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कोई अपनी मर्जी से भीख का कटोरा नहीं उठाता !!

Posted On: 22 May, 2012 में

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एक लावारिश बिना मां-बाप का बच्चा क्या खुद ही भिखारी बनने का फैसला कर लेता है? बिना किसी छत के भूखे पेट खुले आसमान के नीचे गुजारने वालों की तकदीर में जिल्लत और तिरस्कार के सिवा और क्या होता है तिस पर हमारी मरी हुई संवेदनाओं से निकले लफ़्ज जब उन्हें नसीहत देते हैं तो शायद एक बार उन्हें बनाने वाले भगवान भी कह उठते होंगे “वाह रे इंसान”



begging in indiaभारत के संविधान को हम एक पवित्र ग्रंथ की तरह सम्मान देते हैं. इसमें साफ तौर पर यह अंकित है कि भारत देश की सीमा में रहने वाले सभी लोग एक समान हैं. धर्म, वर्ग, लिंग आदि किसी भी आधार पर उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव करना कानूनन अपराध माना जाएगा. यही वजह है कि आज जाति प्रथा को समाप्त करने और महिलाओं को भी पुरुषों की तरह समान अधिकार दिलवाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं. लेकिन हमारे समाज का एक हिस्सा ऐसा भी है जिसके बारे में बात करना कोई जरूरी तक नहीं समझता. प्रगतिशील भारत की तेज होती गति में बहुत पीछे छूट चुका यह अंग वह है जिन्हें हम भिखारी कहते हैं. सड़क पर रहने वाले इन लोगों को अपनी मौलिक आवश्यताएं पूरा करने का अधिकार तो नहीं है इसीलिए कहीं वे भूख से तड़प-तड़प कर दम ना तोड़ दें, वह दूसरे लोगों से भीख मांगकर अपना पेट भरने का प्रयत्न करते हैं. वैसे तो हम जैसे तथाकथित सिविलाइज्ड लोगों की भाषा में यह लोग इंसान तो नहीं कहे जा सकते लेकिन हम जैसे ही दिखने वाले इन लोगों की हर छोटी जरूरत भारत की स्वार्थी राजनीति के भारी-भरकम हितपूर्ति के नीचे कहीं दब गई है.


हमारे समाज की विडंबना ही यही है कि जब-जब भारत की राजनीति असफल साबित हुई है उसकी असफलता को आम जनता को ही ढोना पड़ा है. भिक्षावृत्ति एक अपराध, यह वे पंक्तियां हैं जो कभी पोस्टरों तो कभी विज्ञापनों द्वारा अकसर दिखाई दे जाती हैं, इन पंक्तियों को पढ़कर हम भिखारियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि हमारी घृणा का वास्तविक हकदार आखिर है कौन, वो जो अपनी भूख मिटाने के लिए 1-1 रुपए के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाते हैं, धूप, बारिश, तूफान हर मौसम में आसमान को ही अपनी छत समझकर रहते हैं, कूड़े के ढेर से खाने का सामान एकत्रित कर खाते हैं या फिर वो लोग जो इनकी ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार हैं?


कुछ देर के लिए जिस जगह से गुजरने पर हम अपनी नाक रुमाल से ढक लेते हैं वहां यह लोग अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं, लेकिन जब किसी को दोषी ठहराने की बात आती है तो हम इन्हें ही साफ-सुधरे शहर की गंदगी समझ लेते हैं. इनके जीवन को सुधारने के स्थान पर हम इनके जीवन को ही कोसते रहते हैं.


सड़क पर जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए ना तो राशन कार्ड की व्यवस्था है और ना ही पहचान पत्र की इसीलिए अब तो सरकार भी उन्हें तरक्की करते भारत देश का नागरिक नहीं मानती. अब जब वह भारत के नागरिक ही नहीं हैं तो सरकार उन्हें बराबरी का अधिकार कैसे दे सकती है?


सरकार की नजर में भिक्षावृति एक अपराध है और भीख मांगने वाले लोग एक अपराधी, लेकिन हैरत की बात तो यह है कि इन अपराधियों के लिए तो जेलों में भी कोई जगह नहीं है. उन्हें यूं ही सड़कों पर सड-अने के लिए छोड़ दिया जाता है. भिक्षावृत्ति को आपराधिक दर्जा देने के अलावा हमारी सरकार ने कभी उनकी ओर, उनके जीवन में व्याप्त मर्म की ओर ना तो कभी ध्यान दिया और ना ही उनके लिए किसी भी प्रकार की कोई योजना बनाई. सरकार ही क्यों हम अपनी ही बात कर लेते हैं, समाजिक व्यवस्था को ताने देने के अलावा हम करते भी क्या है. सड़क पर कोई भीख मांगता है तो हम उसे लेक्चर सुना देते हैं कि कुछ काम कर लो, लेकिन आप ही बताइए क्या कोई खुशी से अपने आत्म-सम्मान को किनारे रखकर कटोरा हाथ में उठाता है? हम उन्हें यह समझाते हैं कि कुछ काम करो भीख मांगना अच्छी बात नहीं है तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें दुत्कार कर अपनी शान बढ़ाते हैं.


begसमाज की गंदगी समझे जाने वाले यह भिखारी सड़क पर ही पैदा होते हैं, वहीं अपने रिश्ते बनाते हैं और कभी बीमारी से तो कभी भूख से वहीं मर जाते हैं. लेकिन इनकी ओर कभी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है और भविष्य में भी ऐसी उम्मीद करना आसमान छूने जैसा ही है.


बड़ी-बड़ी बातें करने वाले सरकारी नुमाइंदों के साथ-साथ शायद अन्य लोग भी जिन्हें आजकल हम समाज सुधारक कहते नहीं थक रहे उनके सामने भी जब कोई भिखारी भीख मांगने आता है तो वह उसे कभी पैसे देकर तो कभी दुत्कार कर अपनी गाड़ी के शीशे बंद कर लेते हैं. लेकिन शोहरत और संपन्नता से भरे अपने जीवन में वापस लौटने के बाद उन्हें कुछ याद नहीं रहता और बात फिर वहीं की वहीं रह जाती है कि भिक्षावृत्ति अपराध है और भीख मांगने वाले अपराधी.




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93 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kushagra के द्वारा
February 25, 2015

It is very good . I get all the things from this para. that I want to know about this topic . I like it very much……. .

renu के द्वारा
August 19, 2013

बढ़िया

मनु (tosi) के द्वारा
May 29, 2012

आदरणीया तमन्ना जी लेख और बेस्ट ऑफ द वीक के लिए बहुत बहुत बधाई !! कई दिनो से कोशिश कर रही थी पर आज सफल हुई …सादर !!!यूं ही लिखती रही सफलता की सीडियाँ चढ़ती रहें !!!यही कामना

Meenakshi Srivastava के द्वारा
May 29, 2012

तमन्ना जी , साप्ताहिक सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर बनाने की आपको हार्दिक बधाई . मीनाक्षी

alkargupta1 के द्वारा
May 29, 2012

तमन्ना जी ,सर्वप्रथम सप्ताह की सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान पाने के लिए हार्दिक बधाई अति संवेदनशील विषय पर लिखा है जो कहीं न कहीं सोचने को विवश कर देता है

