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पूंजीवाद के सर्वश्रेष्ठ एजेंट के रूप में उभरे थे महात्मा गांधी !!

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इस बात पर विचार और विमर्श हमेशा होते रहते हैं कि आज के समय में गांधी दर्शन का क्या औचित्य है? लेकिन इस सवाल की प्रासंगिकता को हम हर दिन देखते और महसूस कर सकते हैं. आय का असमान वितरण, किसी के पास इतना धन है कि वह पालतू जानवर को भी ब्रांडेड बिस्किट खिला सकता है, तो कोई परिवार के लिए दो वक्त की रोटी अर्जित करने के लिए पूरा दिन मेहनत करता है. कोई आलीशान घरों में रहता है तो किसी के छोटे से घर को भी अवैध करार देकर हटवा दिया जाता है. आज हमारी पीड़ित आत्मा की आवाज उन्हीं महान गांधी की ही देन है.


mahatmaमोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें हम राष्ट्रपिता और महात्मा गांधी कहकर पुकारते हैं, ने जिस चतुराई के साथ आम जनता को मूर्ख बनाया शायद वह किसी और व्यक्ति के लिए संभव नहीं था. पूंजीवाद के मसीहा बनकर उभरे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने वह कर दिखाया जो दुनियांभर के पूंजीवादी कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे. आम जनता और पूंजीवाद के आदर्शों में अंतर्विरोधों का सिलसिला बहुत पुराना था, जो गांधी जी से पहले किसी भी रूप या परिस्थिति में जनता द्वारा स्वीकृत नहीं किया जा रहा था. बस यहीं से गांधी जी द्वारा जनता के साथ विश्वासघात का सिलसिला शुरू हो गया.


जनता को न्यूनतम साधनों में जीना सिखाने वाले गांधी साधारण वस्त्र और खाना खाते थे, लेकिन ताउम्र वह  Bentley गाड़ियों में घूमे. बिरला भवन जैसे आलीशान आवास में रहे यहां तक कि उनका देहांत भी बिरला मंदिर में ही हुआ. ऐसा नहीं है कि गांधी जी से पहले पूंजीवाद का समर्थक कोई विचारक या चिंतक नहीं हुआ, लेकिन उनमें से कोई भी जनता के दिलों में पूंजीवाद के लिए स्थान नहीं बना पाया.


वर्ष 1906 में जब देश में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई उस समय गांधी जी भारत में नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों और काले लोगों को अधिकार दिलवाकर वहां पूंजीवाद को स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे. भारत आते ही उन्होंने अंग्रेजी सेना में भारतीयों की भर्ती करवाने का बीड़ा उठाया. इसके पीछे भी उनका उद्देश्य स्वयं को पूंजीवाद का समर्थक घोषित करवाके अंग्रेजों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना था. लेकिन महात्मा गांधी के सादे सूती वस्त्रों से प्रभावित होकर रबिंद्रनाथ टैगोर ने उन्हें महात्मा का दर्जा दे दिया.


चंपारन सत्याग्रह में छुट-पुट मांगे मनवाकर वह संतुष्ट हो गए और बाद में अंग्रेजी मीडिया ने उन्हें इतना अधिक प्रचारित किया कि वह एक राष्ट्रनायक के रूप में उभरने लगे. फिर शुरूआत हुई असहयोग आंदोलन की, कहने को यह असहयोग आंदोलन था लेकिन इसमें भी उन्होंने अंग्रेजों का ही साथ दिया. गांधी यह जानते थे कि जब इतनी भारी संख्या में जनता इस आंदोलन से जुड़ेगी तो अंग्रेजों के विरुद्ध उनके आक्रोश को दबाना बेहद मुश्किल हो जाएगा इसीलिए उन्होंने अहिंसा को ही आंदोलन की सबसे पहली शर्त बता जनता पर थोप दिया. जबकि वह स्वयं भी यह जानते थे कि अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए आक्रोश और हिंसा बेहद जरूरी है.


