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क्या सीता के चरित्रोन्नायक महाकवि नारी द्रोह के अपराधी हैं

Posted On: 6 Nov, 2012 में

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जिमि स्वतंत्र भय बिगरहिं नारी महामना तुलसीदास कृत अग्रलिखित वचन नारी के स्वातंत्र्य और स्वाधीनता को बाधित करने का प्रयास करते नजर आते हैं. महाकवि के इस वक्तव्य में यह प्रमाणित करने की चेष्टा की गई है कि नारी के ऊपर किसी भी रीति में पुरुष का रक्षण कायम रहना चाहिए अन्यथा नारी का चरित्र, आचरण, व्यवहार और मर्यादा नियंत्रित और संतुलित नहीं रखी जा सकती.


रत्नावली के व्यंग्य बाणों से उपेक्षित और सांघातिक पीड़ा का वरण करने वाले महाकवि पूरे जीवन नारी के विरुद्ध द्रोह भाव से ग्रसित रहे, जिसे उन्होंने मानस की कुछ पंक्तियों में विभिन्न प्रकरणों में व्यक्त भी किया है. महाकवि संत्रासित होने के भाव से मर्मांतक रूप से मर्माहत हुए और येन केन प्रकारेण अपनी पीड़ा को लेखनी के माध्यम से उड़ेलते नजर आते हैं. जिस उपेक्षा और अपमान को उन्होंने रत्नावली के वक्तव्यों में महसूस किया उसके वास्तविक निहितार्थों को समझने के बावजूद महाकवि ने कहीं ना कहीं उसे उपेक्षित किया तथा मानस की पंक्तियों में स्त्री द्रोह की भावना को जाने-अनजाने ही समाहित कर दिया.


‘शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी’ जैसा वक्तव्य भी महाकवि ने किसी खास उद्देश्य से उल्लिखित किया है किंतु इसमें भी उनके इसी भाव की ही पुनरावृत्ति निदर्शित हुई है जो उन्होंने उपरोक्त वर्णित वक्तव्य में महसूस किया.


पुरुषवादी वर्चस्व तथा अहंकार के निदर्शन में बेहद सरल हृदय महाकवि से भी यह बात प्रकट हो ही जाती है कि अंतिम तौर पर समाज नारी के स्वातंत्र्य और गरिमा को बंधन युक्त रखने में सुरक्षित समझता है. रूप गर्विता नारी के छल प्रपंच, त्रिया चरित्र से कामासक्त पुरुष की बुद्धि और विवेक शून्यता की तरफ बढ़ जाते हैं और वह उसके वास्तविक आशय को समझने की बजाय उससे सम्मोहित या वशीभूत होकर विचरण करने लगता है कहीं ना कहीं महाकवि को ऐसा ही प्रतीत होता नजर आता था इसीलिए ना चाहते हुए भी मजबूरन उनकी लेखनी नारी द्रोह के भाव से युक्त नजर आती है.


किंतु क्या वाकई मानस के रचयिता की बुद्धि इतनी क्षुद्र हो सकती थी कि उनका स्वयं की भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रह गया हो और उन्होंने अपने पूर्वाग्रहों को रचना में उड़ेल दिया हो, जबकि वही महामना सीता जैसे चरित्र के उन्नायक भी सिद्ध होते हैं. क्या पुरुषवादी वर्चस्व की अहंकार युक्त भावना नारी की महानता को जगह-जगह वर्णित करने वाले महाकवि के हृदय को दग्ध करती है? नि:संदेह व्याख्याताओं से भूलें हुई हैं. वक्तव्यों के पूरे निहितार्थों को समझे बिना महाकवि का चरित्र चित्रण नारी द्रोही के तौर पर करना उनके साथ अन्याय होगा.


मानस की पंक्तियों पर जिस जगह उपरोक्त वक्तव्य सम्माहित किए गए हैं वह सिर्फ उन नारियों के लिए हैं जिनके चरित्र व आचरण से समाज और परिवार को हानि पहुंच सकती थी. मूल प्रसंग को जाने बिना केवल उल्लिखित तथ्यों के आधार पर महाकवि की मानसिकता पर प्रहार करना एक खतरनाक प्रवृत्ति है. जबकि उन्होंने अपनी सभी रचनाओं में नारी के उदात्त चरित्र के साथ उसकी मर्यादा, गरिमा तथा स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने का प्रयत्न किया तथा संक्रमणकालीन राजनीतिक परिस्थितियों में क्षय होती जा रही नारी की स्थिति को संबल देने की कोशिश की.