    Santosh Kumar के द्वारा
    May 30, 2012

    तमन्ना बहन ,.बहुत बहुत बधाई आपको ..सादर

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 27, 2012

मानवीय संवेदनाओं को समर्पित और कहीं न कहीं दिल को कचोटने वाला मर्मस्पर्शी आलेख ! तमन्ना जी ,………बधाई !! मेरे ब्लौग में ( मानचित्र पर सबकुछ अच्छे ) की कुछ पंक्तियाँ कचडों में साधन तलाशते विद्यालय के बंद रास्ते खिचड़ी पर खर्चे ही खर्चे ! सरकारी दावे सब कच्चे!! कब आया कब बीत गया पन बस जर्जर का जर्जर ही तन उड़ी ज़िन्दगी पर्चे-पर्चे ! सरकारी दावे सब कच्चे !! . ………………………

ashokkumardubey के द्वारा
May 27, 2012

जागरण समूह ने आपको बेस्ट ब्लागर के सम्मान से नवाजा है यह आपके लिए बहुत सम्मान की बात है पर मैं आपके इस लेख से यही जान पाया हू की समस्यायों को उजागर करने वाले बहुत सारे लेखक हैं उन में से आप भी एक हैं इसमें संदेह नहीं भीखारी होना एक कलंक के सामान है और उनको सभी घृणा की नजर से ही देखते हैं और दुत्कारते भी हैं कई मामलों में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है की एक हठ्ठा कठ्ठा आदमी ,बच्चा , औरत या लड़की भी भेख मांग रहे हैं क्या उनको देखकर कोई उन्हें सच मुच किस्मत का मारा कहेंगे जरुर उनको पेशेवर भिखारी ही कहेंगे और जरुर भीख मांगना एक अभिशाप है पर इस समस्या का समधान क्या है? क्या सर्कार ही इस समस्या को दूर कर सकती है क्या ऐसा कोई संगठन नहीं बन सकता जो ऐसे लोगों के कल्याण का काम करे अगर लिखना ही है तो लेखन के माध्यम से ऐसे लोगों का आह्वान कीजिये जो इस सामाजिक बुराई के लिए आगे बढ़कर कुछ करें अतः बुरा न मानियेगा मैं तो यही जनता हूँ समस्याएं अनेको हैं समधान की जरुरत है और उसके लिए कुछ लिखा जाये कुछ किया जाये तो बेहतर लेखन कहा जायेगा मेरी राय में धन्यवाद

May 26, 2012

मुझे मत मरो मेरा क्या कसूर है………. http://satyaprakash.jagranjunction.com/2012/05/25/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B8/#comment-१२ किसी भी धर्म के लोग हो उन्‍हे आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए और सरकार से भी निवेदन करना चाहिए कि इस तरह के कार्यक्रमो पर रोक लगायी जाय, मै आप सभी का आग्रह करना चाहता हुँ कि आप निम्‍न माबाईल न0 फोन कर इसे राकने का आग्रह करे जिलाधिकारी गोरखपुर 9454417544 आयुक्‍त गोरखपुर 9454417500 एस एस पी गोरखपुर 945440273 आई जी गोरखपुर 9454400209 एस पी आरए 9454401015 योगी आदित्‍यनाथ सांसद गोरखपुर 0551-2255454, 53

paul के द्वारा
May 26, 2012

तमन्ना जी ,ऐसे अछे लेख लिखने वाले बहुत हैं लेकिन कुछ करने वाले बहुत ही कम इस बुराई को कैसे मिटाया जाए इसके १० पॉइंट बताइए पर असली बात यह है कि आपने इस बारे में कुछ भी नहीं किया तो फिर इस बारे में कैसे बता सकती हैं ?तो छोटी सी बात है कि बहुत कुछ कहा जा चुका है अब कुछ क़र के दिखाना होगा और करना बहुत ही मुश्किल होता है

yamunapathak के द्वारा
May 26, 2012

हेल्लो तमन्ना, बहुत अच्छा लेख लिखा है हर बार की तरह . बेस्ट ब्लॉगर बनाने की बहुत बहुत बधाई. शुक्रिया.

Himanshu Singh के द्वारा
May 26, 2012

Pahle ap ko dheron badhaiyan . Maim Apne bahut hi accha topic diya hai ye kafi vad vivad ka vishay hai ki koi apni marji se katora uthaka hai ya majboori me kyu ki majboori wale bhikhari ko khojna utna hi kathin hai jitna ki ek IMANDAR LOKSEVAK ko pana hai aur bina ghotale ke BHARAT me kisi yojna ka poora hona.

satya sheel Agrawal के द्वारा
May 26, 2012

तमन्ना जी,बेस्ट ब्लोगेर ऑफ़ द वीक की बधाई.बहुत संवेदन शील विषय चुना है आपने

आर.एन. शाही के द्वारा
May 25, 2012

तमन्ना जी, बेस्ट ब्लॉगर आफ द वीक चुने जाने की बधाइयां स्वीकार करें. आपका कहना सही है कि कोई शौक से भीख का कटोरा नहीं उठाता. परन्तु इस कुनबे में भी अब वंश परम्परा अपनी जड़ें जमाती जा रही है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता. अब ये ‘अपराधी’ ट्रेनों और रेलवे, बस स्टेशनों पर कम दिखाई देते हैं, क्योंकि ‘अपराधी’ हैं तो इनसे इनकी स्वाभाविक जगह भी काफी हद तक छीनी जा चुकी है. लेकिन यह समस्या समाज में दूसरे तीसरे रूप में कायम तो है ही. धन्यवाद.

Gaurav के द्वारा
May 25, 2012

यक़ीनन ……….. सच का सामना तमन्ना जी आपके लेख ने वाकई सोचने पर मजबूर कर दिया की कही न कही मै भी एक दोषी हूँ | सुंदर करती …. सच को उजागर करती हुयी -गौरव

vikramjitsingh के द्वारा
May 25, 2012

तमन्ना जी……. बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ द वीक बनने की हमारी तरफ से…… हार्दिक शुभकामनाएं

tejwanig के द्वारा
May 25, 2012

बेहद उम्दा रचना है, आपको बधाई

dineshaastik के द्वारा
May 25, 2012

ब्लॉगर ऑफ  द वीग  बनने की बधाई…

rekhafbd के द्वारा
May 24, 2012

तम्मना जी ,बढ़िया लेख ,बेस्ट ब्लागर आफ वीक बनने पर बधाई

vaidyasurenderpal के द्वारा
May 24, 2012

नमस्कार । आजकल देश मेँ भिक्षावृति की समस्या बढ़ती ही जा रही है तथा इसकी आड़ में अपराधोँ का ग्राफ भी ..! दरअसल सरकार के पास इस प्रकार की सामाजिक विकृतियोँ का हल करने के लिए कोई दृष्टि तथा योजना ही नहीँ है । ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक बनने की हार्दिक बधाई।

VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी नमस्कार ,ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने पर बधाई |

Harish Bhatt के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक बनने की हार्दिक बधाई

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक बनने की हार्दिक बधाई

vasudev tripathi के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी, भीख मांगना निश्चित रूप से एक समाज राष्ट्र के लिए कलंक है किन्तु फिर भी इतना अवश्य कहूँगा कि आजकल भीख मांगना मजबूरी कम की पेशा ज्यादातर का है!! मैं चूंकि घूमता अधिक रहता हूँ अतः पचासों उदहारण मैंने देखे हैं, कुछ बताना चाहूँगा| एक औरत को गाज़ियाबाद स्टेशन पर एक आदमी 2 रुपये भीख देता है तो वही औरत जो 1 मिनट पहले रिरिया रही थी 2 का सिक्का उसके मुंह पर मार देती है,… स्पष्ट करना चाहूँगा कि वास्तव मे मार देती है यह कहते हुए शर्म नहीं आती तेरे को 2 रुपए देते हुए…. 10 तेरे को देती हूँ। बदायूं मे एक भिखारी के बारे मे पता चला कि उसके 2 बेटे 1 बेटी मे बेटी मेडिकल और बेटा इंजीन्यरिंग पढ़ रहा है छोटा निचली कक्षा मे!! लखनऊ मे भिखारी मर गया तो पास से पुलिस को 2.5 लाख रुपए फटे कपड़ों से मिले। गाज़ियाबाद मे हापुड़ रोड पर कुछ गाँव हैं जहां लोग अपने बच्चों को सुबह सुबह भीख के धन्धे पर भेज देते हैं और शाम तक हर एक बच्चा ५०० से 1000 तक ले आता है। दिल्ली मे आप आसानी से ऐसे भिखारियों को देख सकते हैं जो 1-2 रुपये देने पर सीधे गाली देते हैं। धार्मिक स्थानों पर अधिकतर पेशेवर भिखारी ही होते हैं एक मेहनतकश मजदूर से पूंछिएगा तो बताएगा कि शाम तक कितना ये लोग झाड लेते हैं…. आप भी एक प्रयोग करके देखिएगा किसी भिखारी से बोलिए चलो काम दिलाते हैं फिर देखना….. मेरे कहने का आशय यह बिलकुल भी नहीं है कि यहाँ गरीब नहीं हैं…. किन्तु गरीब अधिकांश मजदूरी करते रिक्शा चलाते मिलेगा..!!! कुछ विवश बेचारे भीख मांगने पर मजबूर होते हैं तो धन्धे के बींच असली जरूरतमंद की पहचान बहुत मुश्किल है। बांग्लादेशी घुसपैठियों ने तो सबसे ज्यादा भीख मांगने को ही पेशा बना के रखा है क्योंकि भारत मे इसका बड़ा स्कोप है। जब तक इन धंधेबाजों पर लगाम नहीं लगेगी असली जरूरतमंद गरीबी मे मरते रहेंगे और उस खबर का फिर धंधेबाज भिखारी लाभ उठाते रहेंगे,…. ब्लॉगर ऑफ थे वीक बनने पर हार्दिक बधाई।