निश्चित तौर पर गांधी जी का उद्देश्य स्वदेशी के नाम पर भारतीय पूंजीपतियों को बेहतरीन अवसर मुहैया कराना था, उन्हें भारत समेत विभिन्न देशों में अपनी कंपनियां स्थापित करने का अवसर देना था. हम इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि इन सब के पीछे गांधी जी यह चाहत कि पूंजीवाद केवल इंगलैंड में ही नहीं भारत में भी मजबूत नींव बना ले, विद्यमान थी.



bhagath_081411-1गांधी दर्शन में उग्रवाद और हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है. इसीलिए उन्होंने भगत सिंह जैसे कट्टर समाजवादी क्रांतिकारी को, जो भारत में समाजवाद स्थापित करने के पक्ष में था, पूंजीवाद के लिए खतरा बन सकता था, बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. गांधी जी एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनके एक इशारे पर भगत सिंह की फांसी रुक सकती थी लेकिन उन्होंने अपने मार्ग के सबसे बड़े कांटे भगत सिंह को हटाकर ही सांस ली.


आज भी पूंजीवाद पर आधारित भारतीय और विदेशी संस्थान गांधी जी के आदर्शों पर शोध करते हैं. Gandhian Thought of Trusteeship पूंजीवाद को संरक्षण देने वाला सबसे खतरनाक फंडा है. जिसके अंतर्गत सारी धन संपत्ति और साधन एक ही संस्था को सौंप दिए जाते हैं और आम जनता को सिर्फ प्रलोभन दिए जाते हैं. ऐसे प्रलोभन जो उसे अपने साथ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज तक उठाने नहीं देते. उनका यह सिद्धांत पूंजीवाद की प्राथमिकताओं को पूरी तरह समर्थन देता है.


अमानवीय पूंजीवाद की मजबूत होती जड़ें उसी कथित महात्मा ने तैयार की थी जिसको आज पूरी दुनिया पूज्यनीय मानती है. बेबस इंसानों की चीखती आवाजें कितनी आसानी से महात्मा के अहिंसा के सिद्धांत ने दबाकर पूंजीपतियों के लिए मुक्ति और विकास का मार्ग खोल दिया कि आज हम समाजवाद पर पूंजीवाद के अधनायकत्व के बावजूद उसी का गुणगान करते नजर आते हैं.




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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मृत्युँजय कुमार के द्वारा
November 8, 2012

तमन्ना जी शायद आचार्य रजनीश के पदचिन्हों पर चल रही हैं जिन्होंने अमेरिका जाकर प्रसिद्द होने के पूर्व ही जबलपुर में अपने निवास के दौरान एक बेहद स्टायलिश टिप्पणी की थी – “अगर प्रसिद्द होना तो ठीक उल्टा करो उसके जो दुनिया करती है |” उन्होंने यह केवल कहा ही नहीं पर कर भी दिखाया था | जबलपुर में वह अक्सर दिन दहाड़े कुएँ पर नितांत नग्न स्नान किया करते थे | तमन्ना जी भी ऐसा ही कर रही हैं | उनके ब्लॉग का शीर्षक बेहद आकर्षक और सनसनीखेज होता है जैसे “पूंजीवाद के सर्वश्रेष्ठ एजेंट के रूप में उभरे थे महात्मा गांधी !!” या “क्या सीता के चरित्रोन्नायक महाकवि नारी द्रोह के अपराधी हैं” | सच कहूँ तो मैं भी सीता शीर्षक वाले ब्लॉग को ही पढ़ने बैठा था पर मुझे क्या मालूम था कि वहाँ तो “खोदा पहाड, निकली चुहिया ” वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी | पुनश्च गांधीजी के शीर्षक वाली ब्लॉग पढते ही बरबस ही आचार्य रजनीश की याद आ गयी | ईश्वर बचाए ऐसे ब्लॉगर्स से ….|

pritish1 के द्वारा
July 18, 2012

तमन्ना जी…….मैं आपके सभी विचारों से सहमत हूँ…… वन्दे मातरम………!

    pritish1 के द्वारा
    July 18, 2012

    मेरा प्रणाम स्वीकार कीजिये……..

