह देने भर से कोई खुदा तो नहीं हो जाता … फिर भी हर मनुष्य विचारवान भी नहीं होता , सब की ब्रेन केपेसिटी एक जैसी तो है नहीं…अब देखिये न ..आप ही की क्लास में पढ़े हुए बाकी बच्चे नौकरियां कर के मस्त हैं, खा पी कर सो रहे हैं और आप हैं की सरहदें मिटाने में लगे हैं…किताबी ज्ञान को थोथा कह रहे हैं…..पर अच्छा है कि आप ने साधु की तरह सार सार को रख कर थोथा उड़ा दिया.. आग अच्छी होती है लेकिन चूल्हे की…जंगल में लग जाये तो तबाही करती है… आप को आप की आग की बधाई, अब आप पर निर्भर है की आप इसको निर्माणकारी बनाते हैं या विनाशकारी….. कुछेक सौ साल पहले कार्ल मार्क्स ने भी ऐसे ही विचारों के साथ समाजवाद की कल्पना की थी…. अभी तक तो नहीं आया…” उनके इस कमेंट पर मेरे जवाब भी पढ़िए…. ‘एक दिन च्वांग-त्जु और उसका एक मित्र एक तालाब के किनारे बैठे हुए थे। च्वांग-त्जु ने अपने मित्र से कहा- “उन मछलियों को तैरते हुए देखो, वे कितनी आनंदित हैं”। “तुम स्वयं तो मछली नहीं हो”- उसके मित्र ने कहा,- “फ़िर तुम ये कैसे जानते हो कि वे आनंदित हैं?” “तुम ‘मैं’ तो नहीं हो”- च्वांग-त्जु ने कहा,- “फ़िर तुम यह कैसे जानते हो कि ‘मैं’ यह नहीं जानता कि मछलियाँ आनंदित हैं?” आप मेरे ब्लॉग पर आयीं इसके लिए मैं अनुग्रहित हूँ…….’

Rajesh Dubey के द्वारा
April 1, 2012

तमन्ना जी, जागरण जंक्सन ने बहुत लोगों को लेखक बना दिया है. तरह-तरह के प्राणी जागरण जंक्सन की दुनिया में हैं. किसी की प्रतिष्ठा अगर आपको गलियाने से बढती है, तो उसकी प्रतिष्ठा बढ़ने दीजिये. वैसे कीचड़ में पत्थर फेकने से क्या होता है, आपको पता है. इस लिए कीचड़ में पत्थर मत फेकिये. आपके सम्मान को कोई कुछ नहीं कर सकता.

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    राजेश दुबे जी.. सराहनीय प्रतिक्रिया देने के लिए आपका हार्दिक आभार…

    follyofawiseman के द्वारा
    April 2, 2012

    Dubey जी, जागरण जंक्शन की स्टार लेखिका तमन्ना जी मानती है कि मैं मानसिक रूप से विक्षिप्त हूँ, मैं ऐसा क्यों हूँ जानने के लिए पढ़ें मेरी नवीनतम परस्तुति “इश्क़ बुझता हैं इसको हवा दे सावन”