Sudha Upadhyay के द्वारा
May 24, 2012

हम हर प्रकार के विषयों पर सोचते तो हैं परन्तु हमारी समस्या यह है कि हम समस्या की तह तक जाकर उसके निराकरण के बारे में नहीं सोचते हैं . सरकार या जनमानस को कोसकर क्या हम किसी समस्या का समाधान कर सकते हैं? वास्तविकता यह है कि हमें उपाय सुझाने होंगे. यक़ीनन सत्य यह है कि भिक्षावृत्ति से निपटने का तरीका यह है कि भिछुकों को हरसंभव रोजगार करने के लिए प्रेरित किया जाये . व्यक्तिगत एवं सरकारी स्तर पर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयास होने चाहिए . कई बार हम पाते हैं कि भिखारियों से यदि काम करने को कहा जाये तो वे हँस कर टाल जाते हैं या किसी और कि तरफ मुड़ जाते हैं .इसका कारण क्या हो सकता है ? क्या वे आत्मसम्मान कि कीमत पर अकर्मण्य हो गए हैं ? क्या वे काम नहीं करना चाहते हैं या उन्होंने परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया है ? उन्हें हाथ फैलाना काम करने से आसान लगता है ? यदि नहीं तब तो समस्या का निदान फिर भी आसान है उन्हें सरकारी तंत्र किसी प्रकार जागृत हो कर काम दे सकता है . परन्तु समस्या तो तब भयावह है जब इन अनेक प्रश्नों के उत्तर हाँ हैं . तब तो उन्हें आत्मसम्मान कि कीमत समझानी पड़ेगी. ये कौन कर सकता है ? जहाँ तक मैं समझती हूँ अधिकांश व्यक्ति प्रयास करते हैं लेकिन सफल नहीं हो पाते हैं . फिर तो इनका पता लगाकर इनके पास जाकर रोजगार देना होगा . एक महिला को तो शायद अधिकांश परिवार रोजगार दे सकते हैं. पुरुष अन्य मजदूरों की तरह कम से कम मजदूरी कर सकते हैं . रही बात वृद्धों और अपाहिजों की तो उनके लिए सरकार वृद्धाश्रम के द्वार खोल सकती है. अपाहिजों के लिए अवश्य किसी प्रकार का प्रबंध सरकार को करना होगा. बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा के लाभ के साथ आवास की सुविधा भी उपलब्ध करानी होगी. जो अनाज सड़कों पर सड़ रहा है, जिसे रखने की समुचित व्यवस्था नहीं है उसे इन भिखारियों में बंटवाना होगा. हम भिखारियों के साथ उन कर्मठ गरीबों की अवहेलना नहीं करना चाहते जो मजदूर हैं, रिक्शा चलाते हैं , जो लोगों के घरों में बर्तन धोकर अपनी जीविका चलाती हैं .और रात के अंधेरों में फुटपाथ पर सो जाते हैं . इस कर्मठता को मेरा प्रणाम है . मैं तो यही चाहूंगी की हमारे देश से भिक्षावृत्ति समूल नष्ट हो जाये. आइये हम संकल्प करें की इस दिशा में आवश्यक कदम जरुर उठाएंगे . चल पड़े जिधर दो डग-मग चल पड़े कोटि पग उसी ओर.

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 24, 2012

आदरणीय तमन्ना जी, नमस्कार- बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ द वीक चुने जाने पर बधाई……………………वास्तव में आपने जटिल मुद्दे को उठाया है. कोई भी अपनी मर्ज़ी से भीख का कटोरा नहीं थामता….. परिस्थितियां उससे ये सब कराती है. सरकार को ठोस कदम उठाना चाहिए और ऐसे लोगों का उद्धार करना चाहिए. (मेरे ब्लॉग पर आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है) http://www.hnif.jagranjunction.com

Pratibha Goswami के द्वारा
May 24, 2012

Madam, Congratulation. Kabhi ham fouji ke uper ho rahe atyachar ke bare me bhi lekh likhe, apka bahut meharbani hogi.

jlsingh के द्वारा
May 24, 2012

आदरणीय तमन्ना जी, नमस्कार सर्वप्रथम ‘ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ बनने के लिए बधाई !!

D33P के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी, नमस्कार सर्वप्रथम ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने के लिए बधाई !!

shivnathkumar के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी, नमस्कार सर्वप्रथम ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने के लिए बधाई !! “जो सोना पड़े कभी सड़क किनारे खुले आसमां के नीचे तो पता चले सर्द हवाओं का दर्द ” भिक्षावृति के लिए हम सारे भीख माँगने वालों को दोषी नहीं ठहरा सकते | बहुत हद तक इसके लिए हमारा समाज और हमारी सरकार इसके लिए दोषी है | भिक्षावृति को कम करने के लिए कारगर कदम उठाए जाने चाहिए और कुछ ऐसे उपाय अपनाए जाने चाहिए जिनसे उनकी स्थिति सुधरे और उन्हें भीख माँगने की जरुरत न महसूस हो | अक्सर हम इस मुद्दे पर कुछ अच्छी बातें लिखकर या फिर सोचकर बैठ जाते हैं और हमें लगता है कि हमने अपना फर्ज पूरा कर लिया | हम चाहें तो मिलकर कुछ कर सकते हैं | आखिर सोचिए क्या हम (कहने का तात्पर्य ‘समाज’ से है ) अपने स्तर पे कुछ नहीं कर सकते ,,,,,, कुछ तो जरुर कर सकते हैं ,,,,, सुन्दर लेख !!!!!!!

    Tamanna के द्वारा
    June 4, 2012

    शिवनाथ जी.. कोए व्यक्ति अगर कुछ करने की ठान लें तो वह क्या नहीं कर सकता. लेकिन हम अपनी तरफ से बहुत ज्यादा सुधार करने में असमर्थ हो सकते हैं और इस बार हमें कुछ प्रभावपूर्ण और सख्त कदम उठाने की जरूरत है. सरकार को अपनी नींद तोड़कर समाज द्वारा उपेक्षा का शिकार होते रहें इन लोगों के लिए कार्य करना चाहिए.

priyasingh के द्वारा
May 24, 2012

……..कल भी आपके ब्लॉग पर कमेन्ट पोस्ट करने की बहुत कोशिश की पर सब नाकाम रही ……….कल तो मन में बहुत कुछ था और लिखा भी था ………पर अभी बधाई से काम चला लीजिये ……………..आपने बहुत अछे विषय पर सबका ध्यान आकृष्ट किया है………….