Ashok K. Vyas के द्वारा
June 24, 2012

यह लेख एक बेहूदा बक़वास के सिवा और कुछ नहीं है

    pritish1 के द्वारा
    July 18, 2012

    लगता है आप भी उसी सभ्य समाज के निवाशी हैं……जिनका निर्माण गाँधी जी ने किया…..हम हमेशा गाँधी जी के बन्दर बने रहे और परिणाम आज देश की अवस्था है हो सकता है आप उस भारत से भिन्न है जहाँ भूख है डर है तनाव है ………भर पेट भोजन नहीं……कुछ करने का अवसर नहीं……..जहाँ कोई सपने नहीं………किन्तु मैं उसी भारत का निवासी हूँ जब ऐसे भारत को देखता हूँ अहसास करता हूँ यही जीता हूँ तो मेरी रूह कांप उठती है…….खून खौल उठता है…….भारत में उपस्थित सभी देशद्रोहियों का अंत निकट है…..वो दिन दूर नहीं जब इतिहास बदल जायेगा भारत हमारा भारत बन जायेगा………नेताजी सुभाष और सभी क्रांतिकारियों की आत्मा को शांति मिलेगी……….

suman के द्वारा
June 24, 2012

nice

May 15, 2012

तमन्ना जी नमस्कार बहुत सही बात कही है आपने आपने एक नए सोच को इस मंच के माध्यम से पेश किया अच्छा लगा कृपया मेरा नवीनतम ब्लाग पढने का कष्ट करे और अपनी विचार दे

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 13, 2012

आदरणीय tamanna ji, saadar arth शास्त्र kabhi मेरा विषय नहीं raha, जैसे तथ्य इस मंच पर तमाम लेखकों द्वारा रखे गए है उनके आधार पर inhen doshmukt नहीं kiya ja sakta. meri ४९ विन पोस्ट main उसे जनम doongi को लिखते समय बार बार आपका ध्यान आता था और अब भी है. आपके लेख की प्रतीक्षा रहती है.

kabeer के द्वारा
May 7, 2012

आपका ये ब्लॉग आपके पूर्व के ब्लॉग ” क्या वाकई विवादास्पद है महात्मा गांधी का राष्ट्रपिता होना !!” से अलग विचार रखता है.. मैंने यहाँ पर कई सारे ब्लॉग पढ़े गाँधी को लेकर.. यही महसूस किया कि गाँधी को महिमामंडित किया गया है… हकीकत को छुपाया गया है… देश को हकीकत जानने का अधिकार है.. सोशल मीडिया इसमें आजकल मुख्य भूमिका निभा रहा है… खैर साधुवाद… आप मेरा भी ब्लॉग देखें गाँधी से सम्बन्धित ..” गाँधीजी कि सेक्स लाइफ” ….

vikasmehta के द्वारा
May 7, 2012

tamnna ji bahut hi खुसी की बात है की आप जैसे साहसी लोग देश के लिए सच लिखते है मै आपको सैलूट करता हूँ ! लिखते रहे वन्दे मातरम

munish के द्वारा
May 7, 2012

हा हा हा हा , कितना अच्छा लेख लिखा है ……… मजेदार बात तो ये है तारिकिक भी नहीं है, एतिहासिक द्रष्टिकोण भी छिपे हुए हैं…….. सामाजिक पहलू तो कोई है ही नहीं…….. और मजेदार बात तो ये की गांधीजी के विषय में भी कुछ पता नहीं ……… कुल मिला कर न बहस का विषय है और न ही ज्ञान बढाने का, न मनोरंजन का फिर भी हँसा जा सकता है…… हा हा हा हा

    vikasmehta के द्वारा
    May 8, 2012

    tamnna ji aap accha likh rahi hai .apke agle lekh ka intezar rahega ……..

