सरोकार

शोषित मानवता के लिए नवज्योति और आत्मविश्वास का सृजन करता ब्लॉग

54 Posts

1772 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5462 postid : 280

एकतरफा निर्णय है यौन संबंधों की आयु सीमा में वृद्धि करना - Jagran Forum

Posted On: 4 Jun, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

शारीरिक संबंधों से जुड़ा मसला भारतीय समाज में हमेशा से ही एक ऐसा विषय रहा है जिस पर छिपे तौर पर तो कई चर्चाएं होती रही हैं लेकिन निष्पक्ष मानसिकता से कभी इस पर विचार नहीं किया गया है. निश्चित रूप से यह दो लोगों के निजी जीवन के अंतर्गत आता है लेकिन जब यह परंपरा प्रधान भारतीय समाज के दायरे में आ जाता है तो इसका स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है.


हमारे समाज में किसी भी महिला और पुरुष के बीच स्थापित होने वाले शारीरिक संबंधों का निर्धारण उम्र और आपसी सहमति जैसे मानकों पर किया गया है. अर्थात अगर एक निश्चित उम्र से पहले कोई जोड़ा शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे बलात्कार की श्रेणी में ही रखा जाएगा. भले ही प्रेमी जोड़े ने आपसी सहमति के साथ अपने रिश्ते को आगे बढ़ाया हो लेकिन अगर यह बात सार्वजनिक हो जाती है तो परिवार और समाज इस विषय में क्या सोचते हैं उसे नजरअंदाज करते हुए कानून द्वारा पुरुष को बलात्कार का दोषी ठहराते हुए उसे सजा का हकदार समझा जाता है. आपसी रजामंदी से बनाए गए शारीरिक संबंधों के लिए पहले 16 वर्ष उम्र सीमा निर्धारित की गई थी लेकिन अब इसे बढ़ाकर 18 वर्ष करने का प्रस्ताव लाया जा रहा है.


लेकिन क्या वर्तमान परिस्थितियों और सामाजिक हालातों के अनुरूप इस प्रस्ताव को न्यायसंगत कहा जा सकता है ? शायद नहीं!! हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि पहले की अपेक्षा आज के युवा और किशोर शारीरिक और मानसिक रूप से कहीं पहले परिपक्व हो जाते हैं. इंटरनेट जैसी आधुनिक तकनीकों की प्रमुखता के कारण शारीरिक संबंधों के प्रति उनका रुझान आज किसी उम्र का मोहताज नहीं रह गया है. किशोर हो या किशोरी दोनों में ही समान रूप से इस ओर दिलचस्पी बढ़ने लगती है और वह आपसी सहमति के साथ ऐसे संबंधों को स्वीकार्यता दे देते हैं. अब ऐसे में केवल किशोर को दोष देना कितना उचित है यह बेहद गंभीर मसला है. कुछ मामलों में भले ही किशोरी को बहला-फुसला कर या जबरन शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी किया गया हो लेकिन अधिकांशत: यह सहमति के साथ ही बनाए जाते हैं.


मैं विवाह से पहले शारीरिक संबंध बनाए जाने के पक्ष में बिलकुल नहीं हूं लेकिन अगर कोई प्रेमी जोड़ा इस ओर कदम बढ़ाता है तो इसके लिए केवल किशोर को ही दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए. उस पर बलात्कार का आरोप लगाना एकतरफा निर्णय ही कहा जाएगा.


भारतीय समाज में नारी का दर्जा हमेशा से ही द्वितीय रहा है इसीलिए अब उसके उत्थान की कोशिशों में तेजी आने लगी है. यही कारण है कि हमारी न्याय व्यवस्था में महिलाओं को ज्यादा अहमियत दी जाती है. जब भी कोई कानून बनता है तो वह महिलाओं को ही ध्यान में रखकर बनाया जाता है. लेकिन अब इस ओर थोड़ी व्यापक मानसिकता से विचार करने की जरूरत है.


सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों की उम्र में वृद्धि करने जैसा प्रस्ताव निश्चित ही महिलाओं की स्थिति को सुधारने का एक और प्रयत्न है लेकिन यह समस्या को कम करने से ज्यादा बढ़ाने में भी सहायक हो सकता है. महिलाओं के उत्थान की ओर कार्य करते हुए हम पुरुषों के हितों को भी तो नजरअंदाज नहीं कर सकते. साथ पढ़ने और समय बिताने से एक-दूसरे के प्रति आकर्षण विकसित होता है और अगर इस आकर्षण का अगला पड़ाव शारीरिक नजदीकी है तो इसके लिए केवल पुरुष तो दोषी नहीं हो सकता.

भारतीय परिदृश्य पर गंभीरता से विचार करें तो आज भी हम इस धारणा पर विश्वास करते हैं कि यहां महिलाओं को ऐसी वस्तु की तरह समझा गया है जिसका उपयोग और उपभोग पुरुष अपने मनचाहे ढंग से कर सकता है. लेकिन अब हमें पुरानी और परंपरागत मानसिकता को त्यागकर निष्पक्ष भाव से निर्णय लेने और उन्हें कार्यरूप देने की कोशिश करनी चाहिए.




