सरोकार

शोषित मानवता के लिए नवज्योति और आत्मविश्वास का सृजन करता ब्लॉग

54 Posts

1772 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5462 postid : 288

इंसानियत की सबसे बड़ी दुश्मन है देशभक्ति!!

Posted On: 18 Aug, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

सरहदें, भौगोलिक सीमाएं इंसानियत की सबसे बड़ी दुश्मन हैं. देशभक्ति मानवता के लिए अभिशाप है. मानव निर्मित धर्मों के बाद अगर इंसानी दुनिया को सबसे ज्यादा किसी ने अभिशप्त किया है तो वह है देशभक्ति और कट्टर राष्ट्रवाद. कथित रूप से बड़े देशभक्तों ने पूरी मानवता को निर्ममता से कुचला, रौंदा और बार-बार प्रताड़ित किया और ये सब होता रहा राष्ट्र की रक्षा के नाम पर.


हम बड़े गर्व के साथ खुद को देशभक्त कहते हैं, सैकड़ों वर्ष अंग्रेजों का गुलाम रहने के बाद बड़ी शान से आजादी का तिरंगा फहराते हैं. पर क्या यह सब करते हुए हमें एक बार भी यह ख्याल आता है कि जिस आजादी के ऊपर हम इतना नाज करते हैं वह कितने इंसानों की जान लेकर मिली है? भारत को एक आजाद देश बनाने के लिए देशभक्ति के नाम पर हमने ना सिर्फ अपने मुल्क के लोगों की जान गंवाई बल्कि दूसरे इंसानों से भी उनके जीने का हक छीना. ‘धरती’ जिसे हम अपनी मां कहते हैं, उसे लाल किया है और यह सब करने के बाद भी हम खुद को इंसान कहते हैं.


कहने को तो हम मानवता और इंसानियत को ही अपना धर्म बताते हैं लेकिन जब इस कथन को व्यवहारिक रूप देने की बात आती है तो हम सरहदों के फेर में उलझकर इंसानों के ही खून के प्यासे हो जाते हैं. इंसानियत का पहला उसूल है दूसरे व्यक्ति के प्रति सहानुभूति रखना, अपने वचनों और कर्मों से किसी को तकलीफ ना पहुंचाना लेकिन इस कसौटी पर शायद देशभक्ति ही खरी नहीं उतरती. मात्र अपने राजनीतिक हित साधने के लिए इंसानों को एक-दूसरे से लड़वाया जाता है. एक-दूसरे के खून का प्यासा बनाकर उन्हें जंग के मैदान में उतार दिया जाता है और जब वह अपने तथाकथित दुश्मन की जान लेकर वापस लौटते हैं तो हम उन्हें विभिन्न प्रकार के वीर चक्रों से नवाजते हैं.


निश्चित तौर पर जब भारत की सीमाओं पर बाहरी मुल्कों का आक्रमण होगा या देश की अखंडता और एकता पर खतरा मंडराएगा तो इसका प्रभाव सीधा देशवासियों पर पड़ेगा लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि ऐसे राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और स्वार्थ ग्रसित आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इंसानों का आपस में लड़ना इंसानियत के ही मुंह पर कितना बड़ा तमाचा है. सरहदों और सीमाओं को बहाना बनाकर इंसानियत को तार-तार किया जाता है. भिन्न-भिन्न नियमों और कानूनों को आधार बताकर इंसानियत को फैलने से रोका जाता है.


क्या कथित देशभक्ति के लिए हम इंसानियत को कुर्बान करते हुए एक बार भी यह नहीं सोचते कि जिन लोगों का हम खून बहा रहे हैं, उनसे जीने का अधिकार छीन रहे हैं, उनका जाना उनके परिवार पर कितना भारी पड़ेगा. इंसानियत को तार-तार करती यह नफरत इस कदर हमारे दिलोदिमाग पर घर कर चुकी है कि देशभक्ति की आड़ लेकर खून की होली खेलने में भी हम कोई बुराई नहीं समझते. अभी कुछ ही समय पहले मैंने एक किताब पढ़ी थी जिसमें लिखा था कि आपके भीतर का भय ही आपको दुश्मन बनाने के लिए विवश करता है. जिस दिन आप दूसरों से डरना बंद कर देंगे उसी दिन आपके दुश्मनों की संख्या भी कम हो जाएगी. शायद हमारे अंदर का दर्द ही हमें दुश्मन बनाने को मजबूर करता है और दुश्मनों की संख्या सरहदों का निर्माण करवाती है.