follyofawiseman के द्वारा
April 1, 2012

तमन्ना जी, afreen…..afreen, ख़ुदा कसम क्या अलख जगाई हैं आपने…….! मेरे जुबान पे तो आपने curfew लगा दी लेकिन लोगों का क्या करेंगी……? लोगों को आपका self-obsessed होना रास नहीं आ रहा हैं……. प्रतिक्रियाओं की बाढ़ देख कर आपको भी शायद इसका इल्म हो गया होगा……अगर कुछ कसर बाँकी हैं तो एक लेखक Pawansirivastwa(Laptop wala soofi) का आप पे लिखा लेख पढ़ लीजिए…….आपकी सुविधा के लिए…..उनका लेख आप तक forward कर रहा हूँ…………HERE IT IS… ” वो लेखिकाएं थी या WWF की पहलवान ? रात की स्तब्धता को चीरते जैसे कोई रात्री प्रहरी टाह देता हैं- “जागते रहो..जागते रहो”, यह जानते हुए भि कि कोई जगा नहीं , हर कोई रजनी की बाँह मे बेसुध लेटा हैं, मैं भी दरवाजे दरवाजे दस्तक देता था हिन्दी के अनकहे शब्दों का टोकरा लिए , यह जानते हुए भी कि कोई कदरदान नहीं , कोई मेरी पहुनाई करने वाला नहीं . मैं कौन- हाशिए पे खड़ा हिन्दी का एक लेखक, एक अफ़साना निगार, जिसे फक्र था, गौर कीजियेगा फक्र था कि – कुछ इस तरह हमारा अंदाज़े किस्सागोई होता है कि, खुद कहानी भी हमे बड़े शिद्दत से दाद दिया करती है भ्रम जल्दी हीं टूट गया, जब जद्दोज़हद और नाकामी के लंबे दौर के बाद मेरे ज्ञान चक्षु खुले और एहसास हुआ कि हाय – ‘गर ने रखते ये शौक-ए-सुख़न हम जो, दौरे मुफ़लिसी कब कि रवां हो गई होती पर आदत तो आदत है, गज़ब कि ढीठ….. मेरे बोधिसत्व पे भी हावी रही, और लिखवाती रही मुझसे, इधर उधर, कभी इस ब्लॉग पे तो कभी उस ब्लॉग पे ,तो कभी फ़ेसबूक पे! एक दिलचस्प वाकया सुनिए- फ़ेसबुक पे मैं अनवरत दिल के तह से निकली, जज़्बातों के फोहे मे लिपटी अपनी रचनाएं परोस रहा था, पर कोई भुला भटका भी, भूले से मेरे लिखे रचनाओं को पढ़ नहीं रहा था….दिल पे कटार तो तब चल गई जब देखा कि एक खूबसूरत नरगिसी बाला के, “आज मैं pizza खाऊँगी” पे १०४ liking और ५२ कमेंट थे !ज़िल्लत ने जोरों कि लात जमाई मुझे और मैं बेआबरू हो फिर ढूँढने लगा एक मुकम्मल मंच, अपने विचारों को पदासीन करने के लिए ….किसी ने बताया जागरण जंक्शन के बारे में….टोहता, तलाशता मैं पहुँचा जागरण जंक्शन के दरवाजे पे, पर ये क्या ! वहाँ तो कुछ लेखिकाओं का अहंकार सुरसा जैसा विकराल मुँह बाये खड़ा था ,सबको लीलने के लिए आतुर .जी हाँ लेखिकाएं …..चंद के नाम लेने की ज़ुर्रत कर रहा हूँ – कोमल नेगी, रश्मी खाटी , तमन्ना …सभी अपने नाम की सार्थकता भूलाए एक अज़ब हीं रूप में दिखीं….. देखा कोमल अपना कोमलत्व खोए बैठी है, तमन्ना कि सारी तमन्ना उसके निज-अस्तित्व को सींचने मे लगी है और रश्मी प्रचंड-दाह-विकर्ण बन हर उस लेखक को स्वाहा करने मे लगी है जो उसका थोड़ा भी वैचारिक प्रतिकार करता है…ऐसे एक भुक्तभोगी का नाम लेना चाहूँगा—-संदीप कुमार (wise man’s Folly)…वो लेखिकाएं थी या डबलू-डबलू-एफ़ की पहलवान ? हिन्दी के कलमकारों को बामुश्किल इज्ज़त मिलती है और हिन्दी के हीं हम-विरादरों के बीच इतनी खींचमतान,इतना जूतमपैजार देखकर बडा अफ़सोस हुआ….संदीप बेचारे पर अमर्यादित होने का आरोप लगाया गया था ….विडम्बना यह थी कि लेखिकाओं ने खुद बडा हीं अमर्यादित शब्दों क चयन किया था -’घटिया’ ’ छिछोरा’ जैसे शब्द …यह तो वही बात हो गयी कि किसी गाली देने वाले से जब जबाब-तलबी कि जाये तो वह कहे -कौन साला कह रहा है कि मैं गाली दे रहा हूं. मैंने संदीप जी के लिखे लेख को बार-बार पढा पर मुझे हर बार वो लेख मतान्तर दर्शाने वाला लेख मात्र लगा …..मर्यादा के हर सम्भावित प्रतिमानो पे मैंने उसे परखा पर किसी भी नज़रिये से मुझे संदीप जी का लेख अमर्यादित न लगा….मैंने उन लेखिकाओं के सुन्दर चेहरे का सुमिरन कर अपने अन्दर एक पुर्वाग्रह भी पैदा की पर तब भी संदीप जी के मर्यादा कि डंडी डिगती दीखाई न पडी …..अंतोगत्वा जो समझ में आया वह यह कि ऐसी लेखिकाओं को तल्खियत भरी सच्चाई से रुबरू कराना भी एक अपराध है ……समझ में आया कि हर वो लेख जो इन लेखिकाओं के प्रति जरा भी विरोधाभास का पूट लिये है-अशोभनीय है,अमर्यादित है,असंसदीय है और आज मैंने भी यह अपराध कर दिया है .अब देखना है कि लेखिकाओं की ये राखी सावन्त मुझे किन विशेषणो से नवाज़ती हैं-घटिया ,छिछोरा या कुछ और ……अंत मे उन लेखिकाओं के प्रतिक्रियात्मक और रोष भरे उस लेख के बारे में यही कहना चाहुंगा कि- वह लेख था या किसी के आत्ममुग्धीकरण में की गई आत्म-वंचना थी वह लेख था या किसी के अहंकारों के इती-वृत की संप्रेषणा थी वह लेख था या कलम की पहुनाई थी वह लेख था या चाकरी करती रौशनाई थी” PAWAN SRIVASTAVA