    pritish1 के द्वारा
    July 18, 2012

    मुझे दुःख है की आप जैसे लोगों की संख्या भारत में अधिक है जो गाँधी जी के बन्दर हैं न बुरा देखो न सुनो न कहो………..अर्थात बुरा करने की खुली छुट होनी चाहिए कोई आपत्ति करे भी तो कैसे? गणाधी जी महान कभी नहीं थे अंग्रेजों ने उन्ही महान बनाया और हम उनका ही गुणगान करते हैं जिनके कारण आज देश तड़प रहा है हो सकता है आप उस भारत से भिन्न है जहाँ भूख है डर है तनाव है ………भर पेट भोजन नहीं……कुछ करने का अवसर नहीं……..जहाँ कोई सपने नहीं………किन्तु मैं उसी भारत का निवासी हूँ जब ऐसे भारत को देखता हूँ अहसास करता हूँ यही जीता हूँ तो मेरी रूह कांप उठती है…….खून खौल उठता है…….भारत में उपस्थित सभी देशद्रोहियों का अंत निकट है…..

yogi sarswat के द्वारा
May 7, 2012

तमन्ना जी , मैं इस विषय में ज्यादा तो नहीं जानता किन्तु आपकी एक बात से सहमत हूँ की अगर गाँधी जी चाहते तो भगत सिंह की फंसी की सजा माफ़ हो सकती थी ! शेष आपका अपना नजरिया है , गाँधी जी को और उनके विचारों को समझने का , कहने का ! गाँधी जी भी एक इन्सान थे , एक पढ़े लिखे इन्सान ! भगवन नहीं ! तो हो सकता है कुछ गलतियाँ रही हों उनमें भी , कोई परफेक्ट नहीं होता ! तो क्या उनकी कुछ गलतियों के लिए उनके आदर्शों और उनकी शिक्षाओं को नाकारा जा सकता है ?>

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 6, 2012

इस बार आप कुछ ज्यादा ही भटकी हुई लग रही है उम्मीद करता हूँ आपके अगले लेख में गाड़ी सही ट्रैक पकड़ लेगी इससे पहले की तरह

    Tamanna के द्वारा
    May 8, 2012

    राजकमल जी.. अगर आप मेरे लेख की गति को लेकर बात कर रहे हैं तो अगरली बार और अच्छा लिखने का प्रयत्न करुंगी लेकिन अगर आपका इशारा विषयवस्तु की तरफ है तो मैं आपके दृष्टिकोण को जानने की भी इच्छुक हूं.

चन्दन राय के द्वारा
May 6, 2012

तमन्ना जी, आप तो हाथ धो के गाँधी जी के पीछे पड़ गई है , पर मेरा ये मानना है की हम उस दौर में नहीं थे ,इसलिए किसी भी विषय पर इतने विश्वाश से कहना बेमानी होगी , पर आपका नजरिया का सम्मान करता हूँ , कृपा मेरे विचार स्वस्थ रूप में ले , यह मन के सत्यवचन , भेडचाल नहीं

    Tamanna के द्वारा
    May 8, 2012

    चंदन जी… हम उस काल में तो नहीं थे, लेकिन उस युग से जुड़े प्रमाणों के अनुसाराअज तो निर्णय ले सकते हैं. गांधी जी से उलझ कर मुझे तो कुछ नहीं मिलेगा. मैं बस यह समझाने की कोशिश कर रही हूं कि जिस पूंजीवाद के कारण आज समानता की अवधारणा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है उसकी नींव समाजसेवक महात्मा गांधी ने स्वयं अपने हाथों से रखी थी.

shashibhushan1959 के द्वारा
May 6, 2012

आदरणीय तमन्ना जी, सादर ! मैं राजनीती का जानकार नहीं हूँ पर गांधी जी का कट्टर समर्थक भी नहीं हूँ ! मेरे विचार से गांधी जी अपने अंतर्मन से बहुत भीरु और अहंकारी व्यक्ति थे ! आज उनकी इसी भीरु और दबी-डरी हुई प्रवृति का प्रतिफल पूरा देश भुगत रहा है ! हार्दिक आभार !