रत्नावली के प्रयोजनशील व्यंग्य बाण को महाकवि अच्छी तरह समझते थे और उनके लिए यह बाण मर्मांतक ना होकर मोक्षदायक था. यही कारण है कि महाकवि सीता के चरित्र को व्याख्यायित करते हुए किसी नारी की गरिमा तथा मर्यादा को उच्चतम ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास किया है. किंतु दुर्भाग्यवश नारी मुक्ति आंदोलन के प्रणेताओं ने महाकवि को जाने-अनजाने नारी द्रोह के अपराधी के तौर पर लांक्षित करने की कोशिश कर दी है.




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54 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abodhbaalak के द्वारा
December 4, 2012

बहोत दिनों के बाद आपको पढ़ा, आपने जिस विषय को इस बार चुना है वो सोचने लायक है पर, जैसा की अन्य ब्लोगर्स ने भी कहा, एक बात को कहने और समझने के अलग अलग ……. बहरहाल मेरी और से भी बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ डी वीक के लिए बंधाई

prabhakar / ITB के द्वारा
December 2, 2012

प्रिय ब्लॉगर मित्र, हमें आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है साथ ही संकोच भी – विशेषकर उन ब्लॉगर्स को यह बताने में जिनके ब्लॉग इतने उच्च स्तर के हैं कि उन्हें किसी भी सूची में सम्मिलित करने से उस सूची का सम्मान बढ़ता है न कि उस ब्लॉग का – कि ITB की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगों की डाइरैक्टरी अब प्रकाशित हो चुकी है और आपका ब्लॉग उसमें सम्मिलित है। शुभकामनाओं सहित, ITB टीम पुनश्च: 1. हम कुछेक लोकप्रिय ब्लॉग्स को डाइरैक्टरी में शामिल नहीं कर पाए क्योंकि उनके कंटैंट तथा/या डिज़ाइन फूहड़ / निम्न-स्तरीय / खिजाने वाले हैं। दो-एक ब्लॉगर्स ने अपने एक ब्लॉग की सामग्री दूसरे ब्लॉग्स में डुप्लिकेट करने में डिज़ाइन की ऐसी तैसी कर रखी है। कुछ ब्लॉगर्स अपने मुँह मिया मिट्ठू बनते रहते हैं, लेकिन इस संकलन में हमने उनके ब्लॉग्स ले रखे हैं बशर्ते उनमें स्तरीय कंटैंट हो। डाइरैक्टरी में शामिल किए / नहीं किए गए ब्लॉग्स के बारे में आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा। 2. ITB के लोग ब्लॉग्स पर बहुत कम कमेंट कर पाते हैं और कमेंट तभी करते हैं जब विषय-वस्तु के प्रसंग में कुछ कहना होता है। यह कमेंट हमने यहाँ इसलिए किया क्योंकि हमें आपका ईमेल ब्लॉग में नहीं मिला। [यह भी हो सकता है कि हम ठीक से ईमेल ढूंढ नहीं पाए।] बिना प्रसंग के इस कमेंट के लिए क्षमा कीजिएगा।

seemakanwal के द्वारा
November 13, 2012

आप ने एक समालोचक बम के दोनों पक्षों पर नजर डाली है .धन्यवाद .

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    सीमा जी.. हार्दिक धन्यवाद

Tufail A. Siddequi के द्वारा
November 12, 2012

आदरणीय तमन्ना जी सादर अभिवादन, आप शायद गलतफहमियों को दूर करना चाहती हैं. किसी के भी द्वारा कही गई बातों के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं ! यह पढ़ने, सुनने और देखने वालों की मानसिकता, समय और परिस्थितियों पर निर्भर करता है ! आप स्वयं किस पक्ष में हैं, यह स्पष्ट नहीं है. बहरहाल, ब्लागर ऑफ़ दी वीक बन्ने पर आपको बहुत-२ बधाई. तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    तुफैल जी… बहुत बहुत शुक्रिया