Tags:                                     

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 3.78 out of 5)
Loading ... Loading ...

19 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Amit Dehati के द्वारा
June 12, 2012

मेरा अनुभव !!! अगर मेरी आवाज सरकार तक पहुचे तो , मै यहीं सलाह देना चाहूँगा की दोनों अर्थात लड़के और लड़की की शादी की उम्र टीनेज में ही निर्धारित कर दी जानी चाहिए और मिनिमम उम्र १६ कर देनी चाहिए ….क्यूंकि यही उम्र होती है जिसमे कोई बच नहीं पाया । और कोई खुद को रोक नहीं पाता..। मुझे लगता है की इससे समाज में बहुत सारे सुधार होंगे और संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी. आइये जाने ये मशवरा कितना साही है …..? १- इस उम्र में लगभग सभी सिनिअर सेकंड्री के इर्द गिर्द रहते है । इस उम्र में शारीरिक एवं मानशिक विकाश चरम पे रहता है । २- इस अवस्था में सबसे ज्यादा किशोर एवं किशोरियां सेक्स के बारे में ज्यादा सोचती है। ३- अगर पेरेंट्स इस समय अपने पुत्र/पुत्री की शादी किसी से तय कर दें तो ९० परसेंट किशोर/किशोरियां गलत संगत से बच जाएँगी. कारण ये है की उस उम्र में पेरेंट्स जिस तरह से चाहेंगे और जैसा आप्सन देंगे वैसे बच्चों को स्वीकार हो जायेगा क्यूंकि ये उम्र ही वैसी है की बिपरीत लिंगी जैसा भी हो अच्छा लगता है। और पेरेंट्स ढूढेंगे तो सही ही ढूढेंगे । ४- जब बच्चों का दिमाग एक तरफ केन्द्रित हो जायेगा तो उसकी पढाई भी अच्छी होगी । ५- इस उम्र में जो फिक्स हो गया वो किसी और के तरफ ध्यान नहीं देता । और साथ साथ बच्चे अपने अति उत्तेजित अवस्था से बाहर आ जायेंगे उस उम्र की सीमा को पर कर जायेगें और उन्हें पता भी नहीं चलेगा । उसके बाद उनको शारीरिक आकर्षण जो होता है विपरीत लिंगी के तरफ वो बहुत कम हो जायेगा। इससे समाज में दुराचार भी ९८ परसेंट कम हो जायेगा। ६- आज हो रहे समाज में दुराचार रेप के पीछे एक ही कारण है | उदाहरण के तौर पर- कोई खूब भूखा, कई दिनों से उसको खाने नहीं दिया जा रहा , अचानक उसको मौका मिलता है खाने का तो वह कुत्ते और गीधों की तरह नोच-नोच के खायेगा क्यूंकि वह भूखा है । ठीक उसी तरह सामाजिक बंधनों की वजह से लोगों को वह सब नहीं मिल पाता जिसकी जरुरत प्रकृति पैदा करती है उम्र के अनुसार । जैसे ही लोगों को मौका मिलता है दुराचार को अंजाम दे देतें है… ७- आज के बच्चे ही कल के दुराचारी होते है ……इस लिए हमें जरुरत है इस बात पर गौर करने की . ८- शादी शुदा लोगों के तरफ बहुत कम लोग ध्यान देते है । और जब सभी शादी शुदा नजर आएंगे तो किसी की ध्यान उस तरह से नहीं जाएगी जिस तरह से किशोरियों पे जाती है…। हाँ हर चीज का एक साइड इफेक्ट होता है …उन बातों के लिए कड़े कानून बनाया जा सकता है जैसे – १- जनसँख्या बृद्धि। इस पर रोक लगाने की लिए सरकार कोई कदम उठाये… और भी इसके साइड इफेक्ट हो सकते है… फ़िलहाल इतना ही … धन्यबाद !!! अमित देहाती

ajay kumar pandey के द्वारा
June 10, 2012

तमन्ना जी नमन आपकी रचना अच्छी लगी आप कृपया मेरे ब्लॉग पर आकर अम्मा जरा देख तो उप्पर पढ़कर बताइए की क्या यह रचना दैनिक जागरण में प्रकाशित होने के योग्य है या नहीं धन्यवाद

ashokkumardubey के द्वारा
June 7, 2012

तमन्ना जी आपने इस विषय को बहुत ब्यापक तौर से समझा और लिखा है मैं आपके विचारो से पूर्णतया सहमत हूँ और इसमें एक बात और जोड़ना चाहूँगा वह यह की जब आज हमारे देश में महिलाओं को समान अधिकार देने की बात की जा रही है और हमारा समाज कमो बेश इस पर अपनी रजा मंदी दिखा भी रहा है ऐसे में महिलाओं के लिए कोई विशेस प्रावधान की जरुरत नहीं रही हाँ गाँव में अभी हमारा समाज काफी पिछड़ा है और वहां नाबालिगो पर अब भी अत्याचार होते रहते हैं जरुरत है सिक्छा को गाँव गाँव तक पहुचाने की आपने पुरुष पक्छ को भी न्याय दिया है इसके लिए धन्यवाद महिलाओं को और सशक्त होने की जरुरत है और उनका आत्म निर्भर होना आज की जरुरत है और इसी से उनपर होनेवाले अत्याचार का खात्मा हो सकता है अंत में एक अच्छा लेख लिखने और जागरण द्वार सर्वश्रेस्ट ब्लाग घोषित किये जाने के लिए आपको बधाई

omdikshit के द्वारा
June 7, 2012

तमन्ना जी, एक कहावत है कि……काज़ी क्यों दुबले ,शहर के अंदेशे से?

