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लड़का है, क्या किया जा सकता है

Posted On: 4 Jan, 2013 में

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अंग्रेजी में एक कहावत है “ब्वॉयज विल बी ब्वॉयज”, वहीं देसी परिवेश में हम अकसर कहते हैं “लड़का है, क्या किया जा सकता है. आपको नहीं लगता ऐसा कहकर हम अपनी परवरिश का सारा बोझ, जिम्मेदारियों और सुधार का सारा ठीकरा लड़कियों के सिर फोड़ देते हैं. समाज चाहे कोई भी हो लेकिन शुरुआत से ही परिवार वाले लड़कियों की परवरिश ऐसे करते हैं कि आगे चलकर भी वह कभी पुरुष की बराबरी कर पाने में खुद को सक्षम महसूस नहीं करतीं. ऐसा माना जाता है कि निम्नवर्गीय या मध्यमवर्गीय परिवारों की अपेक्षा उच्चवर्गीय परिवारों में लड़का और लड़की की परवरिश समान रूप से की जाती है लेकिन जब बात भारतीय परिवेश से संबंधित हो तो शायद ही कहीं ऐसा कुछ देखा जा सकता हो.


हाल ही में दिल्ली में हुई दर्दनाक गैंग रेप की घटना ने एक बार फिर हमें सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि क्या पुरुषों में उत्पन्न होते ऐसे मानसिक विकार का कारण उनके परिवार द्वारा दी जाने वाली परवरिश है?


जब भी किसी परिवार में कोई बेटा जन्म लेता है तो माता-पिता उसके भविष्य, उसके विवाह, उसकी परवरिश को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं. वहीं अगर किसी मां की कोख से बेटी का जन्म हो जाए तो वह और पूरा परिवार बस इसी चिंता में बैठ जाते हैं कि कैसे वह एक बेटी का पालन पोषण करेंगे. कैसे उसे समाज की गंदी नजरों से बचाएंगे, कैसे उसे संस्कार देंगे ताकि ‘अपने’ घर जाकर वह एक अच्छी बहू साबित हो? वही परंपराओं, मर्यादा और संस्कारों के अनुरूप कार्य करने का जिम्मा लड़की के कंधों पर ही होता है जबकि लड़कों को तो “यह तो है ही ऐसा या “जानवर कहकर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति पा ली जाती है. हम यह मान लेते हैं कि लड़के को सुधारना मुश्किल है लेकिन लड़कियों को तो जबर्दस्ती सुधारा जाता है. उन्हें परिवार की इज्जत बताकर ऐसे उत्तरदायित्व सौंप दिए जाते हैं जिनसे पार पाना तक उसके लिए कठिन हो जाता है. लेकिन हैरानी की बात तो यह है और भले ही ऐसी मान्यता रही है कि बेटा परिवार को आगे बढ़ाता है लेकिन कोई इस ओर ध्यान नहीं देता कि उसकी मानसिकता, उसकी सोच किस ओर जाती जा रही है.


हम आदतन इस बात को नकार सकते हैं कि ऐसे अपराधों के पीछे दोष माता-पिता या समाज का होता है लेकिन एक सच यह भी है कि जब हम प्रारंभ से ही लड़की को यह सिखाते हैं कि ऐसे नहीं चलना, वैसे नहीं बोलना, ऐसा नहीं करना, यहां नहीं जाना, इससे बात नहीं करनी और ना जाने क्या-क्या सिखाकर यह समझ बैठते हैं कि हमने अपनी बेटी को अच्छे संस्कार दिए हैं तो कहीं ना कहीं हम परिवार के बेटे को यही सिखा रहे होते हैं कि उसके ऊपर किसी भी प्रकार की सामाजिक पाबंदियां या नैतिक जिम्मेदारियां नहीं हैं, वह जो चाहे कर सकता है जैसे चाहे रह सकता है. हमारी इसी गलती का अंजाम हम, हमारा समाज, मासूम लड़कियां, आज और ना जाने कितने समय से भुगतते आ रहे हैं और ना जाने कब तक भुगतते रहेंगे लेकिन चाहे कुछ भी हो जाए कोई कितना भी लिखकर, रो कर या फिर अपना जीवन त्याग कर अपना दर्द बयां कर ले पर भारतीय समाज में बेटों की चाहत और बेटियों के प्रति विभेदात्मक व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आने वाला, वो कहते भी हैं हम नहीं सुधरेंगे. लेकिन एक बात और है जो समझनी चाहिए कि अगर इस बार भी हमने नहीं सीखा तो शायद कुछ बचेगा भी नहीं.




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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

piyush bhardwaj के द्वारा
January 31, 2013

तमन्ना जी , नमस्कार बिलकुल सत्य कहा आपने आज के समाज से किसी भी तरह की उम्मीद रखना व्यर्थ है. जो जैसा चलता आ रहा है. वैसा ही चलता रहेगा.. आवश्यक बात तो ये है.. मनुष्य को अपने जीवन में परिवर्तन लाना जरूरी है. तभी कुछ हो सकता है. पियूष भरद्वाज

alkargupta1 के द्वारा
January 9, 2013

यथार्थ के धरातल पर खरा उतरता आलेख तमन्ना जी

yamunapathak के द्वारा
January 8, 2013

तमन्ना जी आपकी बातों से सहमत हूँ. साभार

Ashish Mishra के द्वारा
January 7, 2013

कडुवा सच….लेकिन सच तो सच है.

विवेक मनचन्दा के द्वारा
January 7, 2013

तमन्ना जी , नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें । आपका लेख इस बात की ओर इंगित करता है कि आज रिश्ते कलंकित हो रहे हैं।यह परवरिश कि खामी है या संस्कारों कि कमी ? पर आज हमारा समाज गर्त में जा रहा है।आखिर कौन है इन सबके लिए जिम्मेदार ? विवेक मनचन्दा,लखनऊ

vinitashukla के द्वारा
January 7, 2013

समाज की दोगली मानसिकता पर उचित प्रहार. साधुवाद.

omdikshit के द्वारा
January 4, 2013

तमन्ना जी, शुभ नव-वर्ष. आप का कथन सही है,लेकिन आज-कल समाज के भेड़िये न तो अपनी उम्र देख रहे हैं और न ही बच्चियों या औरतो की.इसलिए उनके तरफ माँ-बाप की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं.भाई बहन में भेद करना उचित नहीं .जब-तक बच्चे घर नहीं आ जाते,दिमाग परेशान रहता है.जब तक हम सभी अपने विचार नहीं बदलते माँ-बाप को दोष दिया जाना कहाँ तक न्यायोचित है?


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