    Tamanna के द्वारा
    June 4, 2012

    प्रिया जी.. आपने मेरी रचना को अपना समय दिया और सराहा उसके लिए हार्दिक धन्यवाद

Ramashish Kumar के द्वारा
May 24, 2012

नमस्कार, तमन्ना जी आप का लेख बहोत ही अच्छा है,इसके लिए आप को बहोत बहोत बधाई हो.आप भिखारी की बात कर रही है तो ये तो सही बात है की भिखारियों का कुनबा है ओ हमारी सर्कार की लापरवाही की देन है.आप की बात सही है लेकिन कुछ लोग मजबूरी में भिखारी बनाते है,कुछ लोगो का ये पेसा है उन्हे भीख मागने की आदत सी हो गयी है वे काम नहीं करना चाहते है.और हमारे समाज में भीख माफिया भी तो है जो बच्चो से भीख मगवाते है.आप ये सही कह रही है की भीख मागने पर कितने लोग दुत्ताकर कर कहते है की जा कर कोई कम क्यों नहीं कर लेते हो ?तो कितने लोग खरी खोटी सुनते है.इसी जगह पर कोई नहीं कह सकता है,चलो मै तुम्हे काम दिलाता हूँ.लेकिन मै ये बात कहता हूँ.आप को मै बता दू की मै कही किसी कम से जा रहा था.मै बस पर बैठा तो पता चला की बस में अभी टाइम है तो मै टाइम पास करने के लिए निचे उतर गया और बगल में एक चाय की दुकान पर पेपर पढ़ने लगा तभी एक नौजवान भिखारी आकार मेरे आगे हाथ फैलाकर भीख मागने लगा,मै उसे देखा और एक तक देखते रह गया.मै उसे कहा की तुम तो अभी जवान हो भूढ़े भी नहीं हो,तुम मेरे साथ चलो मै तुममे काम काम दिलाता हूँ.इस पर ओ मुझे एसा जवाब दिया की मै उसे कभी नहीं भूल सकता हूँ. ओ बोला मेरे ऊपर गुस्सा हो कर की फालतू बाते मत करो भीख देना है तो दो.ये कहा कर ओ तुरंत चल दिया और मै उसे देखता रह गया और यही सोच रहा था की भिखारी एसे भी होते है.अब आप बताईये एसे लोगो को आप क्या कहेगी.मुझे जो भी भिखारी मिलाता है मै यही बात कहता जवाब में कोई कुछ कहता है तो कोई बोलता ही नहीं है.मै मनाता हु की बहोत लोग लाचार होकर भीख मागते है,लेकिन जो आदमी ओ इसके जगह पर ये भी तो कह सकता है की मुझे कोई काम दिलादो मै कोई भी काम करुगा.तमन्ना जी अगर काम खोजा जय तो काम की कमी नहीं है बस करने वाला चाहिए.हा ओ बात अलग है की जो अपांग है,बूढ़ा है,अँधा है उसे भीख दे देना चाहिए.मै गाडी में देखा हु की अंधे भी कुछ न कुछ बेचते रहते है.औए सही लोग भीख मागे तो गलत है की नहीं.

    Tamanna के द्वारा
    June 4, 2012

    रामाशीष जी.. आपकी बात सही है कि मजबूरी की आड़ लेकर बहुत से लोगों ने भीख मांगकर खाने को अपना व्यवसाय ही समझ लिया है. लेकिन इन लोगों के कारण हम वास्त्विक जरूरतमंद लोगों को नजरअंदाज तो नहीं कर सकतें. किसी के आगे हाथ फैलाकर खाना शायद एक अपमानजनक सत्य है और इंसान होने के नाते ही सही सत्ता में बैठे लोगों को इनके हितों के बारे में सोचना ही चाहिए.

sinsera के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी नमस्कार, बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने के लिए बहुत बहुत बधाई ………..

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    सिंसेरा जी हार्दिक धन्यवाद…

rahul parcha के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना भीख मांगने वाले को अपराधी तो नहीं कहा जा सकता .. लेकिन कई दिन पहले मैंने एक ११ साल के लड़के से बात की जो बस अड्डे पर भीख मांग रहा था .. जब मैंने उस से पूछा की तेरे पापा कहा है तो उसने बताया के पापा पुराणी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भीख मांग रहे है और उसकी माँ छोटी बहिन को लेकर आसपास ही है.. इतना ही नहीं वो पूरा परिवार रोजाना मेरठ से दिल्ली डी टी सी की बस में बेथ कर भीख मांगने आता है… अब ऐसे लोगो को क्या कहा जाये…

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    राहुल मैं ऐसे लोगों को मजबूर और असहाय लोग ही कहूंगी. बचपन को जीने की जगह आप दूसरों के आगे भीख मांगते हैं, साफ सुधरी जगह रहने और खाने की जगह आप अस्वच्छता को अपने जीवन में शामिल कर लेते हैं. कोई अपनी इच्छा से ऐसा बिलकुल नहीं करेगा. मां-बाप कभी यह नहीं चाहते कि जो कठिनाइयां वह देख रहे हैं उनके बच्चे का जीवन भी उन परेशानियों में ही बीतें. पर मजबूरी उनसे वहीं करवाती है जो वह करना नहीं चाहतें.

ajay kumar pandey के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी नमन आपके ब्लॉग पर आने का समय ही नहीं मिला और आपको प्रतिक्रिया भी नहीं दे पाया हाँ में आपकी रचनाएँ पढता था और प्रतिक्रिया इसलिए नहीं कर पाया था क्योंकि मुझे समय नहीं मिल पाया क्योंकि मुझे स्कूल से आकर homework करना पढता था और फिर उसके बाद tution भी जाना पढता था आप तो जानती होंगी की दसवी कक्षा में बहुत मेहनत करनी होती है तो में पढाई में ही लगा था और आलेख भी नहीं लिखता था तो अब जरा छुट्टी में हूँ तो आपके ब्लॉग पर आने का समय मिला है आपने भिक्षाव्रती पर इस आलेख के द्वारा चोट करने का बढ़िया प्रयास किया है इस लेख में सरल सरस व्यंग्य है और गद्य की विवेचनात्मक करती है और इस लेख के द्वारा सर्कार को ध्यान देना चाहिए और खोजना चाहिए की भिक्षाव्रती कहाँ कहाँ पर हो रही है और उन्हें खोजकर मदद करनी चाहिए विचारणीय आलेख और बेहद विवेचनात्मक कृति बढ़िया और सटीक लेख बधाई लें धन्यवाद अजय पाण्डेय

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    अजय जी लेख को अपना समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

अजय कुमार झा के द्वारा
May 24, 2012

भिक्षावृत्ति सच में अब एक बडी समस्या बन गई है । अफ़सोस कि सरका के पास जब आम आदमी के लिए सोचने की फ़ुर्सत नहीं है तो इन मजबूरों मजलूमों के लिए कौन सोचे ? सही चोट करती पोस्ट । विचारोत्तेजक ।

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    अजय जी… बिलकुल सही कह रहे हैं आप.. सरकार के लिए तो यह लोग अब कोई मायने ही नहीं रखतें.

div81 के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी, सबसे पहले तो एक सार्थक लेख लिखने के लिए बधाई आप कि बात से पूरी तरह सहमत हूँ मगर मैंने कई बार जब कोई सक्षम या कहे हष्ट पुष्ट इंसान को भीख मांगते हुए देखा है और कहा है कि पहले मेरा ये काम कर दो उसके बदले कुछ दूंगी मगर वो अनाप शनाप बकते हुए चला जाता है हमारे इधर एक कहावत कही जाती है जिसे मिले यूँ खेती करे क्यूँ यानि जब बैठे बिठाये लोग कुछ दे देते है तो इनको कामकरने से परेहज हो जाता है | जरूरत मंद को कभी खाली नहीं भेजा मगर जो मेहनत कर के खा सकता है उसे कभी दिया भी नहीं है | सरकार इनके लिए कुछ करे ये सोचना बेमानी बात है क्यूँ कि सरकार के पास मुद्दे के रूप मे कार्टून विवाद ही बचा है |

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    आपका कहना सही है लेकिन हम भिखारियों के प्रति सरकार के दायित्वों को किसी भी रूप में नजरअंदाज नहीं कर सकते. भीख मांगना वाकई आसान काम नहीं है, अपने आत्म सम्मान को ताक पर रखकर ऐसा किया जाना एक चिंतनीय पक्ष है. मजबूर लोगों की मजबूरी की आड लेकर अब तो माफिया भी सर उठाने लगे हैं.

bharodiya के द्वारा
May 24, 2012

आर्थिक परिबल ही ऐसी करवट ले रहे हैं की भीक मांगनेवालों की तादाद बढेगी । नौकरी नही मिलती या काम धन्धा नही चलता तो कोइ भूख से कब तक निबटेगा । चोरी करना अपराध, भीक मांगना अपराध, आदमी करे तो क्या करे, मरे ? मरना भी अपराध है । खून के अपराध से ये दोनो अपराध छोटे हैं । अपने को जिन्दा रखने के आदनी ये अपराध करेगा । आर्थिक परिबल के सामने समाज का कुछ नही चलता । एक आदमी दूसरों को मदद रहता है तो वो खूद एक दिन मदद लेनेवालों की कतार में खडा हो जाता है । भारतिय धर्मों में शायाद ईसी कारण से दया दान और भिक्षा महत्व दिया गया था । ताकी भूक के ही कारण कोइ अपराधी न बने या मरे नही । सक्षम लोग दान करे और उस दान से गरिब अपना जीवन जी सके । भीक मांगना अपराध है ऐसा कानून ही गैर कानूनी है । ये कानून उठया गया है योरोप से जहां खिखारी होते ही नही है । वहा की सरकार ही गरिबों के खाने पिनेका प्रबन्ध करती है । यहां तो अनाज सड जायेगा लेकिन, कोर्ट की फटकार के बावजूद भी अनाज गरिबों तक नही पहुचता । लेकिन फॅशन मारनी है विदेशी कानून की । आप ने बहुत ही सार्थक बात लिखी है ईस लेख में । आप अपनी जगह बिलकूल सही है । मेरी बात अलग हो तो वो मेरी बात है । आप की कोइ बात नकारने की कोइ बात नही है । -