Archana chaturvedi के द्वारा
June 6, 2012

बहुत खूब लेख तमन्ना जी …………और सार्थक भी

June 5, 2012

अब यह निर्णय एक तरफा कहा रह गया ……….! आप जैसी महान विचारक का भी तो निर्णय आ गया……………..!

akraktale के द्वारा
June 5, 2012

तमन्ना जी सादर, इतना व्यग्र होने की कोई बात नहीं है सरकार के उद्देश्य को समझना आवश्यक है. सिर्फ क़ानून का रोना रोने से कुछ नहीं है. क़ानून तो कई है जिनका पालन नहीं हो रहा है. और जिस तरह के उदाहरण आपने देने की कोशिश की है उस तरह तो मै यही कह सकता हूँ की यदि छः सात वर्ष की उम्र में बच्चे को कार चलानी आ जाए तो उसे लायसेंस दे दिया जाना चाहिए. शायद ठीक नहीं है. और आपके अंतिम पैरे पर तो मेरा कहना है की आप खुद इस पर विचार करें की क्या वाकई आज देश का परिद्रश्य आपके कहे अनुसार है?

rekhafbd के द्वारा
June 5, 2012

तमन्ना जी , भारतीय परिदृश्य पर गंभीरता से विचार करें तो आज भी हम इस धारणा पर विश्वास करते हैं कि यहां महिलाओं को ऐसी वस्तु की तरह समझा गया है जिसका उपयोग और उपभोग पुरुष अपने मनचाहे ढंग से कर सकता है. लेकिन अब हमें पुरानी और परंपरागत मानसिकता को त्यागकर निष्पक्ष भाव से निर्णय लेने और उन्हें कार्यरूप देने की कोशिश करनी चाहिए., आपके विचारों से पूर्णतया सहमत

Mohinder Kumar के द्वारा
June 5, 2012

तमन्ना जी मैं आपके विचारों से पूर्णतया सहमत हूं.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 5, 2012

भारतीय परिदृश्य पर गंभीरता से विचार करें तो आज भी हम इस धारणा पर विश्वास करते हैं कि यहां महिलाओं को ऐसी वस्तु की तरह समझा गया है जिसका उपयोग और उपभोग पुरुष अपने मनचाहे ढंग से कर सकता है. लेकिन अब हमें पुरानी और परंपरागत मानसिकता को त्यागकर निष्पक्ष भाव से निर्णय लेने और उन्हें कार्यरूप देने की कोशिश करनी चाहिए.

anoop pandey के द्वारा
June 5, 2012

पूर्णतया सहमत आपसे तमन्ना जी.

harish sharma के द्वारा
June 4, 2012

आपने जो ये बात उठानी चाही है वो दरअसल एक छोटी सी बात के अलावा कुछ भी नहीं है……… और हाँ वैसे मैं आपको कोई सलाह तो नहीं देना चाहता पर एक बात जरूर कहना चाहूँगा की आप अपने हर article में दोहरी बातें ही लिखती है……!!! दोनों पक्ष होने से आपकी बाते दौकली लगने लगती है……!!! ये सही रहेगा की आप थोड़ी सटीकता बरतें……..!!! बलात्कार अपनी जगह है और love making अपनी जगह है………बस अपने नज़रिए का फर्क है………!!! .. Any act with intention of love making is worthless and time wasting if filed, for LAW…… so many thanx

vikramjitsingh के द्वारा
June 4, 2012

क्या यही मसले बचे थे लिखने के लिए…….??? इतना अत्याधुनिक होना क्या उचित है….??? सामाजिक परिवेश क्या इज़ाज़त देता है इसकी….??? या फिर कसम खाई है हमेशा विवादित रहने की…..???

चन्दन राय के द्वारा
June 4, 2012

तमन्ना जी , पहली बात तो यह की इक स्त्री होकर यह कह पाने और मानने का सच्चा साहस, आपने कर दिखाया , जो अमूमन स्त्रियाँ अक्सर झूठा दोषापरण कर के अपनी कमजोर स्थिति को मजबूत कर लेती है , सरकार के ये कानूनी नियम उसी तरह है जैसे शराब बिक तो रही है ,पर उसे पीना गुनाह है , मतलब की गर आप किसी पार्टी में अल्कोहल ले रहे तो इन्तजार करिय नशा उतरे नहीं तो कटवाए चालान ! और ये तो बस फिजूल का कानून है , मुझे इसकी कोई जरुरत दिखाई नहीं देती


topic of the week



latest from jagran