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प्रतिभाओं के अभाव में क्या किसी को भी बना देंगे "भारत की बेटी"

Posted On: 20 Jul, 2012 में

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अभी कुछ दिन पहले स्पेस साइंटिस्ट सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष की ओर अपनी दूसरी उड़ान भरी. यह पहला मौका नहीं है जब सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष की ओर रुख किया. इससे पहले वर्ष 2007 में भी वह अंतरिक्ष तक अपनी पहुंच बना चुकी हैं जब लगभग 6 महीने के लिए उन्होंने अंतरिक्ष को ही अपना घर बना लिया था.


भले ही दुनियाभर की महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बन चुकी सुनीता का नाम आज किसी पहचान का मोहताज नहीं रह गया है लेकिन जब भी भारतीय मीडिया इनके नाम को प्रचारित करती है तो सुनीता विलियम्स नाम के आगे एक ऐसा विशेषण जोड़ देती है जो कुछ ज्यादा ही हास्यास्पद प्रतीत होता है. समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों में सुनीता विलियम्स के स्पेस जाने जैसी जानकारी तो आपने पढ़ी और सुनी होगी जिनके लिए बिना किसी कारण “भारत की बेटी जैसी संज्ञाओं का प्रयोग अवश्य किया जाता है.


इसे देखकर मेरे मन में यह सवाल उठा कि जिस महिला का भारतीय मिट्टी से कोई लेना-देना ही नहीं है उसे भारत की बेटी कहना कितना सही है? सुनीता विलियम्स के पिता दीपक पांड्या का जन्म भारत में हुआ था लेकिन जितना समय उन्होंने भारत में नहीं बिताया उससे कहीं ज्यादा समय उन्होंने अमेरिकी जमीन पर  गुजारा है. उनकी भारतीय नागरिकता भी छिनी जा चुकी थी. सुनीता विलियम्स की मां एक अमेरिकी महिला थीं और उनके पति भी एक अमेरिकी ही हैं. सुनीता की पढ़ाई-लिखाई, उनका पालन-पोषण, संस्कार सभी अमेरिकी हैं. उनका भारत से कोई सीधा संबंध भी नहीं है लेकिन हम फिर भी खुद को संतुष्ट करने और बेवजह का श्रेय लेने के लिए उनके भारतीय होने का दम भरते रहते हैं.


सुनीता विलियम्स को भारत की बेटी कहना और उनकी उपलब्धियों पर अपनी पीठ थपथपाना यह प्रमाणित करता है कि हमारे देश में प्रतिभाओं का अकाल पड़ गया है और हम बिना कोई मौका गंवाए बेवजह अपनी उपलब्धियों का बखान करना चाहते हैं.


एक कहावत है बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना, जो हम भारतीयों पर बेहद सटीक बैठती है. अब देखिए एक ओर जहां हम भारतीय अपने देश की महिलाओं को दहेज के लिए जलाने में और उन पर तरह-तरह के अत्याचार करने में विश्वास करते हैं, उस देश के लोग जब सुनीता विलियम्स की कामयाबी पर अपनी सीना चौड़ा करते हैं तो हंसी तो आएगी ही. जहां कन्या भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, बलात्कार जैसी घटनाएं आम हैं वहां सुनीता विलियम्स, जिसने अपने लिए एक ऐसा मुकाम बनाया है जो महिलाओं के लिए क्या बल्कि पुरुषों के लिए भी एक आदर्श है, की कामयाबी के मायने ही क्या रह जाते हैं? हम अपने घर की स्त्री और महिलाओं को अत्याचार करते हैं और जब कोई दूसरी महिला, जिसका हमसे दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है उसकी कामयाबी का जश्न मनाते हैं और वो भी सिर्फ इसीलिए ताकि वैश्विक स्तर पर हमारी पहचान सिर्फ कट्टर देश की ही नहीं बनी रहे इसलिए कहीं ना कहीं थोड़ी उदारता भी तो दिखानी चाहिए.


खुद को श्रेष्ठ और बेहतर साबित करने के लिए नए-नए हथकंडे अपनाना तो हम भारतीयों की पहचान रही है. सुनीता विलियम्स के नाम को अपने मतलब के लिए कैश करना इस सूची में एक अन्य नाम है.