    Tamanna के द्वारा
    May 8, 2012

    शशिभूषण जी.. हर इंसान से गलतियां होती है. लेकिन बहुत लोगों के लिए गांधी जी के उद्देश्य संदेहजनक थे. महात्मा गांधी पूंजीवाद के समर्थक और समाजवाद के विरोधी बनकर उभरे थे इसमें कोई शक नहीं रह जाता.

dineshaastik के द्वारा
May 6, 2012

तमन्ना जी मैं गाँधी जी का समर्थक  नहीं हूँ, किन्तु फिर  भी आपके तर्कों से सहमत  नहीं हूँ। आपकी यह बात  कैसे हजम  कर लूँ कि गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन अंग्रेजों का साथ  देने के लिये किया था। क्षमा करना आरंभ  में ही आपने  ऐसी अतार्किक  बात  कह दी कि आलेख  को पूरा पढ़ने की इच्छा नहीं हुई। गाँधी  जी की आलोचना करने के अनेक  विषय हैं। इस  संबंध  मे अनेक  आलेख  लिखे भी गये हैं। लोगों ने उनका समर्थन  भी किया है। आपका समर्थन  करना बड़ा ही हास्यासपद  हो जायगा। मेरे घर(ब्लॉग) भी आने की कोशिश  करिये….मैं तो गहे गवारे आ   ही जाता हूँ।

    Tamanna के द्वारा
    May 8, 2012

    दिनेश जी… मुझे लगता है हर वो बात जिसे हम मानना नहीं चाहते गलत नहीं होती. गांधी जी द्वारा चलाए गए सभी आंदोलनों का फायदा अंग्रेजों और पूंजीपतियों को हुआ. मैंने जिन मुद्दों को यहा उठाने की कोशिश की है आप उनपर ध्यान देंगे तो आपको शायद कुछ हदतक मेरी बात सही लगें.

