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क्यों महत्वाकांक्षी कश्मीरी युवा जेहादी बनते जा रहे हैं?

Posted On: 14 Feb, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाले भारतीय संसद पर वर्ष 2001 में जो आतंकवादी हमला हुआ था उसके मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी पर चढ़ा दिया गया. यह बात सभी जानते हैं कि भारत का कानून बहुत ही नम्र और लचीला है ऐसे में पहले कसाब और अब अफजल गुरू को बिना किसी पूर्व सूचना के फांसी दे देना विवादों से घिर गया है. मुंबई हमलों के दोषी, पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब को फांसी दिए जाने से मुद्दा इतना नहीं उलझा जितना कश्मीरी जेहादी अफजल, जिसे आतंकवादी कहा जाना सही नहीं है, की मौत से उलझ गया है. अफजल की मौत उन लोगों के जख्मों पर मरहम जरूर है जिन्होंने उस हमले में अपने करीबियों को खोया था. लेकिन फांसी की यह सजा अपने पीछे एक बेहद गंभीर और अनसुलझे सवाल को भी छोड़ गई है कि क्या वाकई अफजल को मुसलमान होने की सजा मिली? क्योंकि अफजल की फाइल से पहले भी कई सजायाफ्ता कैदियों की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित थी जो पिछले कई वर्षों से फांसी का इंतजार कर रहे हैं लेकिन ना जाने ऐसा क्या हुआ जो अन्य सभी केसों को छोड़कर सबसे पहले अफजल को ही फांसी दे दी गई?


हम खुद को धर्मनिरपेक्ष कहलवाना पसंद करते हैं इसीलिए इस सवाल का हल ढूंढ़ने में हमें बहुत डर लगता है या फिर हम इस मुद्दे को सुलझाना ही नहीं चाहते.


अफजल की फांसी आज एक राष्ट्रीय मुद्दा बनकर हमारे सामने है. कश्मीर में जहां अफजल को दी गई फांसी की सजा के विरुद्ध आवाज उठाई जा रही है, धरने प्रदर्शन किए जा रहे हैं वहीं यह भी सुनने को मिला था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हुए प्रदर्शन के बाद अफजल को शहीद का दर्जा दे दिया गया है.


अफजल गुरू को दी गई फांसी पर कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला का कहना है कि इससे कश्मीर के नौजवानों में व्याप्त असंतोष को और अधिक बढ़ावा मिलेगा. वहीं दूसरी ओर अफजल के परिवार ने जो सवाल सरकार के सामने रखे हैं उनका जवाब तो शायद किसी के भी पास नहीं है.


अफजल के भाई का कहना था कि हमारा परिवार फांसी दिए जाने पर कुछ भी नहीं कहना चाहता बस अपने एक सवाल का जवाब चाहता है कि आखिर क्यों एक समझदार मेडिकल स्टूडेंट, महत्वाकांक्षी व्यक्ति, जो सिविल सर्विसेज की तैयारी की आकंक्षा रखता था, जिसे बरगलाना या बहकाना भी मुमकिन नहीं था,  यकायक अपने सारे सपनों को छोड़कर जेहाद के रास्ते पर चल पड़ा?


आपको नहीं लगता इस सवाल का जवाब कहीं ना कहीं हमारी राजनीति, जो सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ से ओत-प्रोत है, की जड़ों में व्याप्त है. कहने को तो हम कहते हैं कि कश्मीर भारत का अंग है जो कभी अलग नहीं हो सकता और कश्मीरी व्यक्ति भारत के आम नागरिकों की ही तरह हैं. लेकिन क्या व्यवहारिक रूप में ऐसा है? कश्मीरी युवाओं में जो असंतोष फैला हुआ है कहीं ना कहीं इसका कारण हमारी रणनीति और क्रियाकलाप तो नहीं हैं?


स्वार्थ में लिप्त विभिन्न हथकंडों द्वारा कश्मीरी युवाओं को हमारे नेता सौतेलेपन का एहसास करवाते हैं जिसकी वजह से कश्मीरियों में असंतोष फैलता है. आए दिन होने वाले अत्याचार, यातनाएं, पुलिसिया कार्यवाही की वजह से कश्मीरी कभी खुद को भारत का अंग नहीं समझ पाते और पाकिस्तानी जेहादी या आतंकवादी उनके भीतर व्याप्त गुस्से और आक्रोश का फायदा उठाकर जेहाद के नाम पर उनसे यह सब करवाते हैं.


इस समस्या की शुरुआत हमने की है और इसका हल भी हमें ही ढूंढ़ना पड़ेगा नहीं तो आज एक अफजल मरा है कल कई और अफजल हमारे सामने होंगे, जिनका कारण होगा बस हमारी घटिया राजनीति और स्वार्थ में लिप्त रणनीतियां.