yogeshkumar के द्वारा
April 1, 2012

तमन्ना जी मुझे संदीप के ब्लॉग में कोई खामी समझ में नहीं आती …. बल्कि उनका लिखने का अंदाज अलग है… आप को अपने ब्लॉग में तारीफे तो बहुत मिलती हैं… मगर आलोचना को भी स्वीकार करना चाहिए .. अक्सर तारीफ़ लिखने वाले लेख को एक नज़र पढ़ते हैं… जबकि आलोचना करने वाले गहन विचार करते हैं… अपने आप में किसी ने अगर आप का लेख पढ़ा और कमेंट किया तो ये एक ख़ुशी की बात है उसने कुछ समय निकला आपके विचारों के प्रति…. जबकि आजकल जमाना तो ऐसा है की लोग सड़क पर मरते आदमी के लिए समय नहीं निकाल पाते अपनी व्यस्त जिंदगी से… और ये Mr FOLLY के लिए भी सौभाग्य की बात हैं जो आपने उनके लिए इतना समय निकाला.. बहुत ही क्लिष्ट भाषा में उनका महिमा मंडन किया…

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    योगेश जी… आप आलोचनाओं को स्वीकार करने की बात कर रहे हसिं तो कृप्या कर मेरे कुछ विवादास्पद ब्लॉगों पर भी नजर डालिए. मैं आलोचनाओं से नहीं घबराती, मुझे इन महाश्य की सोच से परेशानी है. मानसिक रूप से डिस्टर्ब्ड होने के कारण अन्य ओगों को डिस्टर्ब करना इनका शौक हो सकता है लेकिन उन्हें अपने इस शौक को तथ्यों और अंतिम निर्णय की तरह नहीं रखना चाहिए. नया सोचना सभी का अधिकार है और समाज के लिए हितकर भी, लेकिन अगर आपका नई सोच इतनी छोटी है तो बेहतर है उसे दूसरों के समक्ष रखकर अपनी महान सोच का प्रमाण ना दें.