bharodiya के द्वारा
May 5, 2012

तमन्ना जी मैं गान्घी समर्थक या असमर्थक नही हुं । जब आदमी बडा बन जाता है तो उन को कहां जाना कैसे जाना, कहां रूकना वो उन के आस पास के लोग तय करते हैं । बापूने कहा होगा मेरे लिए घोडागाडी लाओ । लोगोने समजाया की बापू घोडागाडी मे जाओगे तो शाम हो जाएगी, कार्यक्रम कब करेंगे । ठीक है, मोटर में ही बैठता हुं । बापू को मोटरमें बैठना मजबूरी थी । बापूने कहा होगा की मुझे एक कुटिया में ठहरना है । लोगोने समजाया, बापू हर जगह कुटिया नही होती और बनाने में समय लगता है । आप अकेले नेही हो, आप के साथ काफी लोग है । सब को सुविधा मिले ऐसे मकान मे ठहरना होगा । बापूने कहा ठीक है । ये भी मजबूरी ही थी । नेहरु की सोच आपने गान्धी पर डाल दी । गान्धी तो मशीन और बडे उध्योग के ही विरोध में थे । ये आने से हजारों कारीगर जो अपने ही घर में सामान बनाते हैं वो बेरोजगार हो जाते हैं । गान्घी को चरखा चलाने का शौक नही था । पर चलाया । ये साबित करना चाहते थे की आपका या आपके आसपास लोगों के चरखों से बना कपडा पहनों, मील का या विदेशी कपडा मत पहनों । गान्धीजी गावों मे रहे हुन्नर उद्योग को बढावा देना और बचाना चहते थे । पर उन्हें स्वतंत्र भारत में जीने का मौका नही मिला और नेहरुने उस पर पानी फेर दिया, बडे बडे उद्योग डलवा कर । और लायसन्स राज लागू कर दिया ताकी कोइ छोटा कारीगर उद्योगपति बनने की न सोचे । गान्धी अन्ग्रेज के मित्र थे ये बात सही है । आफ्रिका में अंगेजों और युरोप के दूसरे गोरे लोग अपना कबजा जमाने के लिये लडाई करते रहते थे । ऐसी ही एक लडाई,(बोर-युद्ध), जीस मे गान्धी खूद अन्ग्रेज की सेना में सैनिक बने थे । बन्दूक नही दी गई थी, लाशें उठाने का काम सौंपा गया था । ये बात किसी को खटकनी नही चाहिए क्यों की गान्धी उस समय २८ साल के नौजवान थे और भारत की आजाकी उसे सपने में भी नही आई थी । अहिन्सा की राह उन्हों ने जैन दर्शन से ली है । जैनों को कोइ शत्रु नही होता । आजादी की लडाई में अन्ग्रेज गान्धी के शत्रु नही थे । उन की नीति विरोधी थे, भारत में राज करने की नीति । वो नीति ही गान्धी को बदलनी थी । उस में खून खराबा करने की क्या जरूरत थी । गान्धी को ये डर था की भारतिय एक अन्ग्रेज मरेगा तो वो हथियार के बल पर सौ भारतिय को मारेंगे । गान्धी ही पहला विष्व मानव था जो आदमी आदमी में भेद नही करता था । भारतिय और अन्ग्रेज उनके लिये बराबर थे । इन मे से क्यों कोइ मरे । आपने भगत सिह की बात कही । वो तो छोटी उमर का नौजवान, जनूनी, अन्ग्रेज को देखते ही जीस की आंख लाल हो जाए । वो क्या जाने पून्जीवाद या और कोइ आर्थिक वाद । उस का तो एक ही वाद था, अंग्रेज को मार भगाओ । माओवादियों की तरह उस का कोइ भी प्लान नही था की अंग्रेज जाएंगे तो हम गद्दी पर बैठ जायेन्गे । ८० साल का बुढा गान्धी अपने से ५० साल छोटे, बच्चे जैसे भगत सिन्ह के वाद की परवाह नही कर सकते । भगत सिन्ह का हिन्सा का मार्ग गान्धी को पसन्द नही था । अगर वाकई में गान्धी मे क्षमता थी भगत को बचाने की और नही बचाया तो वो उन्की बडी भूल थी । क्षमता थी या नही ये जाने बिना दोष देना गलत है । .

    Tamanna के द्वारा
    May 8, 2012

    भरोडिया जी… इच्छा के आगे उम्र कोई मायनें नहीं रखती. गांधी जी हमेशा बड़े उद्योगपतियों से घिरे रहते थे. उनका रहना खाना सब आलीशान जगहों पर होता था. अहिंसा के सिद्धांत को उन्होंने हर जगह अपनाया. जहां हिंसा की ही जरूरत थी वहा भी अहिंसा को ही हथियार बनाया गया. यह साफप्रदर्शित करता है कि गांधी जी जनता में लोकप्रिय होना चाहते थे. उन्हें अंग्रेजों को भारत से भगाने में कोई रुचि नहीं थी. इसके विपरीत उम्र में छोटे ही सही क्रांतिकारी भगत सिंह हर दांव पेंच खेलकर भारत से अंग्रेजों को खदेड़ना चाहते थे. कभी कभार सही उद्देश्य को पाने और गलत इंसानों को सबक सिखाने के लिए हिंसा का सहारा लेना ही पड़ता है. गांधी जी के उद्देश्यों में भगत सिंह रुकावट पैदा कर रहे थे इसीलिए उनकी फांसी रुकवाने के लिए कोई काम नहीं किया गया.