shashibhushan1959 के द्वारा
November 12, 2012

आदरणीय तमन्ना जी, सादर ! किसी के भी द्वारा कही गई बातों के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं ! यह पढ़ने, सुनने, देखने वालों की मानसिकता, समय और परिस्थितियों पर निर्भर करता है ! गोस्वामी तुलसीदास जी राम और सीता के परम भक्त थे, इस बात में संदेह नहीं किया जा सकता ! परन्तु राम का अर्थ समस्त पुरुष जाति और सीता का अर्थ समस्त स्त्री जाति से नहीं लगाया जा सकता ! आपने बिलकुल ठीक कहा है की …. “”मूल प्रसंग को जाने बिना केवल उल्लिखित तथ्यों के आधार पर महाकवि की मानसिकता पर प्रहार करना एक खतरनाक प्रवृत्ति है.”" ऐसा नहीं किया जाना चाहिए ! जो लोग भी ऐसा करते हैं, वे केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, या रामचरित मानस को एक निम्न कोटि की पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं ! बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ वीक की बधाई स्वीकार करें ! सादर !

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    शशि जी..आपका कहना बिल्कुल सही है.. प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए हार्दिक धन्यवाद

R K KHURANA के द्वारा
November 11, 2012

प्रिय तम्मना जी, ब्लागर ऑफ़ दी वीक बन्ने पर आपको लाख लाख बधाई राम कृष्ण खुराना

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    खुराना जी.. हार्दिक धन्यवाद

अजय यादव के द्वारा
November 10, 2012

आदरणीय तमन्ना जी,सादर अभिवादन , “शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी” हमारे विचार से ये ५ नही तीन हैं क्यूंकि पांचो शब्द संज्ञा नही हैं |इसमें ३ शब्द संज्ञा और २ शब्द विशेषण हैं |पहला शब्द ढोल ,संज्ञा हैं ….एक वाद्य यन्त्र का नाम हैं |इसके बाद अर्धविराम लगाएं ,दूसरा शब्द गंवार संज्ञा नही,विशेषण हैं जों शुद्र के लिए प्रयोग किया गया हैं और व्याकरण के इस सिद्धांत को आप भी जानते होंगे कि विशेषण का प्रयोग हमेशा संज्ञा से पहले किया जाता हैं जैसे मीठा फल,काला घोडा ,आदि …………………तो गंवार शब्द किसी का नाम नही बल्कि विशेषण हैं अतः इस शब्द के बाद अर्द्ध विराम न लगाये |यह शब्द शुद्र के लिए प्रयोग किया गया हैं अर्थात गंवार शूद्र |शूद्र का अर्थ होता हैं सेवक तो जों सेवक गंवार हों उसे ताडना देना उचित हैं |”ताड़ने बह्वोगुनः”के अनुसार ताडना के कई गुण होते हैं |चौथा शब्द पशु भी संज्ञा नही ,विशेषण हैं और यह नारी के लिए प्रयुक्त हैं ….और जों नारी ,नारीत्व के गुणों से युक्त ना हों ,पशु-नारी हों जैसे कि नरपशु भी होते हैं तो पशुता करने वाली ऐसी नारी भी ताड़ना कि पात्रा हैं …………………समस्त नारी वर्ग या प्रत्येक नारी नही {अजय}

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    अजय यादव जी… मेरे लेख को अपना समय देने के लिए और प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए धन्यवाद

satya sheel agrawal के द्वारा
November 10, 2012

तमन्ना जी,बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ वीक की बधाई स्वीकार करें .लेख की गंभीरता आपकी गहन सोच का परिणाम है.

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    सत्यशील अग्रवाल जी.. बहुत बहुत शुक्रिया

rastogikb के द्वारा
November 9, 2012

एक परिपक्व सोंच और गंभीर चिंतन की देन है यह लेख अच्छी विचार शैली

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    हार्दिक आभार

Nikita Jain के द्वारा
November 9, 2012

क्या बात मैडम

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    लेख को समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

astrobhadauria के द्वारा
November 9, 2012

बहुत ही सटीक लेखन है,मैया सीता के लिये केवल यही कहा जा सकता है कि -”जहाँ गयीं जानकी,वहीं पडी जानकी”.

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    भडौरिया जी… हार्दिक आभार

jlsingh के द्वारा
November 9, 2012

आदरनीय तमन्ना जी, सादर अभिवादन! ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के लिए बधाई ! प्रासंगिक तथा नवीन विचारों की प्रभावपूर्ण प्रस्तुति के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ !

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    जवाहर जी… लेख को अपना किमती समय देने के लिए हार्दिक अभार

D.N. Tewari के द्वारा
November 8, 2012

विचारों की बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है. विषय कोई नया तो नही है लेकिन महाकवि तुलसी दास जी की कुछ इस प्रकार की पंक्तियों को उधृत करके उन्हें नारी विरोधी ठहराने वालों को एक सशक्त उत्तर देने के साथ-साथ उन्हें दोषमुक्त सिद्ध करने का भी सराहनीय प्रयास है. यद्यपि इसकी आवश्यकता महाकवि को संभवतः उतनी नहीं है जितना समय – समय पर विभिन्न अवसरों किया जाता रहता है क्यों की महाकवि तो स्वयं ही कह गये हैं – “जाकी रही भावना जैसी.” फिरभी आज की परिस्थितियों को देखते हुए इतना अवश्य कहना चाहूँगा क़ि स्वतंत्रता का अर्थ उछ्रिन्खलता कदापि नहीं होता है. शिक्षा , आत्मनिर्भरता बहुत आवश्यक है लेकिन यह स्वस्थ मान्यताओं एवं मर्यादाओं के उल्लंघन का अधिकार किसी को भी प्रदान नहीं करता है . ये सब उस लछमण रेखा की भांति हैं जिसके उल्लंघन का परिणाम सर्वविदित है. पाश्चात्य देश इसके परिणाम देख रहे हैं अब हमारी बारी आनेवाली है. लेख की भाषा में कृत्रिमता एवं शब्दाडम्बर, अन्यार्थी शब्दों का प्रयोग लेखन के प्रभाव को कम करते हैं. यथा- “तुलसीदास कृत अग्रलिखित वचन ” (तुलसी दास द्वारा लिखित ये शब्द) , ” रत्नावली के व्यंग्य बाणों से उपेक्षित (आहत)” “वशीभूत होकर विचरण (आचरण) करने लगता है”, “उनकी लेखनी नारी द्रोह के भाव से युक्त नजर आती(प्रतीत होती) है.आदि. इस प्रवृत्ति से बचा जाना चाहिए, कृपया इसे अन्यथा न लें. विचारोत्तेजक लेख के लिए पुन; साधुवाद

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    तिवारी जी.. आपकी प्रतिक्रिया बहुत उपयोगी है… लेख को अपना समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
November 8, 2012

तमन्नाजी, बेस्ट ब्लॉगर चुने जाने पर आपको हार्दिक बधाई…

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    सिंह जी.. बधाई देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

Harish Bhatt के द्वारा
November 8, 2012

तमन्ना जी नमस्ते बेस्ट ब्लॉगर ऑफ द वीक चुने जाने के लिए बहुत बहुत बधाई.

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    हरीश जी..हार्दिक आभार

ashishgonda के द्वारा
November 8, 2012

आदरणीया! तमन्ना जी! सादर अभिवादन. सर्वप्रथम बेस्ट ब्लॉगर ऑफ द वीक चुने जाने के लिए बहुत बहुत बधाई. आज बहुत दिनों बाद आपको पढ़ रहा हूँ. ये एक ऐसा प्रसंग है जिस पर समय समय पर लेखन होते रहें हैं, कोई इसे उचित तो कोई अनुचित कहता है. इसे लेकर इसी मंच पर कई लेख लिखे गए हैं. मैंने भी एक लेख लिखा था जिसमे ये प्रसंग भी आया था “सीता-परित्याग राजधर्म या राजमोह”. इसमें केवल सीतापरित्याग ही नहीं इस पर भी प्रतिक्रिया द्वारा चर्चा की गई है. “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन्ह देखि तैसी. और हरि अनंत हरि कथा अनंता, सुनहि गुनहिं बहुबिधि सब संता.” यद्यपि उपरोक्त शीर्षक को पढकर मन में जो प्रश्न उठता है, लेख के अंत तक उसका उत्तर नहीं ढूंढ पा रहा हूँ. फिर भी इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया मात्र दे रहा हूँ. और किसी बात को न उठाते हुए केवल ‘शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी’ पर प्रकाश डालना चाहूँगा. सबसे पहली बात ये पंक्तिय गोस्वामी जी ने नहीं कही हैं, केवल लिखा है, कहा है समुद्र देव ने राम से. इसका प्रमाण हमें गोस्वामी जी के महाकाव्य श्री राम चरितमानस के पंचमकाण्ड सुन्दरकाण्ड के दोहा संख्या 57 से 59 के बीच मिलता है. इतना पढ़ने के बाद ये साफ़ हो जाता है की इन वाक्यों को महाकवि ने नहीं समुद्र ने कहा है. अब जरा इस पंक्ति को इस तरह पढकर देखिये- “ढोल, गवार सूद्र, पशु नारी. सकल ताडना के अधिकारी.” यहाँ पर उपमा के लिए पांच नहीं केवल तीन चीजे ही हैं. पहला ढोल, दूसरा गवार सूद्र (सभी सूद्र नहीं केवल गवार सूद्र) तीसरा पशु नारी (सभी नारी नहीं केवल पशुवत व्यव्हार करने वाली नारी). अब आप ही बताइए इसमें गलत क्या है ? आपने अपने आलेख में रत्नावली को भी स्थान दिया है. वैसे उनका व्यंग तुलसी के लिए हितकर हुआ परन्तु इस विषय में तुलसी जी ने कुछ नहीं लिखा कि वो उनके आभारी हैं या रुष्ट हैं. उनकी चर्चा व्यर्थ लग रही है. अतः इस विषय को लेकर गोस्वामी जी पर कोई आरोप लगाना सरासर गलत होगा. इस कड़वी प्रतिक्रिया के लिए क्षमा चाहता हूँ.