हाल ही में हमने आजादी की 65वीं वर्षगांठ मनाई है. इस अवसर पर बहुत से लोगों को मेरा यह लेख विवाद पैदा करने वाला लग सकता है परंतु इस लेख को लिखने का आशय देशभक्ति को सही या गलत ठहराना नहीं बस छिपी और दबी हुई इंसानियत के औचित्य को खंगालना था जिसकी ओर हम ध्यान देना ही जरूरी नहीं समझते.





Tags:                                   

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 2.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

20 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kuldeep verma के द्वारा
December 2, 2012

आपका सीधा सा मतलब ये है की अगर कोई मेरी माँ को मार रहा है तो मैं उसे एक मजबूत डंडा दू और कहू भाईसाहब इससे पीटिये इसको ज्यादा दर्द होगा। पर मैं ऐसा नहीं करूँगा उसको वही जिन्दा गाड दूंगा और रही बात देशभक्ति की ? तो राष्ट्रप्रेम में इंसानियत अपने राष्ट्र के लोगो के लिए होनी चाहिए दुसरे लोगो के लिए नहीं\ जय हिन्द जय भारत जय महाकाल

ajay के द्वारा
October 11, 2012

बहुत अच्छा लेख है. पर लोग अभी ऐसा लिखने में िहिचकते हैं कि कहीं देशद्रोही न मान लिया जाए.

chaatak के द्वारा
October 7, 2012

Gurudev Rabindranath Tagore wrote- Where the mind is without fear and the head is held high Where knowledge is free Where the world has not been broken up into fragments By narrow domestic walls Where words come out from the depth of truth Where tireless striving stretches its arms towards perfection Where the clear stream of reason has not lost its way Into the dreary desert sand of dead habit Where the mind is led forward by thee Into ever-widening thought and action Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.

yogi sarswat के द्वारा
August 21, 2012

क्या कथित देशभक्ति के लिए हम इंसानियत को कुर्बान करते हुए एक बार भी यह नहीं सोचते कि जिन लोगों का हम खून बहा रहे हैं, उनसे जीने का अधिकार छीन रहे हैं, उनका जाना उनके परिवार पर कितना भारी पड़ेगा. इंसानियत को तार-तार करती यह नफरत इस कदर हमारे दिलोदिमाग पर घर कर चुकी है कि देशभक्ति की आड़ लेकर खून की होली खेलने में भी हम कोई बुराई नहीं समझते. तमन्ना जी , आपके विचारों से अपने आप को सहमत होते हुए नहीं देख रहा हूँ ! मानवता के किस्से भी खूब देखे हैं और राष्ट्र भक्ति के भी ! सच तो ये है की जो राष्ट्र भक्त हो सकता है वाही मानवता का पुजारी भी और जो मानवता का पुजारी है वो राष्ट्रभक्त भी होगा ही !

ashishgonda के द्वारा
August 21, 2012

आदरणीय, तमन्नाजी! यद्यपि आपकी सोंच को सलाम, वर्तमान भारत में इंसानियत की गिरी स्थिति पर ये लेख सराहनिए है, तथापि आप अपनी बातों को जिस तराजू में तोल रहीं हैं, उसमे आपका पलड़ा हल्का है, जब बात देश की हो, तो कोई भी तर्क,नीति, धर्म यही कहता है कि जिसने हमारी भारत माँ को छूने की कोशिश कि है उसके प्राण ले लो, क्योंकि कालांतर में जब भगवान श्री राम ने रावण को संधि भेजा और उसने ठुकरा दिया तो युद्ध अनिवार्य हो गया,, “हाल ही में हमने आजादी की 65वीं वर्षगांठ मनाई है. इस अवसर पर बहुत से लोगों को मेरा यह लेख विवाद पैदा करने वाला लग सकता है परंतु इस लेख को लिखने का आशय देशभक्ति को सही या गलत ठहराना नहीं बस छिपी और दबी हुई इंसानियत के औचित्य को खंगालना था जिसकी ओर हम ध्यान देना ही जरूरी नहीं समझते.” इन पंक्तियों से तो मैं पूर्णतः सहमत हूँ, परन्तु देश को लूटने वाले लूटें और हम चुप रहें इसे संस्कार नहीं कायरता कहते हैं, जैसा कि पहले ही ‘कुमार गौरव अजितेंदु जी’ ने लिखा है, कि इसकी आवश्यकता पकिस्तान में है. कृपया इसे मेरा व्यग्तिगत विचार समझें और कुछ नहीं.

