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हिंदुस्तान में हिंदू ही हो गए अब ‘अन्य’

Posted On: 18 Mar, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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देश के चर्चित और जाने-माने विश्वविद्यालय गुरू गोबिंद सिंह इन्द्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी द्वारा स्नातक और स्नातकोत्तर दाखिलों के लिए हर वर्ष जो फॉर्म निकाले जाते हैं, उसमें हिंदूओं को ही अन्य श्रेणी में डाल दिया गया है. फॉर्म में ईसाई, मुस्लिम, सिख, जैन आदि सभी धर्मों को तो स्थान दिया गया है लेकिन हिंदूओं को ‘अन्य’ के कॉलम में टिक करके ही खुद को सांत्वना देनी पड़ रही हैं.


हम बड़े ही गर्व के साथ खुद को धर्मनिरपेक्ष कहलवाते हैं. गर्व महसूस करते हैं जब अन्य सभी देशों की तुलना में भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य का दर्जा दिया जाता है. लेकिन इस तथाकथित गर्व की भावना के बीच यह सोचने की फुरसत ही नहीं मिली कि क्या यह छद्म धर्मनिरपेक्षता उन्हीं लोगों के हित को तो कमतर नहीं कर रही जिनके आधार पर हिन्दुस्तान की नींव रखी गई है!!


गुरु गोबिंद सिंह इन्द्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी के कुलपति से जब इन सब का कारण पूछा गया तो उनका यह साफ कहना था कि हमने तो केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी आरक्षण की नीति के तहत  यह प्रावधान किया गया है ताकि किसी भी अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग में शामिल लोगों के साथ अन्याय ना होने पाए. विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों का यह स्पष्ट कहना है कि वर्गीकृत कॉलम बस उनके लिए है जिन्हें सरकार अल्पसंख्यक मानती है और बाकी सब के लिए तो ‘अन्य’ कॉलम है ही.


बहुत हास्यास्पद है कि जिस धर्मनिर्पेक्षता का हवाला देकर तथाकथित न्याय की परिभाषा गड़ी जाती है अब वही धर्मनिरपेक्षता धर्म के आधार पर ही लोगों के साथ न्याय करेगी.


कभी-कभार तो लगता है कि अगर हम खुद को धर्मनिरपेक्ष ना कहलवाते तो हमारे हालात बेहतर होते. कम से कम छद्म न्याय और समान अवसरों की आड़ में वोट बैंक की राजनीति से तो बचा जाता. अन्य देशों में जहां हिंदु धर्म से इतर एक विशिष्ट धर्म को अपनाया गया है वहां तो वैसे ही हिंदु धर्म का अनुसरण करने वाले लोग हाशिए पर जीने के लिए मजबूर है लेकिन जिस राष्ट्र को वे अपना कहते नहीं थकते अब तो वहीं उनके साथ परायों जैसा व्यवहार किया जाने लगा है. आरक्षण, अल्पसंख्यक हित, समान अवसर आदि के आधार पर भेदभाव किया जाता है तो सिर्फ हिंदु अनुयायियों के साथ.


हिंदू बहुसंख्यक  आबादी वाले भारतवर्ष में अब ऐसी परिस्थितियां आन पड़ी हैं जब हिंदुओं को ही मुख्य धारा से हटाकर अन्य की श्रेणी में धकेल दिया गया है. वाह रे हिंदुस्तान और आरक्षण की भेंट चढ़ती हमारी स्वार्थी राजनीति.




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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

March 19, 2013

बहुत अच्छी बात लिखी है आपने तमन्ना जी शायद आपने काँग्रेस का एक प्रस्ताव नहीं देखा जिसमे अल्पसंख्यक की बात की गई है यदि उसे लागू कर दिया गया तो वास्तव में इस देश में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे और अल्पसंख्यक बहुसंख्यक ।

omdikshit के द्वारा
March 18, 2013

तमन्ना जी ,नमस्कार . बहुत ही अच्छा बिंदु उठाया है आप ने .पता नहीं कौन सी मजबूरी है इन नेताओं और शासन की ,कि ये देश का नाम …क्यों नहीं बदल पा रहे है ?लगता है कि बहुत जल्दी ही वह दिन भी देखने को मिलेगा .