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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aman kumar के द्वारा
March 11, 2013

अफजल गुरु को फासी देने मे लगी देर मे भी राजनीती थी और अचानक देने भी है ………. राजनीती मे मुद्दे मरते नही है उनकी ममी बना कर रखी जाती है | बिधि का शासन बिधि की प्रकिया से बास्तव मे है कहा ?Permalink: http://amankumaradvo.jagranjunction.com/?p=71

yatindranathchaturvedi के द्वारा
February 18, 2013

विचारणीय

आर.एन. शाही के द्वारा
February 18, 2013

तमन्ना जी, सर्वप्रथम तो एडिट कर अपने शब्द ‘नमक’ को ‘मरहम’ कर लें, जो अर्थ का अनर्थ क्रियेट कर रहा है, और शायद बे-खयाली में आप द्वारा लिख दिया गया होगा । दूसरी बात कि आप के विचारों पर विस्तृत प्रतिक्रिया व्यक्त करने का मतलब कि आपके ब्लाग के समानान्तर एक पूरा ब्लाग ही लिखना पड़ेगा, जो मेरे विचार से एक अनुचित प्रयास ही कहलाएगा । संक्षेप में कहूँ तो आपका अभिप्राय उमर अब्दुल्ला जी से हू-ब-हू मिलता है, जिनके बयान भय और राजनीति की मिश्रित प्रेरणा से ओत-प्रोत हैं । उनके पिता ने उनके बयानों की काट प्रस्तुत कर राष्ट्रीय भावनाओं से संतुलन स्थापित करने की पुरज़ोर कोशिश की । कामयाब रहे अथवा नहीं, यह भिन्न विषय है । आप कुछ दिनों पूर्व जब आम कश्मीरी की जम्हूरियत और अमन के प्रति विश्वास पैदा होने वाले माहौल की ओर मुड़ कर झाँकने का प्रयास करेंगी, तो स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि आम जनमानस किस मानसिकता का हिमायती है । उमर अब्दुल्ला की जीत उसी बदलाव का प्रमाण थी, और आज की उनकी भय-मिश्रित उलट बयानी इस बात का परिचायक, कि पैरों के नीचे से फ़िसलती मनमाफ़िक़ ज़मीन ने उन्हें विचलित कर दिया है । उनके खानदान को अच्छा मौक़ा नसीब हुआ था, जब कश्मीरी युवाओं को मुख्य-धारा में और गहरे खींच कर विकास की गंगा बहाते, युवाओं को रोज़गार और प्रगति की राह पर इतनी दूर ले जाते, जहाँ से तथाकथित जेहाद उन्हें एक बुरे स्वप्न की भाँति भुला देने के क़ाबिल प्रतीत होने लगता । परन्तु अफ़सोस, उमर अब्दुल्ला जी ने बजाय प्रगतिशील रास्तों पर चलने के, दिल्ली के बड़े राजकुमार का पिछलग्गू बने रहने को ही अपने अस्तित्व के लिये ज़्यादा श्रेयस्कर समझा, नतीज़ा देश के सामने है । आप कहती हैं कि क्या कश्मीरियों को आम भारतीय जैसी नागरिकता का दर्ज़ा प्राप्त है ? इसका उत्तर सचमुच नकारात्मक है । क्योंकि उन्हें आम भारतीय नहीं, बल्कि खास भारतीय का दर्ज़ा प्राप्त है, जो शायद इस देश की एक ऐतिहासिक भूल ही कही जाएगी । यदि उन्हें खास दर्ज़ा न देकर आम भारतीयों द्वारा आबाद कश्मीर के साथ जीने का हक़ दे दिया गया होता, तो भी आज अफ़ज़ल जैसे जल्लाद को शहीद कहते उन्हें शर्म आती शायद । न भूलें कि फ़ाँसी उस अफ़ज़ल को नहीं दी गई है, जो एक होनहार मेडिकल स्टूडेंट या फ़िर सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाला एक प्रगतिशील युवा था, बल्कि उस षड्यंत्रकारी अफ़ज़ल को दी गई है, जिसने अपने देश के सिविलियन्स को सर्विसेज देने की बजाय अपने ही लोकतंत्र के मंदिर परिसर में उनका क़त्लेआम कराने की साज़िश रची थी । मैं ज़्यादा विस्तार में जाने की बजाय मात्र इस बात के साथ समाप्त करना चाहूँगा, कि आपके तर्क़ तर्क़संगत बिल्कुल नहीं हैं, मात्र पथ-भ्रष्ट कश्मीरी युवाओं की हाँ में हाँ मिलाते से प्रतीत होते हैं । जब तक पाकिस्तान का वज़ूद रहेगा, इस समस्या का कोई समाधान नहीं है, और हमारे भ्रष्ट नेतृत्वकर्त्ताओं में वह माद्दा है नहीं, जो दोनों मुल्क़ों की एक ही मिट्टी से बनी दीवारों को ढाह कर बर्लिन की तरह एक कर पाएँ । फ़साद की जड़ ये भी है कि पाकिस्तान में सिर्फ़ हिन्दुस्तानी मुसलमान बसते हैं, जबकि हमारा अखंड राष्ट्र सर्वधर्म-समभाव रखने वाला देश है । हम अपने मुसलमानों को अलग नहीं कर सकते, चाहे वे कश्मीरी हों, या अलीगढ़वी । जबकि पाकिस्तान चीन के सहयोग से पूरे कश्मीर को निगलकर इसमें इस्लाम की मूल भावनाओं से इतर कट्टरवादी राज्य गढ़ने का हिमायती दिखता है, जहाँ जम्हूरियत के नाम पर रोज़ कभी खत्म न होने वाला क़त्लेआम ज़ारी रहे । खुद अपनी दाढ़ी में आग लगी हुई है, और दूसरों की क़तर कर उन्हें सुरक्षित बनाने का ख्वाब दिखाता है । कश्मीर के युवा जब जाग जाएंगे, तभी सवेरा भी आ जाएगा । धन्यवाद ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 18, 2013