prateekraj के द्वारा
April 1, 2012

तमन्ना जी ! मैंने संदीप जी का ब्लॉग देखा है और उसे देखने के बाद मैं उन्हें गलत नहीं कह सकता. क्योंकि उनके ब्लॉग के ऊपर लिखा है “लोगो को डिस्टर्ब करने के लिए” जो कि शायद उन्होंने किया भी है,मंशा जो भी रही हो.हो सकता है कि उनके कमेंट्स कटु हों पर उन्होंने पहले ही कह रखा है कि वो डिस्टर्ब करने के लिए लिख रहे हैं तो इस तरह से तो वो अपने काम में खरे साबित हो रहे हैं.और अगर हमें उनकी बातें पसंद नहीं हैं तो फिर हमें उस पर ध्यान नहीं देना चाहिए. मुझे भी उनकी कुछ बातें सही नहीं लगी थी(जैसे कि समाज को नहीं बदला जा सकता) और इससे मैंने उन्हें अवगत भी कराया पर मैं इतना समझ गया था कि उनके ब्लॉग कि टैग लाइन(डिस्टर्बिंग ब्लॉग) पढने के बाद अगर हम आगे ब्लॉग पढ़ते हैं तो उसके बाद हमें ये नहीं कहना चाहिए कि वो गलत कर रहे हैं.क्योंकि एक तरीके से देखा जाये तो वो अपनी कथनी को ही करनी में बदल रहे हैं. अगर हमें लगता है कि वो गलत हैं, हमें नापसंद है तो फिर उन्हें नज़रंदाज़ कर दिया जाये.फिर कोई परेशानी नहीं होगी और कोई विवाद भी नहीं होगा. रही बात जंक्शन का गलत इस्तेमाल करने की तो लोग कहते हैं की चाँद में दाग है पर अगर हम देखना चाहे तो हम उस चाँद की अपार सुन्दरता को भी देख सकते हैं.वैसे ही इस जंक्शन में भी बहुत से अच्छे लेखाकगड़ मौजूद हैं उनकी रौशनी से भी आनंदित हुआ जा सकता है. आप मुझसे काफी अनुभवी हैं फिर भी राय देने कि कोशिश कि है क्षमा कीजियेगा. धन्यवाद

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    प्रतीक जी… निश्चित ही ब्लॉगिंग का अर्थ किसी को डिस्टर्ब करना नहीं है, लेकिन अगर फॉली जी डिस्टर्ब करने पर उतारू है तो ऐसा ही ठीक है. मुझे सिर्फ उनकी मानसिकता से प्रॉबलम है. सबसे पहले उन्हें महिलाओं और युवतियों के प्रति अपनी सोच बदलने की जरूरत है, उनका सम्मान करने की जरूरत है. अपने हर ब्लॉग पर किसी ना किसी महिला को निशाना बनाना और कुछ पर तो संपूर्ण नारी जाति पर हमला करना कहा कि परिपक्वता है. इस ब्लॉग पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए शायद किसी को भी अनुभव की जरूरत नहीं केवल सही दृष्टिकोण की आवश्यकता है.

    follyofawiseman के द्वारा
    April 2, 2012

    प्रतीक जी, हमारे जागरण जंक्शन की स्टार लेखिका तमन्ना जी मानती है कि मैं मानसिक रूप से विक्षिप्त हूँ, मैं ऐसा क्यों हूँ जानने के लिए पढ़ें मेरी नवीनतम परस्तुति “इश्क़ बुझता हैं इसको हवा दे सावन”