Rajesh Dubey के द्वारा
August 21, 2012

मानवता के लिए जंग अभिशाप है. जंग में जान गवानी पड़ती है. पर स्वाभिमान के लिए जान तुच्छ है. देशप्रेम का मतलब अपनी जान को देश से कम आकना हैं. तम्मना जी आपका सपना सच्च हो जाता, सरहदें ख़त्म हो जाती. इन्सान इन्सान से प्रेम करता, वसुधैव हीं कुटुम्बकम के सोंच में हम जीते, तब निश्चित ही मानव जीवन कुछ और ही होता. ये लक्ष्य मानव जीवन में सर्वोतम है.

Chandan rai के द्वारा
August 21, 2012

tamannn ji , आप एक बेहतरीन लेखिका के रूप में मेरे मानस पटल पर अंकित थी ! पर विगत कुछ समय से आपकी लेखनी मूल बात के निहितार्थ से भटक सनसनीखेज्नामे के कुचक्र की तरफ केन्द्रित होती दिखती है , कृपा इसे एक सामान्य पाठक के फीडबैक के रूप में ले !

अज्ञात के द्वारा
August 21, 2012

आपका लेख बड़ा तार्किक है, परन्तु आप इसे विवादास्पद इस आशय के साथ मान सकती हैं, कि लेखकीय भावना थोड़ी मानवेतर है, बिलकुल देववाणी के समकक्ष. इसे यूं समझें कि यदि आपकी सूक्ष्म भावना के साथ मानवता बहे, तो धरती मानवतावादियों व मानव आबादी से ऎसी पट जाएगी, कि सबके लिए दाना-पानी जुटाना बिलकुल असंभव हो जाएगा, और सारी प्राकृतिक व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी. सृष्टि-व्यवस्था ‘जीवो जीवस्य भोजनं’ के सिद्धांत पर आधारित है, न कि बाघ और बकरी को एक घाट पर इकट्ठा देखने की. चिड़िया अपने घोंसले-अण्डों की रक्षा हेतु सांप का प्रतिकार करना बंद कर उसके प्रति स्वागत भाव अपना ले, सांप नेवले को बिल में दावत पर बुलाने लगे, और ये सभी आक्रमणकारी जंतु भी अपना स्वभाव भूल शाकाहारी बन जाएं, तो फिर कैसे होगा संतुलन ? गृह-रक्षा, राष्ट्र-रक्षा तथा विस्तारवाद आदि मानवोचित भाव, सभी कुछ शाश्वत संतुलन व्यवस्था की उपज है, कोई मनोविकार नहीं है. धन्यवाद.

shailesh001 के द्वारा
August 20, 2012

महामूर्खता भरा लेख है.. इसपर कमेंट करना ही बेवकूफी है वैसे तो. आखिर एक महिला से आशा भी ऐसी ही है

akraktale के द्वारा
August 20, 2012

तमन्ना जी                 सादर, सरहदों को इंसानियत का दुश्मन बाताना सर्वथा अनुचित है बावजूद इसके कि सरहदों के चक्कर में कई मनुष्यों को जीवन बलिदान कर देना पड़ा है. जब सभी देशों कि अपनी सीमा है उस देश के लोग उसी देश में सारी सुख सुविधाएं भोग सकते हैं यदि किसी अन्य देश में किसी से मिलना है या और किसी कार्य से जाना है तो वह भी बन्द नहीं है. आप पर हमला करने वाले को तो कहीं भी उसका परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना ही होगा चाहे वह सीमा पर हो या घर पर.                 सीमाएं तो सदा ही इंसान को बचाने में सहायक हुई है यही सच्ची इंसानियत भी है. क्योंकि हर भोगोलिक परिस्थिति में इंसान कि डील डौल में परिवर्तन हुआ है.क्या होता यदि शारीरिक असंतुलन वाले बलशाली कमजोर को गुलाम बना कर रखते शायद वह ज्यादा खतरनाक होता. पुनः विचार करें.

August 20, 2012

तमन्ना जी, अब मुझे ये पूर्ण विश्वास हो चुका है कि आप अपने लेख को चर्चित करने के लिए जो भी मन में आएगा, वो लिखेंगी| वैसे आपने लिखा अच्छा है| लेकिन ऐसे लेखों की आवश्यकता यहाँ नहीं बल्कि पाकिस्तान में है| पता नहीं वहां कोई लिखता होगा कि नहीं?