    त्वरित संज्ञान लेकर ‘नमक’ को ‘मरहम’ करने हेतु धन्यवाद तमन्ना जी । मेरी यह सफ़ाई भी आवश्यक है, अन्यथा पाठकों को अब मेरी प्रतिक्रिया ही अटपटी प्रतीत होती ।

Md Faizan Tabrazee के द्वारा
February 18, 2013

Tamanna ji! Mai apki himmat ki daad deta hu ki ap ne bilkul 101% sachayi se parichit karwaya hai, par kuch sampardayik mijaj ke hain jo sahi ko galat kahte hai, lekin mujhe ummid hai ki ap isi tarah himmat ke sath likhte rahenge, Satyamev jayate

February 17, 2013

एक बहुत बड़ी साजिश के तहत युवाओं को बहकाया जा रहा है , और इसे हवा देने का काम स्वार्थ कर रहा है जिसका वर्णन आपने अपने विचार में किया है , इस तरह के प्रश्नों को लिए विचार के लिए बहुत 2 आभार तमन्ना जी

manisha raghav के द्वारा
February 17, 2013

प्रिय नेहा जी , मैंने आपका अफजल गुरु के बारे में लेख पढ़ा । बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया । कभी 1986 में माचिस पिक्चर आयी थी जिसमें पंजाब के युवाओं के आतंकी बनने की सत्य कथा पर आधारित थी उससे हमें उनकी मजबूरी मालूम हुई । नेहा जी अब हमें शायद ऐसे फिल्म डायरेक्टर की जरूरत है जो कश्मीर के युवाओं की आतंकी बनने की मजबूरी पर फिल्म बनाये और वह कहानी सत्य कथा पर आधारित हो तभी हमें सच्चाई का पता चल पायेगा ।

    Tamanna के द्वारा
    February 18, 2013

    मनीष जी,,यह भी तो सोचिए कि फिल्म बन गई तो क्या उसे रिलीज होने दिया जाएगा?

    Tamanna के द्वारा
    February 18, 2013

    शालिनी जी,,कृप्या मुझे यह भी बताएं कि क्या औरकौन सा न्याय किया गया है

atharvavedamanoj के द्वारा
February 16, 2013

कश्मीरी युवा नेहरु की दोषपूर्ण नीतियों के चलते पृथकता की राह पर चल पड़ा है तमन्ना जी और भले ही यह कड़वा लगे किन्तु इस समस्या का स्थायी समाधान इमीडिएट एंड मैसिव आर्म्ड एक्शन ही है

    Tamanna के द्वारा
    February 18, 2013

    आर्म्ड फोर्स कभी जड़ से किसी समस्या का निपटारा नहीं करसकती. आज अफजल है कल कोई और होगा. जरूरत है उन्हें समझने और व्यवहारिक रूप में बराबरी का अधिकार देने से ही कोई अफजल फिर संसद पर हमला नहीं करेगा

shashibhushan1959 के द्वारा
February 15, 2013

आदरणीय तमन्ना जी, सादर ! “”इस समस्या की शुरुआत “कांग्रेस” ने की है, जिसका खामियाजा कश्मीर के निवासियों और सम्पूर्ण देश को भुगतना पड़ रहा है ! अफजल बेक़सूर नहीं था ! मात्र ५० हजार रुपयों के लिए जो अपने देश को तबाह करने की हिम्मत करे वह महत्वाकांक्षी नहीं गद्दार ही कहा जाएगा ! इस समस्या का हल मजबूत राजनितिक इच्छाशक्ति के बिना नहीं हो सकता, जो की कम से कम कांग्रेस में तो नहीं दिख रही है !

    Tamanna के द्वारा
    February 18, 2013

    शशिभूषण जी. सर्वप्रथम तो प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया…. आपका कहना सही है लेकिन मुझे लगता है कॉंग्रेस की ही नहीं यह राजनीति की परेशानी है जो स्वार्थ में लिप्त होकर ही कोई निर्णय करती है.


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