    bharodiya के द्वारा
    May 9, 2012

    तमन्नजी नमस्कार गान्धी भारत आने से पहले अफ्रिका में रहते हुए लोकप्रिय हो गये थे । तभी तो वो जब भारत आये तब मुम्बई बन्दरगाह पर लोगों का मजमा लग गया था उनका स्वागत के लिए । लोकप्रिय होने की सोच नीचले दरजे के नेता रख सकते हैं, गान्धी नही । आप को पता होना चाहिए की बीना धन के कोइ काम कोइ युग में नही हुआ है, न हो सकता है । गान्धी को गुड समजकर मख्खी जैसे उद्योगपति उनके आसपास मन्डराते रहे, गान्धी ने उन के धन को आजादी की जंग में लगा दिया क्या गलत किया । बाद में कोंग्रेस सरकार की जिम्मेदारी थी की उपकार की भावना से प्रेरित हो कर उस उद्योगपतियों को गलत सहकार न दें । कौन कहता है गान्धी अन्ग्रेजों भगाना चाहते थे । बिलकुल भगाना नही चाहते । भारत में आर्य, हूण, मुस्लिम ये सब आक्रमणकारी भारत आये और भारत के बनकर रह गए । अन्ग्रेज भी भारत के बनकर रह जाते । बस, राज करना छोड दें । मोतिलाल नेहरु, विठ्ठलभाई पटेल और जीन्ना । ये तीन बडे बडे वकिल और जीस सभा में भगत ने बम्ब छोडे उस सभा के सदस्य । वो तिनों जानते थे की आज बम्ब फुटेगा और कोइ मरनेवाला नही है । भगत के संगठन द्वारा पहले से ही बताया गया था । इन्डारेक्टली ये तीन भी साजीदार थे । इन का फर्ज था की वो भगत का केस लडे । नकली बम्ब की सजा मौत नही होती ये बात जरूर वो साबित कर देते । और गान्धी पर भी दबाव डाल सकते थे । लेकिन वो सब वकिल से ज्यादा पोलिटिशियन थे । और पोलिटिशियन का ऊंट किधर करवट ले कोइ नही जान सकता । क्या परिस्थियां रही होगी, क्या कारण रहा होगा वो सच्चाई कभी बाहर नही आएगी । सच्चाई एक ही सामने आई, भगत को फान्सी ।-

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 5, 2012

आदरणीया तमन्ना जी नमस्कार. क्या…..तमन्ना जी. एक तो ऐसे ही यह मंच युद्ध की विभीषिका से झूझ रहा है. आप ने फिर से एक युद्ध का मैदान तैयार कर दिया. अभी देखिएगा कैसे-कैसे दांव-पेंच चले जायेंगे. सभी एक-दूसरे को परास्त करने पर लगेंगे और……खैर छोडिये…….इस लेख पर मैं अपना कोई मत प्रदर्शित नहीं करना चाहता…. वैसे आपकी लेखन क्षमता का,तार्किक क्षमता का और विश्लेषण का कोई जबाब नहीं है…….

    Tamanna के द्वारा
    May 8, 2012

    अजय जी.. मांफी चाहुंगी बहुत दिनों से मंच पर उपस्थित नहीं थी इसीलिए यहां पर क्या हुआ इन दिनों इस बात से पूरी तरह बेखबर हूं. वैसे मैंने एक तथ्य को सामने रखने की कोशिशि की थी लेकिन हर बार की तरह युद्ध का मैदान तैयार हो ही गया.. हा हा हा.. पर मुझे लगता है बहुत से लोग मेरी बातों पर सहमति रखते होंगे.

Ram के द्वारा
May 5, 2012

Nice to see that Gandhi is still making us to think. But the grieving scenario is that people start constructing Ideas from gossips. To write on such a serious issue one must have done some serious research. In the circumstances when almost every known apect of his life has already been analysed severaly. There is no point in writing a blog of convulsions with frivolous pragmatism. I also used to have such ideas till I had not realised the deeds and had less information. May be you are in the same state I used to be in, 10 years past.

    Tamanna के द्वारा
    May 8, 2012

    first of all very much thanx to u for commenting on my post….but unfortunately i have to say if u think my point of view is illogical and baseless, then i am expecting u to give logic to prove them wrong. i dont think that i have written dis blog in the state of no information or less information. if u can then pls let me knw about all the facts.


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