    prateekraj के द्वारा
    April 2, 2012

    तमन्ना जी…मैं आपकी बात से सहमत हूँ की ब्लॉग्गिंग का मतलब किसी को डिस्टर्ब करना नहीं है.और जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ कि मैं मानता हूँ कि उनकी बहुत सी बाते गलत हैं जो कि बदलनी भी चाहिए पर उन्हें ऐसा नहीं लगता है तो मैं बस ये कहना चाहता हूँ कि आपको उन सब बातों को तवज्जो नहीं देनी चाहिए उससे ये सब स्वतः ही बंद हो जायेगा. रही बात कमेंट्स कि तो आपके लेखों को बहुत से कमेंट्स मिलते हैं जिनमे से ज्यादातर मर्यादित होते हैं उनमे से एक को नज़रंदाज़ करना मुश्किल नहीं होना चाहिए ये जानने के बाद कि आप उन्हें समझाने कि कोशिश कर चुकी हैं. इस मंच पर बहुत सी पोस्ट्स हैं जिनमे कि महिलाओ के हक के लिए लिखा गया है तो हम समझ सकते हैं कि यहाँ महिलाओ का सम्मान करने वालो कि संख्या कहीं ज्यादा है.

follyofawiseman के द्वारा
March 31, 2012

साहब, ये रहा आप सबका प्यारा, बिगड़ा हुआ, रश्मी जी की जुबान मे कहें तो छिछोरा, लेखक संदीप कुमार उर्फ Folly जी (ये उप नाम मुझे तमन्ना जी से मिला है, इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ,)…! साहब, आप सबको मेरे ब्लॉग तक पहुँचने मे दिक्कत न हो इसी लिए मैं अपना ब्लॉग add यहाँ पेस्ट कर देता हूँ…..http://follyofawiseman.jagranjunction.com/   मेरे ब्लॉग का नाम Wise Man’s Folly हैं ! आप पढ़े और स्व-विवेक से ये बताएँ के मैंने क्या अपराध किया है,,,,, !

pawansrivastava के द्वारा
March 31, 2012

तमन्ना जी, चुंकि आप तहज़ीब की ज़बर्दस्त तलबगार हैं ,आदाब से भी ज़यादा तहज़ीबदार लफ़्ज़ अगर कोई है तो वो अर्ज़ है आपको.आपने जिस संदीप जी(wise man folly )को घटिया और छिछोरा कहा है,वैसी बेबाकी और पोशिदगी अगर सब अपने दिल मे ले आयें तो यकीन मानिये इस जहां का काया-कल्प हो जाए….काश आपके दनिश्गी में वो पैनापन होता,आपके जज़्बातों में वो बारीकी होती तो आप संदीप जी के लिखे शब्दों का मतलब समझ पातीं….आपको जो बेलौस,बेतरीब,बेअदबी से भरे उनके अल्फ़ाज़ दिख रहे हैं,उनके दबीज़ सतहों को तोडकर तो देखिये,अन्दर शफ़कत का समन्दर दिखेगा आपको…संदीप जी ने कोई बेअदबी नहीं की है ….हां गलती उन्होने ज़रूर की है,आपके अहम को ठेस पहूंचाने की ….वही हिमाकत मैं भी कर रहा हूं….मुझपे भी ’छिछोरा’ या ’घटिया’ जैसा कोई विशेषण नवाज़ दिजियेगा ….आपके लिये अपनी लिखी दो कवितायें भेज रहा हूं,हो सके तो कोशिश किजियेगा उन्हें समझने की….आपका शुभेच्छू -पवन श्रीवस्तव. 1) एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है वो पागल है कि चांद को महबूबा नहीं कहता है वो पागल है कि भीड की भाषा से जुदा रहता है दिन को दिन कहता है रात को रात कहता है देखिये पागल को, कैसी बहकी बात कहता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है दुनियां आती है जब तहज़ीबों का चोला पहनाने फ़ेंक के काबा-ए-तकल्लुफ़ वो नंग रहता है नफ़ासत की तलवारों से कटते सिर देख के, जाहिल उज्जड वो बडा दंग रहता है सिर गिनता है वो मकतूलों के, कातिलों के खंज़र गिनता है देखिये पागल वो दुनियां के कैसे मंज़र बिनता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है वो पागल है कि उसकी ज़ुबां में तल्खियत है सच्चाई की , तंज़ बहुत है; वो अहमक है जो नहीं जानता कि इस दुनियां में सच्चों से लोगों को रंज़ बहुत है; झूठ की लानत-मलामत करता है वो सच की खुशामद करता है, देखिये कैसा पागल है वो कि न अदा-ए-बनावट करता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है 2) चलो पाबंदियों के कैंचुल उतार थोडा हल्के हो लें और पुरकैफ़ हवाओं में हम आज़ाद डोलें उडें मरज़ी के आसमान में हम इधर-उधर चलो बेफ़िक्री के आलम में थोडा खो लें; इस अदब और तहज़ीब की दुनियां में है हीं क्या, झूठी मुस्कराहट,नकली सलाम और अनमनी दुआ; परम्पराओं के परकोटे हैं, मज़हब की सददें हैं, बंदिशें हैं,बेडियां हैं और मुल्कों की सरहदें हैं; चलो अब हर दिवार गिरा दें और बंदिशों की हर बेडियां काटें चलो अब हर अदना-ओ-आला में सुख-दुख बराबर बांटें अब प्यास को चुनने दें प्याला हम और रिंद को मैकदा चुनने दें, अब ज़ुबां को चुनने दें तकल्लुम हम और होठों को तबस्सुम चुनने दें अब आंखों को चुनने दें मंज़र हम और ज़िस्म को कबा चुनने दें, अब रियाज़त को चुनने दें मसीहा हम और ज़ुर्म को सज़ा चुनने दें; चलो पाबंदियों के कैंचुल उतार थोडा हल्के हो लें और पुरकैफ़ हवाओं में हम आज़ाद डोलें;