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    आशीष जी… आपकी प्रतिक्रिया मुझे अच्छी लगी. लेकिन यह भी सच है कि कभी कभार अनुवादन करने में गलतियां हो जाती है. हम बिना विचारे या दूसरे के पक्ष को समझे बिना अपनी मानसिकता बना लेते हैं जो सरासर गलत और आधारहीन होती है. लेख को अपना समय देने के लिए धन्यवाद

Santlal Karun के द्वारा
November 8, 2012

आदरणीया तमन्ना जी, “जिमि स्वतंत्र भय बिगरहिं नारी”- जैसे वचन तथा ‘शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी’- जैसे वक्तव्य के पूरे निहितार्थ की समझदारी का दायित्व आखिर किसका है ? उस नारी और कथित शूद्र समाज का, जो लगभग ६०-७० वर्षों पूर्व अशिक्षा के घोर शिकार थे या फिर उस समाज का, जो युग-युग से सुशिक्षित था ? विडंबना तो यह है कि सन्दर्भ, प्रसंग तथा सम्पूर्ण निहितार्थ को भली-भाँति समझने वाले ही अधिकतर तुलसी-याज्ञवल्क्य-कौटिल्य की ऐसी-वैसी संदर्भित पंक्तियों के उद्धरण से नारी और श्रमिक समाज पर गाहे-बगाहे फब्तियाँ कसते रहते हैं | जब तक बिना विरोध के यह सब चलता रहा, तब तक पूरे निहितार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ी, किन्तु जब इधर के दशकों में बेज़ुबान समाज भी शिक्षा के चलते मुखर हुआ और स्वामी विवेकानंद के कथनानुसार तर्क की कसौटी पर अपने मान-सम्मान को सँभालने का प्रयास करने लगा, तो अब पूरे निहितार्थ पर बल दिया जाने लगा | निहितार्थ तो विशिष्ट वक्तव्य से जुड़ा होता है, किन्तु समझदारों को नारी और श्रमिक समाज पर ऐसी-वैसी पंक्तियों के इस्तेमाल की अपनी मानसिकता दुरुस्त करनी होगी | शेष, ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के लिए बधाई ! प्रासंगिक तथा नवीन विचारों की प्रभावपूर्ण प्रस्तुति के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ !

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    संतलाल जी.. आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर अच्छा लगा. लेख को अपना समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

surendra arya के द्वारा
November 8, 2012

आज इन विषयो पर लिखने या बोलने का कोई अर्थ नहीं है चूकि नारी ने स्वयं से विद्रोह का निर्णय लिया है वह आज नारीत्व के सभी गुणों को दरकिनार कर ,उन्हें उतार फेकने पर आमदा है.