jlsingh के द्वारा
August 19, 2012

आदरनीय तमन्ना जी, सादर अभिवादन! आचार्य चतुरसेन ने बहुत पहले लिखा था – धर्म और देश के नाम पर जितनी हत्त्याएँ हुई है शायद और किसी भी आधार पर उतनी हत्त्याएँ नहीं हुई है. इससे ज्यादा मैं क्या लिखूं, बहुत सारी लोग नाराज हो जायेंगे. एक और बात इन दोनों तरह के उन्माद में हमेशा बेक़सूर , मासूम लोगों की ही हत्त्याएँ होती है ….

bharodiya के द्वारा
August 18, 2012

तमन्नाजी आप को बहुत जल्दी है विश्व सरकार की, सब देशों की सरहदों को तोडकर । होगा लेकिन अभी और २०० साल लगेगा । सरहदें भी मिटेगी और विश्व की एक ही सरकार बनेगी । कोइ अंदर बाहर का नही होगा । कोइ देशभक्ति नही होगी । अभी सफाई बाकी है । आबादी बहुत बढ गई है, टरगेट ४ का था आज ७ अरब से उपर चला गया है । ३ अरब को मारना है । भुखमरी से, आतंकवाद से, आपसमें लडवा के । नही मरे तो बाद में सरकारी बंदुक से । दौरान ईस आबादी का गधों की तरह उपयोग कर के सारे इन्फ्रास्टक्चर तैयार करवा लेना है ।

Dr. Anwer Jamal के द्वारा
August 18, 2012

हम सरहदों के फेर में उलझकर इंसानों के ही खून के प्यासे हो जाते हैं. इंसानियत का पहला उसूल है दूसरे व्यक्ति के प्रति सहानुभूति रखना, अपने वचनों और कर्मों से किसी को तकलीफ ना पहुंचाना लेकिन इस कसौटी पर शायद “देशभक्ति” ही खरी नहीं उतरती.

ashokkumardubey के द्वारा
August 18, 2012

इंसानियत , मानवता जो की दुनियां के सभी धर्मों रीती रिवाजों से सर्वोपरि शायद यह पथ न किसी स्कुल में पढाई जाती है न किसी कालेज में यह तो लोग अपने घर परिवार अपने परिवेश और समाज से हिन् सीखते हैं क्या आपको कहीं इंसानियत नजर आती है केवल घृणा द्वेष ,नफरत ,दरिंदगी हैवानियत यही कुछ देखने पढने को मिलता है शायद देश भक्ति भी वैसे हिन् नफरत की ज्वाला में भष्म हो चुकी है वर्ना देश भक्तों का इस तरह से अपमान अपना देश न करता उनकी क़ुरबानी को यूँ न भुला देता आज तो शहीद भगत सिंह को मरवाने वाले शोभा सिंह जो प्रसिद्ध लेखक के पिता श्री हैं उनके नाम से सड़क का नाम रखने की तय्यारी है इससे जाना जा सकता है वर्तमान कांग्रेस पार्टी जिसको सत्ता शुरू में मिली उनकी नजर में देश भक्त कितना मायने रखता है बस इसमें हिन् सारा सत्य छिपा है देश भक्ति का आपके द्वारा प्रकट किया गया उद्गार अपनी जगह सही हो सकता है पर जिन्होंने कुर बनियान दीं उनके परिवार वालों को तो दुःख पहुचता हिन् है .

manoranjanthakur के द्वारा
August 18, 2012

इंसानियत के औचित्य को खंगालना था मगर आगे आयेगा कौन

phoolsingh के द्वारा
August 18, 2012

तमन्ना जी नमस्कार, सही खा आपने “जिस दिन आप दूसरों से डरना बंद कर देंगे उसी दिन आपके दुश्मनों की संख्या भी कम हो जाएगी.” बहुत ही सुंदर लेख….. फूल सिंह

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 18, 2012

इंसानियत के दुश्मनों को मुह तोड़ जवाब देना देश भक्ति है. नहीं तो अपने घर में इंसानियत का जामा पहने बैठे रहें और वे हैवानियत का खेल खेलते रहें. सादर

Santosh Kumar के द्वारा
August 18, 2012

आदरणीय तमन्नाजी ,.सादर अभिवादन जटिल मुद्दा ,.सहज समाधान ,.यदि इंसान अपनी विस्तारवादी और श्रेष्ठ होने की मानसिकता त्याग दें तो देश भक्ति और मानवता एक दुसरे की पूरक बन सकती हैं ,..सादर आभार सहित

vikramjitsingh के द्वारा
August 18, 2012

जय हो..!!! बहुत दिनों बाद एक अच्छी रचना से सामना हुआ……. बिलकुल ऐसा लगा….जैसे मूड फ्रेश हो……. सादर……तमन्ना जी…..


topic of the week



latest from jagran