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    पवन जी…इस मंच पर सभी लेखक अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र हैं, इसमें अहम को ठेस पहुंचाने जैसी बातें कर आप यहां विवाद खड़ा ना करें. मुझे आपके मित्र फॉली जी के अलग सोचने से कोई आपत्ति नहीं है, मुझे आपत्ति उनकी सोच से हैं. उनके निम्न विचारों से हैं…जो व्यक्ति महिलाओं को सम्मान देने जैसी बात सोच भी नहीं सकता पता नहीं क्यों उसकी पैरवी की जा रही है. यह मंच गरिमामय है और इसकी गरिमा बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है. जहां तक आप घटिया और छिछोरा शब्द प्रतोग कर रहे हैं तो आपको कुछ भी बोलने से पहले यह भी समझ या जान लेना चाहिए कि आपके आदरणीय मित्र के विरुद्ध मैंने इन शब्दों का प्रयोग किया ही नहीं है. बेवजह आप जिस बेबाकी की आप बात कर रहे हैं वह बेबाकी नहीं छोटी और घृणित मानसिकता से अधिक और कुछ नहीं है. अन्य लोगों से भिन्न दिखाना तो ठीक है लेकिन यह भिन्नता कितनी हो और किस सीमा तक हो यह बात बहुत ज्यादा मायने रखती है. सभी की सोच एक जैसी नहीं हो सकती, ना ही सोचने का दायरा सीमित हो सकता है लेकिन विचारों को परिष्कृत रखना हमें खुद ही सीखना होता है, जैसे हम सोचते हैं हम वैसा ही व्यवहार करते हैं. खुद को इतना अधिक स्वच्छंद भी नहीं रखना चाहिए कि आप दूसरों के लिए मुश्किले पैदा कर दें.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 31, 2012

आदरणीय तमन्ना जी. सादर अभिवादन. लेखक महोदय को मैं चिन्हित नहीं कर सका . अवश्य जानूंगा.