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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashokkumardubey के द्वारा
August 18, 2012

अच्छे को अच्छा कहना कामयाब को कामयाब कहना मेरी राय में तो गलत नहीं हो सकता और फिर फर्क क्या पड़ता है सुनीता विलिअम आज कहाँ रहती हैं? वे कहीं रहें? उनके नाम के साथ भारतीय मूल की रहने वाली महिला कहलाना तो जारी ही रहेगा अगर हम उनकी तारीफ न भी करें तो पूरा विश्व तो उनको जानता है आज. रही बात कन्या भ्रूण हत्या की तो अगर एक बार को हम सुनीता विलियम्स को तवज्जो न भी दें तो क्या इससे भ्रूण हत्या यहाँ रुक जाएगी हाँ इतना जरुर है अगर उनके बारे में हम ज्यादा प्रचार करेंगे तो लोग उससे प्रेरित होकर उतसाहित होकर शायद अपने इस कुकृत्य पर दुबारा सोंचे और इसको बढ़ावा न दें उनको भी समझ आये की जिस कन्या भ्रूण की हत्या करने जा रहें हैं वह कल को इस तरह विश्व में अपन नाम कमा कर देश और परिवार के नाम को रौशन कर सकती है हमें पाजिटिव सोंच का होना चाहिए निगेटिव सोंच हमें और हतोत्साहित कर देगा मेरी राय में

chaatak के द्वारा
August 5, 2012

उचित प्रश्न, पूर्ण सहमति, हिन्दुस्तिन्यों को अब आत्म-मुग्धता से बाहर निकलकर सोचना होगा| ब्रेन-ड्रेन की सफाई देते देते कहीं हमारे पोस्टमार्टम में ड्राई-ब्रेन की रिपोर्ट न आने लगे|

shashibhushan1959 के द्वारा
July 24, 2012

आदरणीय तमन्ना जी, सादर ! बहुत सार्थक विवेचना की है आपने ! सहमत !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
July 23, 2012

घर का जोगी जोगिया आन गाँव का सिद्ध.

satish3840 के द्वारा
July 23, 2012

आपकी बात एकदम सही हें सुनीता विलियम का भारत से दूर दूर का नाता नहीं फिर भारत की बेटी कैसे हुई ? एक भारत की बेटी के द्वारा उठाया गया सवाल एकदम सही हें

yogeshkumar के द्वारा
July 23, 2012

मोहतरमा … सत्य वचन…… मीडिया का दिमाग ख़राब हो जाता है कभी कभी …. बस नाम भर देखा “सुनीता ” …और लगे उछलने …. बंदरों की तरह ….. कौन है.. क्या है… कुछ मालूम नहीं….

Rajesh Dubey के द्वारा
July 23, 2012

हमारी आदत पिच्छ्ल्गु की हो गई है. या जानकारी के अभाव में भी इस तरह की बातें लिख दी जाती होंगी. सिर्फ भारतीय नाम से कोई भारतीय नहीं हो जाता.

anilkumar के द्वारा
July 22, 2012

आदर्णीय तमन्ना जी , कोई अपने से कितना भी दूर चला जाए , उसके साथ एक अपनापन तो बरकरार रहता  ही है । सदियों पूर्व सुदूर देशों में जा बसे भारतवंशीयों के वंशज आज भी अपने से प्रतीत होते हैं । वे भी जो समर्थ  हैं , यदा कदा अपने पूर्वजों के घर गांव देखने खोजने भारत आते देखे गए हैं । कुछ तो है जो उनको हमसे अभी भी  जोङे हुए है । हाँ यह ठीक है कि उनकी उपलब्धीयां हमारे गर्व का विषय नहीं , परन्तु हमारे हर्ष का विषय तो हो ही  सकती हैं ।

rajuahuja के द्वारा
July 21, 2012

तमन्ना जी ! इस देश से होनहार प्रतिभाये संसाधनों / सुविधाओं के आभाव में पलायन कर जाती हैं तब हमारी व्यवस्था आँखें बंद किये बगुला भगत बनी रहती है ! बाहर जाकर वही प्रतिभाएं जब उपयुक्त वातावरण पा फलती-फूलती हैं तो हम बड़ी बेशर्मी से अपनी पीठ स्वयं ही ठोकने लगते हैं !