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    सुरेंद्र जी… कुछ हद तक तो ठीक है लेकिन आपका कथन शत प्रतिशत सही नहीं कहा जा सकता. आज नारित्व के गुणों को उतार फेंकने की प्रथा नहीं बल्कि पुरुषों के अधीन समाज में सांस लेने का चलन प्रारंभ हुआ है.

tejwani girdhar के द्वारा
November 8, 2012

वाकई सटीक लेखन है, आपको बधाई

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    गिरधर जी.,,, हार्दिक धन्यवाद

Lahar के द्वारा
November 8, 2012

प्रिय तमन्ना जी सप्रेम नमस्कार एक सार्थक लेख लिखने के लिए बधाई |

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    लहर जी.. हार्दिक आभार

sudhajaiswal के द्वारा
November 8, 2012

तमन्ना जी, बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने पर हार्दिक बधाई, तुलसीदास जी ने अपने समय के हिसाब से सही समीक्षा की थी, उनकी मंशा नारियों को बंधन में रखने का या उनकी स्वतंत्रता के विरुद्ध कुछ कहना नहीं था| स्वतंत्रता का दुरूपयोग न हो सदर्भ ये रहा होगा| बहुत अच्छे आलेख के लिए बहुत बधाई|

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    सुधा जी. बधाई हेतु और लेख को अपना समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

Himanshu Nirbhay के द्वारा
November 8, 2012

तमन्ना जी, सर्वप्रथम नमस्कार! पहले बार आपके ब्लाग पर आया और पड़ा..सार्थक एवं विचारशील लेखन है आपके. प्रस्तुत विषय में महाकवि का स्त्रियों के बारे लिखी गयी पंक्तियों को आपने पीड़ादायक सन्दर्भ में लिया है…इसके इतर भी सोचा जा सकता है.. तुलसी बाबा के समय में सामाजिक स्थितियां/परिस्थितियां क्या थी, हम कह नहीं सकते..या वो स्वयं स्त्रियों के बारे में क्या सोचते थे ये समझना मुश्किल है..हाँ आपकी बात भी सच हो सकती है कि मजबूरन उनकी लेखनी नारी द्रोह के भाव से युक्त नजर आती है परन्तु उनकी बुद्धि क्षुद्र हो सकती है स्त्रियों के लिए, मुझे ऐसा नहीं लगता…. जिमि स्वतंत्र भय बिगरहिं नारी…ये आज भी सत्य है..यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ बंधन नहीं है कि नारी को बन्धनों में रखा जाना चाहिए..अपितु आशय उच्श्रन्खलता से है.. उस समय के देशकाल को समझे तो नारी आपके परिवार का सबसे बड़ा मान, सम्मान और धन थी ..आज भी है यदि समझो तो..और अपने मान/सम्मान/धन कि यत्नपूर्वक रक्षा कौन नहीं करेगा…स्त्री देवताओं के बाद पूज्यनीय है.. आपका लेखन का स्तर उच्च कोटि का है…निरंतर लिखते रहिये…धन्यवाद

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    हिमांशु जी लेख को अपना समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद. महाकवि ने जिस संबंध में ”जिमि स्वतंत्र भय बिगरहिं नारी” कहा होगा उस संदर्भ में गलत तरीके से लिया गया है. जिस काल से यह उक्ति संबंधित है उस काल में महिलाओं को बहुत हदतक स्वतंत्र जीवन दिया गया था इसीलिए वाक्यों के अर्थ को बदलना आज के परिदृश्य के अनुरूप बेहद हानिकारक है.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 8, 2012

तमन्ना जी , एक महान युगपुरुष गोस्वामी तुलसीदास के समय का भारत रिश्तों के लूट खसोट, रिश्तों के उपहासों का भारत था। इतिहास उस पार से लिखा जा रहा था। समय के इस विपरीत मोड़ पर इस कलम उपासक ने भारतीय इतिहास की परतों से श्री रामपरिवार का चरित पुनारंकित किया। जिसमे सभी रिश्ते सहेजे गए और रिश्तों के मर्म की पुनर्समीक्षा की। अब ”’महाकवि को नारी द्रोह के अपराधी”’ के रूप में विचार मंथन को ‘अल्पज्ञता’ अथवा ‘अतिज्ञान’ ही कहेंगे। क्यूंकि रचना के काल-खंड में चहुँओर नारी अपमान के साक्ष्य इतिहास के पन्ने देते मिलते है, जबकि ”महाकवि ने रानी के महान पारिवारिक भावनाओं को प्रस्तुत किया।_____इसलिए ऐसे भ्रामक विषय स्वयं में सम्पूर्ण नहीं है।

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    यतिन्द्रनाथ जी.. आपकी बात बिल्कुल सही है.. यह सभी भ्रांतियां अपने आप में परिपूर्ण नहीं है….महाकवि के कथन को गलत दिशा दी गई हैं.