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    भरोडिया जी.. कुछ हद तक मुझे आपकी बात भी सही लगी लेकिन सबसे ज्यादा जो चीज मुझे खटकती है वो है मांग कर खाना. अगर किसी व्यक्ति को सक्षम बना दिया जाए तो वह कभी किसी के सामने अपने हाथ नहीं फैलाएगा. वह कभी किसी से भीख नहीं मांगेगा. पहले के जमाने में और आज के आधुनिक युग में एक बहुत बड़ा अंतर है जिसे हमें समझना ही होगा.

pawansrivastava के द्वारा
May 24, 2012

तमन्ना जी आपके इस लेख ने मेरे अन्दर एक वैचारिक विहंगम पैदा कर दिया है …..सोंचता हूँ तो यही समझ में आता है कि ‘Giving an art of fishing is more good a deed than giving fish. अंत में इन भिखारियों के मुत्तालिक अपनी जुबान में कुछ यूं कहना चाहूँगा – इस अहले-ख़ाक को पैसा दो पैसा मेरे हुज़ूर दे दे न दे सके रोटी तो कोई रोजगार कोई उमूर दे दे

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    पवन जी… आपका कहना सही है. भीखे देने से अच्छा है इन लोगों को आत्म निर्भर बनाया जाए. लेकिन इन्हें सक्षम बनाने के लिए पहल तो सरकार को ही करनी होगी. सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह पीछे छूट चुके लोगों को बराबरी का दर्जा दे.

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 23, 2012

बहुत ही गंभीर मुद्दे पर लेखनी चलायी है ! सार्थक आलेख ! आभार……

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    अजय जी.. लेख को पढ़ने और सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 23, 2012

बहुत बढ़िया लेख……… निश्चित ही टॉप लेख मे चुने जाने योग्य लेखों मे एक…….. किसी भिखारी को भीख न मांगने के स्थान पर कुछ काम करके कमाने की राय केवल भीख लेने से बचने का प्रयास भर है……. एक बेहतरीन विचार आपने दिया है….. जिसे ब्लॉग के रूप मे लिखने का प्रयास करूंगा….. यद्यपि भीख मांगने पर पूर्व मे भी मैं लिख चुका हूँ……. पर अब एक नया विचार है जो अभी आया है…..

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    पियुश जी..उत्तम प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया..

vikramjitsingh के द्वारा
May 23, 2012

प्रिय तमन्ना जी…. सादर नमस्कार… ये ‘टॉर्चर’ से भी कुछ ज्यादा नहीं हो गया…..????? है कि नहीं…?????

    rajkamal के द्वारा
    May 23, 2012

    आदरणीय विक्रमजीत सिंह जी ….. सादर अभिवादन ! आपकी इस मंच पर दुबारा से वापसी का बाकि के ब्लागर्स की तरह से मुझको भी बेसब्री से इंतज़ार है ….. लेकिन किसी महिला ब्लागर को इस तरह का सम्बोधन किसी भी रूप से उचित नहीं कहा जा सकता ….. आपको बातो से नहीं बल्कि आपने आचरण से खुद को साबित कर्क्जे दिखाना होगा ….. शुभकामनाओं सहित :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    विक्रमजीत जी..टॉर्चर ही सही लेकिन मुझे यह मुद्दा एक चिंतनीय लगता है..

    vikramjitsingh के द्वारा
    May 25, 2012

    आदरणीय राजकमल जी……..सादर अभिवादन… हमें अच्छा लगा…आपका इस तरह से हम से मुखातिब होना….. होना भी चाहिए…..ये आपका बड़प्पन है…..अगर यही नजरिया उस वक़्त आपने अख्तियार किया होता तो बात इतनी आगे कभी भी ना जाती…..ख़ैर…पुरानी बातों को याद ना करना ही बेहतर है….. हम आपको बताना चाहेंगे कि ये संबोधन किसी दुर्भावना या दुराग्रह से प्रेरित नहीं है….हम अपने से छोटों या खासकर शरारती बच्चों के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं….और तमन्ना जी तो हमारी छोटी बहन जैसी हैं…..अपने बच्चों की भांति…ही शरारती…जिद्दी…इनके किसी भी ब्लॉग पर आना…..मतलब वाद-विवाद…..आप इनकी कोई भी पुरानी रचना देख लीजिये….देखिये किस पर विवाद नहीं हुआ….? इसलिए हम बहुत कम आते हैं इन के ब्लॉग पर….और तो और हम ने तो इन से ना बहस करने की कसम भी खाई हुई है….हमें नाम तो याद नहीं लेकिन कांग्रेस के बारे में थी कोई पोस्ट जब हमारी बहस हुई थी तमन्ना जी के साथ….आप देख सकते हैं…..आप हमारा कमेन्ट भी तो देख चुके हैं….कैसा है? विवादित है क्या…? तमन्ना जी ने खुद एक बार हम से कहा था….’आपको टॉर्चर करने के लिए जल्दी ही एक पोस्ट लेकर आ रहे हैं..’ तो प्रभु हम ने इनके ब्लॉग पर आना ही छोड़ दिया….कहीं फिर कोई बहस ना हो जाये…….लेकिन इस पोस्ट पर लिखने से अपने आप को रोक नहीं पाए…क्योंकि सच्चाई के बहुत करीब है ये पोस्ट…..फिर भी पूर्णतया संतुलित और इन्ही की भाषा में हम ने कमेन्ट दिया…..फिर प्रभु बताइए…कहाँ तक सही और कहाँ तक गलत हैं हम…. क्षमा चाहेंगे…..देरी से जवाब देने के लिए….किन्तु प्रभु….उस विवाद के बाद हम ने अपनी आदत बदल ली है…क्योंकि कमेन्ट देकर फिर उसको देखने जाना बहुत महंगा साबित होता है…आप तो अच्छी तरह से जानते हैं…..इसलिए हम २३ तारीख के बाद आज ही इस पोस्ट पर आये थे…सिर्फ बेस्ट ब्लोगर की बधाई देने के लिए…तभी आपके इस कमेन्ट का पता चला…..क्षमा प्रार्थी हैं….. आपका बात करने का ये अंदाज़ भी अच्छा लगा….ना आपका ब्लॉग ना हमारा ब्लॉग (वो तो है ही नहीं) तमन्ना जी भी क्या याद रखेंगी………दो विपरीत ध्रुवों का मिलन जो हुआ है उनके ब्लॉग पर… उम्मीद करते हैं आपकी शंकाओं का समाधान हो गया होगा………. एक बात…….हमारी तरफ से आप बे-फ़िक्र रहिये….मर्यादा में रहना किसको कहते हैं…ये हमें भली प्रकार मालूम है…..फिर भी…. आपकी सतर्कता के लिए बधाई आपको…..और हाँ…हमें भी अच्छा लगा…कि कोई तो है…जो हम पर निगाह रखे हुए है…..भरोसा है….अगर कदम डगमगाए तो आप साथ हैं…….कि नहीं….????? आपका हार्दिक धन्यवाद…….

    rajkamal के द्वारा
    May 25, 2012

    आदरणीय विक्रमजीत सिंह जी ….. सादर अभिवादन ! इससे पहले आपको किसी मोहतरमा का तलबगार बनते देखा था ….. क्योंकि यह सब कुछ उनकी किसी पिछली पोस्ट पर हुआ था इसलिए किसी का ध्यान नहीं गया था , लेकिन आज दूसरी बार खुद को रोक नहीं सका ….. अगर आप तमन्ना जी को अपनी बहिन मानते है तो फिर जल्दी से अपने असली रूप में सबके सामने चले आइये किसी रचना के साथ …. शुभकामनाये

Rajesh Dubey के द्वारा
May 23, 2012

समाज में अभी भी गैरबराबरी है. संविधान सबको बराबर मानता है, पर अमीरी-गरीबी की खाई पाटने में संविधान असफल रहा है. एक तरफ भुखमरी, दुशरी तरफ अन्न की बर्बादी सोचने वाली बात है.