    follyofawiseman के द्वारा
    March 31, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी प्रणाम, ये रहा आप का प्यारा, बिगड़ा हुआ, रश्मी जी की जुबान मे कहें तो छिछोरा, अबोध लेखक संदीप कुमार उर्फ Folly जी (ये उप नाम मुझे तमन्ना जी से मिला है, इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ,)…! साहब, आप सबको मेरे ब्लॉग तक पहुँचने मे दिक्कत न हो इसी लिए मैं अपना ब्लॉग add यहाँ पेस्ट कर देता हूँ…..http://follyofawiseman.jagranjunction.com/   मेरे ब्लॉग का नाम Wise Man’s Folly हैं ! आप पढ़े और स्व-विवेक से ये बताएँ के मैंने क्या अपराध किया है,,,,, !

akraktale के द्वारा
March 31, 2012

तमन्ना जी सादर नमस्कार, आपने श्रीमान संदीप को पढने के लिए लिखा था मैंने भी गलत आंकलन हो इसलिए इनके अब तक के सारे आलेख पढ़ डाले और मुझे लगता है की व्यर्थ बहस को यदि ये ब्लॉग पर नहीं लाते तो विवाद जैसा कुछ भी नहीं है. हाँ इनके लेखन में उन्मुक्तता है. युवा है, भावावेग में कुछ अधिक ही लिख जाते हैं मगर लेखन में एक नयापन है.धीरे धीरे समझ जायेंगे की कितना उन्मुक्त लेखन यहाँ ठीक है.बेहतर है हम अपना लेखन जारी रखें और उनके नयेपन को स्वीकार नहीं कर सकते तो प्रतिक्रया देने से भी परहेज ही करें. फिरभी यदि कोई व्यक्तिगत विवाद की स्थिति आती है तो इनकी अवश्य ही शिकायत करेंगे. किन्तु मुझे नहीं लगता की यह युवा विवाद करने के लिए लिख रहा है.

    RaJ के द्वारा
    March 31, 2012

    ऐ के रक्ताले जी का आकलन सही है यदि लेखन केवल फूहड़ है तो अपनी maut khud मर जायेगा kisi व्यक्तिगत पसंद न पसंद को basah के रूप न लिया jaye तम्मना जी को इस मंच पर काफिन सराहना मिली है mahilaon को हमेशा tarjih यह मंच देता आया है http://www.jrajeev.jagranjunction.com

Santosh Kumar के द्वारा
March 31, 2012

तमन्नाजी ,.सादर नमस्कार इंसान का भ्रमित होना स्वाभाविक है ,.कोई भी हो सकता है चाहे वो वाइज हो या मूर्ख ,.इनकी कोई रचना तो नही पढ़ पाया किन्तु सरिता जी के ब्लॉग पर प्रतिक्रिया देखी थी ,.मुझे तो कोई सिद्ध आलोचक लगे थे ,.अब आपने भी शोध किया है तो उम्मीद करता हूँ कि ये अवश्य ही आपका शोधपत्र पढ़कर अपना भ्रम दूर करने में सफल होंगे ,.आभार सहित

    Tamanna के द्वारा
    April 2, 2012

    संतोष जी… मुझे लगता है आपको इनका ब्लॉग भी पढ़ना चाहिए.. सरिता जी की पोस्ट पर आपने इनकी प्रतिक्रिया देखकर यह तो जान ही लिया होगा कि इस मंच पर इनसे बड़ा और कोई लेखक नहीं है, लेकिन अगर आप इनके ब्लॉग पढ़ेंगे तो आप यह भी समझ जाएंगे कि इनकी सोच कितनी छोटी है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि हमारी बातों का इन महाशय पर किसी भी प्रकार का कोई असर पड़ेगा.

    follyofawiseman के द्वारा
    April 2, 2012

    संतोष जी, जागरण जंक्शन की स्टार लेखिका तमन्ना जी मानती है कि मैं मानसिक रूप से विक्षिप्त हूँ, मैं ऐसा क्यों हूँ जानने के लिए पढ़ें मेरी नवीनतम परस्तुति “इश्क़ बुझता हैं इसको हवा दे सावन”


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