bharodiya के द्वारा
March 18, 2013

तमन्ना जी ऐसी बांतों से अब अचरज नही होगा, गुस्सा भी नही आयेगा । भारतिय समाज के दिमाग का कंडिशनिंग कर दिया है । वोट बैंक की राजनीति है ऐसा हमे कह दिया और हमने मान लिया । हकिकत अलग है । वसुधैव कुटुम्बकम् मे मैने सारी बात कह दी है जरा देख लेना । बात लंबी है इस लिये यहां लिखना बेकार है ।

आर.एन. शाही के द्वारा
March 18, 2013

तमन्ना जी आपने अधूरी बात की है । पूरी करने के लिये आपको धर्म के साथ-साथ जातिगत आरक्षण से जुड़ी समस्याओं पर भी बात करनी पड़ेगी, जिसपर चर्चा करने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है । परन्तु समस्या तो समस्या है, कबूतर के आँख मूँद लेने से बिल्ली का खतरा टल नहीं जाता । समाज के जिस तबके को ऊपर उठाकर मुख्यधारा में शामिल करने हेतु इसका प्रावधान किया गया था, वह लक्ष्य अब लगभग पूरा होने को है, परन्तु है किसी की मज़ाल जो इसके आज के औचित्य पर किसी स्तर पर भी बहस चला कर सही सलामत बहस को समेट भी सके ? स्थिति विकट है, और जिसे जब वोट की दरकार होती है, इस आग में एक चम्मच घी का और उँड़ेल देता है । एक समय था जब प्रतियोगी परीक्षाओं में समाज के पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व भी न्यूनतम था, और युगों से दबाए हुए इस समुदाय की मानसिक स्थिति के कारण उपस्थित अभ्यर्थियों के अंक भी इतने कम आते थे, कि जातिगत आरक्षण के साथ-साथ अंक प्रतिशत आदि में छूट देना भी न्यायोचित ही था । परन्तु आज वह स्थिति नहीं रही । अब समाज के तथाकथित अगड़े और पिछड़े वर्ग एक ही धरातल पर खड़े हैं, जहाँ सबको हर मामले में समान अवसर प्रदान किये जाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है । आज के युवाओं को देखकर ये नहीं कहा जा सकता कि इनमें से कौन अगड़ा हो सकता है और कौन पिछड़ा, जबकि दो-तीन दशक पूर्व तक यह पहचान दूर से ही सम्भव थी । हर कथित पिछड़े वर्ग-विशेष के लिये आरक्षण के अलग-अलग प्रतिशत हमने दिये हैं, परन्तु आपके शब्दों में ‘अन्य’ के लिये कोई आरक्षण नहीं है, बल्कि उसे ‘अनरिजर्व्ड’ शब्द दिया गया है, जो अगड़ों पिछड़ों दोनों के लिये समान रूप से उपलब्ध है । अब बताइये कि ‘अन्य’ कौन है ? मुट्ठी भर किसी समय की सामन्त, अमात्य और मुनीमी करने वाली जातियों के लड़के-लड़कियाँ, जो अब एक नए फ़्रस्ट्रेशन के दौर से गुजर रहे हैं । उनके खानदान में न तो अब कोई राजा है, न मंत्री । न सेनापति और न ही कोई कोषाध्यक्ष । ज़मींदार अपनी जमीन बेचकर खा गए, और बिगड़ैल लड़के आवारागर्दी करते-करते आज की नई पीढ़ी के पिता बन गए । ऊपरी ओहदों पर अभी भी जो भूतकाल विराजमान दिख रहा है, उसके पाँव अब कब्र में लटकने की ओर अग्रसर हैं, उसके बाद क्या होगा ? बच्चे अपने माँ-बाप को कोस रहे हैं, कि मुझे आप ही के घर में पैदा होना था ? उधर जन्मा होता तो पाँच परसेंट कम में भी मस्ती की नौकरी मिल जाती, वह भी पूरे स्कोप के साथ । आज मेरी टिप्पणी को साँस रोक कर पढ़ा जा सकता है, कि यह क्या चर्चा छेड़ दी इस मनहूस ने, परन्तु वह दिन दूर नहीं जब इस विषय पर सड़कों पर बहस होगी ।


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