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    राजेश जी आपका कहना बिलकुल सही है. हमारा समाज असमानता की भेंट चढ़ता जा रहा है.

yogi sarswat के द्वारा
May 23, 2012

हमारे समाज की विडंबना ही यही है कि जब-जब भारत की राजनीति असफल साबित हुई है उसकी असफलता को आम जनता को ही ढोना पड़ा है. भिक्षावृत्ति एक अपराध, यह वे पंक्तियां हैं जो कभी पोस्टरों तो कभी विज्ञापनों द्वारा अकसर दिखाई दे जाती हैं, इन पंक्तियों को पढ़कर हम भिखारियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि हमारी घृणा का वास्तविक हकदार आखिर है कौन, वो जो अपनी भूख मिटाने के लिए 1-1 रुपए के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाते हैं, धूप, बारिश, तूफान हर मौसम में आसमान को ही अपनी छत समझकर रहते हैं, कूड़े के ढेर से खाने का सामान एकत्रित कर खाते हैं या फिर वो लोग जो इनकी ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार हैं? आदरणीय तमन्ना जी , सादर नमस्कार ! आपने सही विषय पर सटीक लेखन दिया है ! आपने कहा है की भिक्षव्रती को रोकने की जिम्मेदारी सरकार की है ! मानता हूँ ! अब ज़रा हट के बात करते हैं – मैंने कई साल पहले पढ़ा था की एक भिखारिन बुधिया जब मरी तो उसकी पोटली ( जिसे वो हमेशा अपने साथ रखती थी ) से 13 लाख रुपये मिले ! एक और उदहारण लीजिये – जून 1999 की मनोहर कहानिया उठाइए , उसमें एक कथा है ! एक साहब मुंबई में , मारुती 800 से स्टेशन आते थे , गाडी पार्क करी और suited -buited होकर ट्रेन में चढाते और पूरे दिन जेब काटते थे , शाम को क्योंकि भीड़ ज्यादा होती थी , वेश बदलकर स्टेशन के बाहर ही भीख मांगते थे ! मारुती ८०० का जिक्र इसलिए किया क्योंकि उस वक्त ये बड़ी बात थी ! तो ऐसे भिखारियों को भी consider करना पड़ेगा !

    Tamanna के द्वारा
    May 25, 2012

    योगी जी…. आपका कहना सही है. भिक्षावृत्ति से लाखों कमए जा सकते हैं लेकिन यह किसी भी हाल में सम्मानजनक पेशा नहीं है. हर व्यक्ति को सम्मान से जीने का अधिकार है. अपवाद हर जगह होते हैं , लाखों कमाने वाले भिखारियों को उसी तरह का अपवाद ही माना जाए तो बेहतर है जैसा एक नेता गरीब होता है. सरकार का पहला कर्तव्य समाज के उन लोगों के लिए काम करना है जो अपने लिए एक बेहतर जीवन नहीं बना सकते. मात्र यह सोचकर कि भिखारी लाखों कमा सकते हैं अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता. प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए हार्दिक धन्यवाद

dineshaastik के द्वारा
May 23, 2012

आदरणीय तमन्ना जी सर्वप्रथम तो हमें भिखारी शब्द की सही परिभाषा परिष्कृत करना होगी। भिक्षावृति जीवन यापन का सबसे अंतिम  सोपान होना चाहिये। शारीरिक निष्क्रियता एवं मानसिक  अक्षमता इसकी प्रथम योग्यता होनी चाहिये। रोजगार की अनुपलब्धता भी एक  कारण  हो सकता है। इसके अतिरिक्त जो भी भीख  माँगते हैं वे अपराधी की श्रेणी में आना चाहिये। फिर तो सभी नेताओं को जेल  का  निवासी  होना चाहिये। हम आप भी इस अपराध से नहीं बचे रह सकते। कौन  भिखारी नहीं है बताइये, सब एक  दूसरे से माँग  रहे हैं, जोमाँगने की कला मैं निपुण  नहीं हैं, वे छीन रहे हैं। वह तो माँगने से भी बड़ा अपराध  है।  कल  जिसे हम  अपराध  समझते थे, आज  वह इस अर्थ  युग में व्यापार बन गया है। मैं किसी शारीरिक  रूप से सपन्न व्यक्ति को भिक्षा नहीं देता, और  उनसे कहता हूँ कि ”भाई मेहनत  करो, कोई काम करो।कुछ  करके दिखाओ।” लेकिन  उनका उत्तर मुझे निरुत्तर कर देता है। “भाई भीख  माँगना भी एक  काम  है, मेहनत का, साहस  का। आप भीख  माँगके दिखा दो। सारे दिन धूप में घूमते हैं, लोगों के ताने सुनते हैं।”

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    दिनेश जी.. मैंने भी अपने लेख में यही लिखा है कि हम उन्हें मेहनत और काम करने की सलाह देते हैं पर आप बताइए कि अगर कुछ काम करने के बाद वह दिन के 50-60 रुपए कमा लेते हैं तो क्या उससे उनके सिर पर छत आ  सकती है, उनके परिवार क खाना मिल सकता उन्हें पहनने के लिए कपड़े मिल सकते हैं? नहीं, इसीलिए वह अपने सम्मान को नकरा कर सड़कों पर भीख मांगते हैं. लोगों के ताने सुनना इतना आसान काम नहीं है दिनेश जी… इस समस्या का समाधान व्यापक तरीके से होना चाहिए. छोटे-छोटे उपाय कर कुछ भी हाथ नहीं लगेगा. .

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 22, 2012

आदरणीय तमन्ना जी, नमस्कार हर सिक्के के दो पहलु होते है पहला आपने दिखाया जिसमें कोई संदेह नहीं और किया भी नहीं जाना चाहिय क्यूंकि अपनी मर्जी से वास्तव में कोई भीख मांगने का काम नहीं करेगा…………किन्तु इस तथ्य का दुसरा पहलु यह है की आज यह एक ट्रेंड के रूप में उभरा है जहाँ इसे एक आसान जरिया बना लिया गया है…………इस तथ्य को समझने के लिए हमें ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है कभी गौर से देखिएगा समझ में आ जाएगा की भीख मांगने वालों में कितने असली हैं और कितने बनावटी……….फिर भी इसबात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की बच्चों को जबरन यहाँ भीख मंगाया जा रहा है जिसका की विरोध होना चाहिए …….बहुत ही सुन्दर आपकी पिछली पोस्ट भी पढ़ी थी किन्तु समझ नहीं पाया की गाँधी जी का विरोध करूँ की आपके कथनों का क्यूंकि आपके भी तर्क अपनी जगह बिलकुल सही लग रहें थे ……………पर गांधीजी को……..अभी भी समझ नहीं पाया हूँ क्षमा करें

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    आनंद जी बेहद संतुलित और निष्पक्ष प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए हार्दिक धन्यवाद.. आपकी बात सौ प्रतिशत सही है लेकिन जब तक भिक्षावृत्ति को समाप्त करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे तब तक उन माफियाओं का भी बोलबाला रहेगा जो जबरन भीख मंगवाते हैं.

rajkamal के द्वारा
May 22, 2012

Aadrniy तमन्ना जी ….. सादर अभिवादन ! इनके जीवन को सुधारने के स्थान पर हम इनके जीवन को ही कोसते रहते हैं. “आज” आपकी एक एक बात सही है ….. इस अखबार में छपने वाले लेख के लिए अग्रिम मुबारकबाद आपकी पिछली बात का जवाब : अगर आप संगीतकार है तो आप दर्शकों को यह नहीं कह सकती की आप पहले मुझको मेरे से अच्छे सुर में गाकर सुनाओ फिर मेरे गायन के बारे में कुछ भी कहना …… हार्दिक आभार :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    राजकमल जी… हा हा  हा… आपकी शुभकामनाएंरही तो यह लेख समाचार पत्र में छप जाएगा. मेरे लेख को अपना समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
May 22, 2012