अजय कुमार झा के द्वारा
July 21, 2012

एक अलग ही नज़रिए से देखा और दिखाया आपने इस घटना और उपलब्धि को । यकीनन सुनीता विलियम्स का अंतरिक्ष में जाना बहुत बडी बात है किंतु उसे जिस तरह से भारत , भारतीयता से जोडा मोडा जा रहा है उसका पूरा खाका खींच दिया आपने । अच्छा तर्क और अच्छी पोस्ट , विचारणीय

yamunapathak के द्वारा
July 21, 2012

तम्मान्ना जी, जब आती हो मंच पर एकदम उम्दा विषय लेकर इस बात के लिए हमें आप पर गर्व है.और आप निश्चय ही बधाई की पात्र हैं. अब रही बात सुनीता जी की भारत भूमि से उनका कोई सम्बन्ध नहीं फिर भी हम पीठ थपथपा रहे हैं.पर एक बात यह भी गौर करने की है की हमारे देश के ही कितने उत्पादों को विदेशी कंपनियों ने बगैर हमारा नाम बताये अपने नाम पर पेटेंट करवा दिया.आज भी जिन नए अविष्कारों की बात होती है उसमें से आधे तो मौलिक रूप में भारतीय प्रतिभाओं के ही सुझाए हुए होते हैं.हम आइन्स्टीन को गर्व से याद करते हैं पर ठीक उसी समय वराहमिहिर जैसे भारतीय प्रतिभा को भूल बैठते हैं. “हमारे देश में प्रतिभाओं का अकाल पड़ गया है और हम बिना कोई मौका गंवाए बेवजह अपनी उपलब्धियों का बखान करना चाहते हैं.प्रतिभाओं का अकाल कहते समय “हम कल्पना चावला को भी भूल जाते हैं वह तो भारतीय थी. हमारे देश में प्रतिभाओं का अकाल नहीं है कई hidden talent हैं बस सुविधाओं के अभाव में explore नहीं हो पा रहे हैं.हाँ ,इस ओर ज़रूर सरकार को ध्यान देना चाहिए. धन्यवाद

    jlsingh के द्वारा
    July 23, 2012

    आदरणीय तमन्ना जी, और यमुना जी,सादर अभिवादन! सुनीता विलियम का नाम आया तो कल्पना चावला प्रासंगिक है. पर हमारी झारखण्ड की बेटी ‘दीपिका कुमारी’ को तो याद करिए जो लन्दन ओलिम्पिक में ‘पदक’ लाने की तैयारी कर रही है! आपका(तमन्ना जी का) सबसे हटकर अलग विषय पर तार्किक विवेचन सराहनीय होता है! साधुवाद!

jagojagobharat के द्वारा
July 21, 2012

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना, जो हम भारतीयों पर बेहद सटीक बैठती है. बिलकुल सटीक लिखा है आप ने .पूर्ण सहमती .

डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
July 21, 2012

सही कहा आपने…न इस देश जन्म, न शिक्षा..न ही निवास पता नहीं किस बात पर हम सब इतरा रहे हैं जबकि हमारी अपनी ही बेटियां दुःख में हैं…गर्भ में मारी जा रही हैं…

pritish1 के द्वारा
July 21, 2012

हमारे भारत मैं प्रतिभाओं का अभाव नहीं है……अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा प्रणाली को हमारी अपनी संस्कृति को मार दिया है और हमारी वर्त्तमान व्यवस्था भी उनका ही अनुशरण कर रही है……….कोई भी व्यक्ति बिना मौलिक चिंतन के मौलिक शोध नहीं कर सकता…….वर्त्तमान हम जो विद्यार्थी हैं हमारे दिमाग में अंग्रेजी और विदेशी technology भर दी जा रही है……हमारा जो मौलिक चिंतन है वह अपना रूप ही नहीं ले पा रहा है………आप भारत का इतिहास देखिये सभी ज्ञान की उत्पत्ति यहीं से हुई है…क्यूंकि उस समय हमारा चिंतन हमारी संस्कृति मौलिक थी……आज व्यवस्था ही ऐसी बनी हुई है की न चाहते हुए भी हमें नक़ल करना पड़ रहा है………और क्यूंकि हम नक़ल कर रहे हैं इसलिए भारतीय प्रतिभा भारत में विकशित नहीं हो पा रही……..दोष व्यवस्था का है……..व्यवस्था परिवर्तन से ही भारत का पुन: विकाश संभव है……….! प्रीतीश


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