मृत्युँजय कुमार के द्वारा
November 7, 2012

यहाँ यह स्पष्ट नहीं हो रहा कि ब्लॉगर महाकवि के समर्थन में हैं या कि विरोध में | बिना मूल प्रसंग को जाने ही आलोचक किसी की भी आलोचना कर सकते हैं क्योंकि आलोचना करना ही उनका धर्म होता है | पर महाकवि ने अपने महाकाव्य में जिस कालखंड का वर्णन किया है उसमें स्त्रियाँ काफी उच्छ्रंखल थी और इसलिए उनमें आचरण की कोई बंदिश नहीं थी| ऐसी ही औरतों के लिए महाकवि ने स्त्रियों के प्रति तथाकथित अपमानजनक टिपण्णी की थी | आज भी जब स्त्रियाँ नारी स्वतंत्रता की नाम पर उच्छृंखलता की सीमा लाँघ रही है तो क्या उनपर बंदिश लगाने की जरुरत नहीं है – फिर चाहे यह नारीद्रोह ही क्यों न हो !

    D.N. Tewari के द्वारा
    November 9, 2012

    बिलकुल ठीक टिप्पणी की है आपने. लेकिन अब कोई लाभ नहीं किसी भी इन विचारों का. हमारे पूर्वजों द्वारा कलियुग के बारे में जो भविष्यवानियाँ की गई हैं उन्हें सच भी तो होना है. कभी रामचरितमानस में उल्लिखित ‘कलियुग महिमा’ पढ़ें.

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    आदरणीय मृत्युंजय जी और तिवारी जी… इस लेख के जरिए मैंने महान कवि के विषय में व्याप्त कुछ भ्रांतियों को दूर करने का प्रयत्न किया है. उनके कथन को अलग ही दिशा देकर अनुवादित किया गया जो किसी भी रूप में सही नहीं था. स्वतंत्रता के साथ जीवन यापन करना सभी का अधिकार है. हां लेकिन स्वतंत्रता कितनी होनी चाहिए यह बात विचारणीय है. परंतु एक सत्य यह भी है कि अति स्वतंत्रता का दुष्प्रभाव ना सिर्फ महिलाओं के चरित्र पर बल्कि पुरुषों के आचरण पर भी पड़ता है.

November 7, 2012

तमन्ना जी बहुत ही सार्थक आलेख के लिये बधाई ,,,

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    हिमांशु जी..हार्दिक धन्यवाद

akraktale के द्वारा
November 7, 2012

तमन्ना जी               सादर, लंबे अंतराल बाद मंच पर लेखन के लिए आपका पुनः स्वागत. गोस्वामी जी द्वारा लिखी बातों को यदि हम ठीक से समझें तो वे बातें आज भी कहीं ना कहीं सही ही लगती हैं. मगर आज का दौर कम समझो और ज्यादा बोलो का है, यही कारण है कि शताब्दियों पहले लिखी बात पर लोग आज व्यर्थ विवाद कर अपना वर्चस्व दिखने पर आमादा हैं. 

    akraktale के द्वारा
    November 8, 2012

    सप्ताह का बेस्ट ब्लोगर चुने जाने पर बधाई स्वीकारें तमन्ना जी.

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    रक्तले जी… बधाई हेतु और मेरे लेख पर अपना किमती समय व्यय करने के लिए आपका हार्दिक आभार

omdikshit के द्वारा
November 6, 2012

तमन्ना जी, नमस्कार. बहुत दिनों से आप के आगमन की प्रतीक्षा थी.आप के ..बेबाक लेखन ..से बहुत कुछ सीखने को मिलता है.आप ने जो प्रसंग उठाया है वह निःसंदेह विचारणीय है.सही व्याख्या न होने से अर्थ का अनर्थ हो जाता है.सामान्य ज्ञानी इसे अपने अनुसार समझाते है.आप की बातें निराधार नहीं हैं.अच्छी विवेचना,बधाई.

    Tamanna के द्वारा
    December 4, 2012

    ओम दीक्षित जी… सबसे पहले तो देर से आपका आभार व्यक्त करने के लिए मैं मांफी चाहती हूं. आपने मेरे लेख को सराहा उसके लिए मैं आपकी हार्दिक आभारी हूं.


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