आदरणीय तमन्ना बहन ,.सादर नमस्ते अनछुए विषय पर कलम चलाने के लिए साधुवाद आपको ,..भिखारी निश्चित ही समाज में दया के पात्र हैं ,..तमाम विसंगतियां हैं ,..कटोरा मजबूरी में एक बार उठ गया तो उठ गया !!..फिर लाख कोशिश कर लो इससे अच्छा धंधा कोई और नहीं मिलता ,…पेट की भूख के आगे आत्मसमान किसको दीखता है ,…सरकारों ने तो पूरे देश को भिखारी बनानने का प्लान बनाया है वो भला इन बेचारों की परवाह क्यों करेंगे ,..फिर ये भी ज्यादा दया के पात्र नहीं हैं ,,अब भिखारी माफिया भी हो गए हैं जो अच्छे भले लोगों को भिखारी बनाने का काम करते हैं और यह सब प्रशासन की जानकारी में होता है ..साभार

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    संतोष जी ,, आत्म सम्मान के साथ जीना हम सबका मैलिक अधिकार है. लेकिन आपकी बात सही है कि पेट की भूख के आगे आत्म सम्मान के कोई मायने नहीं रह जातें. लेकिन उन्हें भी तो पेट भर खाना, पहनने के लिए कपड़े और रहने के लिए घर मिलना चाहिए. हम जैसे ही तो है वो लोग उनकी समस्याएं क्यों सरकरा को नजर नहीं आती. जब सरकार अपना सख्त कदम बढ़ाएगी तो माफिया भी अपने आप ही समाप्त हो जाएंगे.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 22, 2012

आदरणीय तमन्ना जी, सादर अभिवादन. सर्व प्रथम आपके इस सुन्दर लेख की तारीफ करना चाहूँगा की आपने उन लोगों के बारे में विचार रखकर ध्यान आकर्षित किया जिनको हम हेय द्रष्टि से देखते हैं और दुत्कारते हैं. ज्यादातर लेखों में एक पत्रकार, माननीय विधायको, की तरह प्रश्न उठाये जाते हैं पर क्या व्यवस्था दी जाये पर कोई कुछ नहीं कहता, मार्ग प्रशस्त नहीं करता , शायद आपने भी यही किया है . शीशा बंद किया और चल दिए फिर भूल गए. फिर भी आभार.

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    प्रदीप जी… मैं भी आप ही की तरह आम जनता में शामिल हूं. हम सिर्फ अपनी तकलीफें सरकार को बता सकते हैं या सामाजिक समस्याओं की तरफ उनका ध्यानाकर्षित कर सकते हैं … इसके अलावा हम क्या सुझाव दे सकते हैं..

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    May 24, 2012

    आप ठीक कह रही हैं हम लोग दर्शक मात्र हैं फिर भी आपने अपने केख से प्रस्तुत किय शायद कर्णधार जाग्रत हों.

nishamittal के द्वारा
May 22, 2012

तमन्ना जी ,भिक्षावृत्ति हमारे समाज की बहुत बड़ी समस्या है,बहुत ही दुखद स्थिति होती है,जब छोटी लड़कियां गोद में बच्चा उठाकर आपके प[एरोन में झुक कर भीख मांगती हैं,परन्तु इसका दूसरा पहलु भी है,मैंने स्वयं कई बार प्रयास किया कि उनको किसी काम में उनकी क्षमता के अनुरूप लगाया जाय परन्तु उनकी न तो रूचि है,न इच्छा शक्ति साथ ही आजकल भावनात्मक शोषण करने वाले नए नए तरीके खोज लिए गए है,स्वस्थ आदमी आकर कहेगा ,मेरी पत्नी बीमार है,बच्चा बीमार है,अस्पताल में है,बाद में पता लगता है कि वो सब फ्राड था.मेरा मानना है कि स्वस्थ आदमी को काम करने के लिए ही प्रेरित किया जाना चाहिए.

    anoop pandey के द्वारा
    May 23, 2012

    तमन्ना जी मै निशा जी से सहमत हूँ…..अभी भी संवेदनाओ का इतना लोप नहीं हुआ की कस्ट में पड़े किसी की समाज मदद न करे…………पर भीख मांगना एक धंधा जैसे हो गया है हर हफ्ते वो हीपुराने चेहरे दीखते है भीख मांगते…..इच्छा नहीं है काम करने की. आजमा कर देखा है मैंने. ऐसा भी देखा है की किसी ने ४ दिन भीख मांगी फिर पैसे बचा कर घूम घूम कर गुटखा बेचा और आज खुद की दूकान कर रहे है.

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    आदरणीय निशा जी और अनूप जी… मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं इसीलिए मैं यह कह रही हूं कि आप या मैं इन्हें सही मार्ग पर नहीं ला सकते जब तक सरकार और गैरसरकारी संस्थाएं मिलकर इनके लिए काम नहीं करती. सत्यमेव जयते जैसे कार्यक्रम का उदाहरण ही ले लीजिए. अगर इस कार्यक्रम का सरकार पर इतना ही प्रभाव पड़ता है तो इसमें भी इस मुद्दे को उठाया जाना चाहिए. ताकि  वर्षों से सोई हुई सरकार की आंखें खुले और वह समाज की मुख्यधारा में शामिल ना हो पाए ऐसे लोगों के हितों के लिए कोई प्रयास करें.

follyofawiseman के द्वारा
May 22, 2012

अदरणीय तमन्ना जी, …..अपने लेख तो बड़ा लम्बा-चौड़ा लिखा है….लेकिन मेरे कुछ मित्र जो की भिखारी है उनका कुछ प्रश्न है आपके लिए, जो मैं आपसे उनके बदले पुछना चाहता हूँ……1.अपने इस लेख को लिखने के अलावा अब तक क्या कुछ किया है भिखारियों के लिए……? 2. आप ख़ुद को क्या मानती है राजा या भिखारी……?  3. उन लोग जो मंदिर, मस्जिद और जिरजा में हाथ फैलाए हुए है क्या मानती है…..वो क्या हैं आपकी नज़र मे……भिखारी या सम्राट……. 4. क्या आपकी सभी माँगें समाप्त हो चुकी है…….? और अगर आपके हिसाब से सड़क पर रहने वाले लोग दुखी हैं…दया के पत्र…..तो इसका अर्थ ये हुआ की जो अच्छे घरों मे राहतें है उनको अच्छी नींद आती है…..वो सूखी है……. अपने जो अपने इस अतरंगी लेख से भिखमंगों का मज़ाक उड़ाया है वो अत्यंत ही निंदनीय है……अगर आपको अपनी महानता और बैभव का ही प्रदर्शन करना था तो उसके अनेक रसतें है….इस तरह समाज के किसी खास वर्ग को नीच और दयनीय दिखा कर ख़ुद को महान सवित करना कहाँ तक उचित है…….. मुझे समझ नहीं आता है कि लोग भिखमंगों को लेकर इतनी राजनीति क्यों करतें है……

    May 22, 2012

    अरे मित्र, यदि राजनीति नहीं करेंगे तो उनकी रोजी रोटी कैसे चलेगी………. यदि आदरणीय तमन्ना जी को इतना ही उनके दर्द का ख्याल है तो जाकर कुछ उनके लिए करें न…………..यहाँ चिल्लाने से क्या फायदा ……………..!

    follyofawiseman के द्वारा
    May 22, 2012

    ही……………ही……………ही…………………..ही……………………….!

    sinsera के द्वारा
    May 22, 2012

    Laurel and Hardy…..:-) :-)

    dineshaastik के द्वारा
    May 23, 2012

    लजवाब…..

    Jack के द्वारा
    May 23, 2012

    सिंसेरा जी आपका कमेंट बहुत ही मजेदार और दोनों बंधुओ पर सटीक बैठता है

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    फॉली जी… आपको हर सीधी बात गलत ढंग से कहने की शायद आदत है. और आदतें बहुत जल्दी पीछा भी नहीं छोड़ती.. आपको हार्दिक शुभकामनाएं की आपने अलीन जी को अपनी मानसिकता से प्रभावित कर दिया है. खैर अब तो मुझे आपकी किसी बात का बुरा लगना भी बंद हो गया है इसीलिए अब आपका कमेंट पढ़कर मुझे कुछ सोचने की जरूरत भी नहीं पड़ती. मैंने सीधी सी बात लिखी, इस उद्देश्य से की शायद जैसे कन्या भ्रूण हत्या औरदहेज हत्या पर सरकार की नींद खुली है तो शायद आज नहीं तो कल उन्हें भिक्षावृत्ति पर भी अपनी कृपा दृष्टि पड़ जाए. मेरी नजर में भीख मांगने वाले भी इंसान है और मैं कभी किसी असहाय व्यक्ति की निंदा नहीं कर सकती. मैं अभी इतनी सक्षम नहीं हूं कि अकेले अपने दम पर इनके लिए कुछ नहीं कर सकती. लेकिन जिन लोगों को हमने वोट देकर सत्ता पर बैठाया है उनका यह कर्तव्य है कि वहब उनके लिए कुछ करें. मेरे एक-दो रुपए से भिख मांगने वालों का जीवन नहीं सुधरने वाला. लेकिन अब जब आप लोगों को हर बात गलत तरीके से ही लेनी है तो यह आपकी और मिस्टर अलीन जी की सोच है….. लेख को अपना समय देने के लिए धन्यवाद

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    सिंसेरा जी… बहुत खूब

    follyofawiseman के द्वारा
    May 23, 2012

    हाँ….हाँ….हाँ……! ही…..ही….ही……! :) “अब तो मुझे आपकी किसी बात का बुरा लगना भी बंद हो गया “ मतलब पहले लगता था…..ही ….ही.(तो मैं आप को कुछ भी कह सकता हूँ….अच्छा किया आपने बता दिया)….. अब लगता है आपका हृदय सूख गया है……बुरा लगने के लिए जितनी संवेदनशीलता की ज़रूरत होती है वो अब आप मे नहीं रही…….! “मेरे एक-दो रुपए से भिख मांगने वालों का जीवन नहीं सुधरने वाला” सत्य वचन….हाँ लेकिन आपके लेख लिखने से उनका जीवन सुधार जाएगा……ये अच्छा है……’भोज नई भात हर-हर गीत’ करनी-धरणी कुछ नहीं सिर्फ राग अलापना…….I like it !

    May 23, 2012

    तमन्ना जी, सही तो यह है कि आपको हर गलत बात को सही ढंग से कहने की आदत है और वो भी शायद नहीं यक़ीनन. ठीक है आप अकेले दम पर नहीं कर सकती है , पर अपना बेशकीमती समय निकालकर अपने आस-पास के भिखारियों के सुख और दुःख में बैठ सकती है न. तो करिए न क्यों अपने भावनाओं और संवेदनाओं को बेचकर अपने सपनों का महल खड़ा करना चाहती है. अब आप इस पर सफाई मत दीजियेगा….इंसान दूसरों को धोखा दे सकता है पर खुद को नहीं और जो खुद को धोखा नहीं दे सकता, वो खुदा को धोखा नहीं दे सकता और जो खुदा को धोखा नहीं दे सकता वो अलीन को धोखा नहीं दे सकता. लगता है कुछ जटिल बात कर दिया हूँ जिसपर आपके चिंतन करने से आपका बेशकीमती समय बर्वाद होगा. अतः चलिए कुछ आसान कर देता हूँ. एक आदमी एक समय में एक या बहुत समय में बहुत लोगों को मुर्ख बना सकता है परन्तु हरेक समय हरेक व्यक्ति को मुर्ख नहीं बना सकता.

    haribol के द्वारा
    May 23, 2012

    तेरी आखिरी बात बिलकुल तेरे पर ही हूबहू लागू होती है स्वान भाई. चल कम से कम समझ तो आई कि तू भी हमेशा मूर्ख बनाकर अपना नाटक नहीं चला सकता. अभी अभी पागल दीवाना है, तो थोड़ी ही देर में कुत्ता है. कभी खाल ओढ़कर शेर बन जाता है, तो अभी जब मुंहबोली बहन ने एक डोज पिलाई, तो तेरी पूंछ और भाषा दोनों थोड़ी सीधी हुई दिख रही है. लेकिन तेरी असली पहचान यही है कि तू खांटी तेलियामसान है, और तेरा अंतिम पड़ाव पागलखाना ही है.

    May 24, 2012

    हाँ…..हाँ….हाँ……! इज्जत अफजाई के लिए शुक्रिया………………….!

    dineshaastik के द्वारा
    May 24, 2012

    आदरणीय हरीबोल जी आप पशुओं की भाषा में बहुत पारंगत हैं,  शायद आपका पूर्व  जन्म में विश्वास है। अरे पूर्व  जन्म को छोड़ियें यहाँ कोई पूर्व  जन्म में विश्वास नहीं करता, मैं तो विल्कुल  ही नहीं। आप पूर्वजन्म में क्या थे। इसे भूल  जाइये। इस   जन्म में इंसान हैं और इंसान  बनकर रहिये। क्योंकि यहाँ सभी को आपकी जरूरत है क्योंकि आप काई तरह की भाषाओं में पारंगत  हैं। मेढ़क , कुत्ता, गधा आदि। यह कला ईश्वरीय कृपा के बिना नहीं मिलती।  जहाँ तक  पागल पन का सवाल  है तो सभी में कुछ  न कुछ  लक्षण   पागलपन के पाये जाते हैं। दस  पागलों में एक  पागल  इतना महान होता है कि उसके सामने सारी दुनिया बोनी लगने लगती है। ईसा मसीह, सुकरात, मीरा बाई, कबीर, सूरदास, सुकरात  आर्कमिटीज महात्मा गाँधी, भगत  सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, मजनूँ, चाणक्य आदि  पगल  ही तो थे। यदि हम  इन्हें पागलखाने में भरती कर देते तो मानवता का कितना अहित होता। शायद आपने कल्पना नहीं की होगी।

Mohinder Kumar के द्वारा
May 22, 2012

तमन्ना जी, भिक्षावृत्ति, बाल रोजगार को सरकार गुनाह तो मानती है परन्तु इनसे निबटने के लिये सरकारी योजनायें नाकाफ़ी हैं. मनुष्य की सबसे बडी तीन आवश्यकतायें, रोटी, कपडा और मकान यदि पूरी हो जायें तो कौन भीख मांगना चाहेगा. आपका विश्लेषण बिलकुल सही है. इन सब में कहीं न कहीं इस सभ्य समाज का भी दोष है… लिखते रहिये.

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    मोहिंदर जी… यही बात मैं भी समझाना चाहती हूं कि भिक्षावृत्ति को अपराध की श्रेणी में रखने से पहले कम से कम भिखारियों के लिए जीवन यापन का साधन तो ढ़ूंढा जाना चाहिए. सरकार तो ऐसे लोगों को भारत का नागरिक कहने से भी हिचकिचाती है. तभी तो उन्हें ध्यान में रखकर कोई ठोस योजनाएं नहीं बनाती.

चन्दन राय के द्वारा
May 22, 2012

तमन्ना जी , लोगो ने अपनी सहूलियत के हिसाब से शागुफे छेड़ रखें है , सोचीय उस सतयुग में भी लोगो ने यही राग अल्पा रखा था मांगत मरण समान है , जबकि साधू भिक्षा से ही पेट भरता है , यह धर्म कहता है , रही बात हमारी सरकार की तो जब उनके कानो पे जूं नहीं रेंगती तो गरीब की कराह तो उनके कानो तक पहुचे कैसे , इस विषय पर गम्भित चिंतन की जरुरत है , बेहतरीन आलेख , सबसे नितांत विषय पर लिख आपने पुन्य कर्म किया है

    Tamanna के द्वारा
    May 23, 2012

    चंदन जी .. आपका कहना सही है भीखारियों की ऐसी हालत के लिए सर्वप्रथम सरकार ही जिम्मेदार है. लेकिन मेरी शिकायत उस बुद्धिजीवी वर्ग से भी है जो खुद को समाजसुधारक कहता है. जिन मुद्दों से हम भली भांति परिचित है उन्हें हर बार हमारे सामने लेकर आया जाता है लेकिन समाज के छिपे हुए मुद्दों की ओर ध्यान देना कोई जरूरी नहीं समझता.


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