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नारी के लिए श्राप बन गया है उसका शरीर

Posted On: 20 Apr, 2013 में

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खुद को इंसान कहते हुए भी अब तो शर्म महसूस होने लगी है. समझ नहीं आता उस मासूम का क्या गुनाह था जिसके साथ जानवरों से भी ज्यादा वहशी सलूक किया गया. छोटी सी बच्ची थी वो….उसे तो शारीरिक इच्छाओं के बारे तो कुछ पता भी नहीं था लेकिन महिलाओं के प्रति दिनोंदिन हिंसक होता जा रहा समाज उसके इस बचपने को भी सह नहीं सका और निगल गया उसका आने वाला हर एक क्षण.


और फिर से एक बार कैंडल मार्च और विरोध प्रदर्शन की वो आग सुलगने के लिए तैयार है जिसे दिल्ली गैंग रेप के कुछ समय बाद हम सभी ने अपने हाथों से बुझा दिया था.


कहते हैं भले ही प्रकृति ने महिलाओं को शारीरिक तौर पर पुरुषों से कमजोर बनाया है लेकिन उन्हें कुछ ऐसी सौगातें दी हैं जो उन्हें अन्य किसी भी पुरुष से श्रेष्ठ साबित करती है. लेकिन अब तो लगता है नारी का वही शरीर जिसे प्रकृति की एक अनोखी देन समझा जाता रहा है, जिसके आधार पर सृष्टि का चक्र चलता है, वही उसके लिए एक ऐसा श्राप बनता जा रहा है जो उसे ना जीने दे रहा है और ना मरने दे रहा है. अगर नारी को कुछ मिल रहा है तो सिर्फ दर्द, तकलीफें और तिल-तिल कर मौत का एहसास.


दिल्ली गैंग रेप की घटना के बाद जिस तरह से महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बरते जाने की पैरोकारी शुरू हुई थी उसके बाद तो जैसे लगने लगा कि मानों अब दरिंदों से भरे इस समाज में महिलाएं खुद को सुरक्षित कह सकती हैं. लेकिन किसे पता था कि इस संवेदनशीलता की हद उसी समय समाप्त हो गई थी जब कैंडल मार्च की वो आग बुझी, जब महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए उठा वो जज्बा समाप्त हुआ, जब दिल्ली गैंग रेप की घटना के बाद फिर अपराधियों के हौंसलों को बुलंद किया गया.


हाल ही में जिस घटना को लेकर आम जनता में फिर रोष की उत्पत्ति हुई है उसमें एक 5 साल की मासूम को शिकार बनाया गया और वो भी इतने दर्दनाक तरीके से कि किसी की भी रूह कांप जाए. लेकिन इससे पहले भी महिला को सिर्फ उसके शरीर के एवज में ऐसे दर्द सहन करने पड़े हैं क्योंकि अपराधी नहीं देखता कि महिला की उम्र क्या है, उसकी नजर जाती है तो सिर्फ उसके शरीर पर. शरीर बस नारी का होना चाहिए फिर चाहे उसकी उम्र कितनी ही ज्यादा हो या फिर उसका शिकार एक मासूम दुधमूंही बच्ची ही क्यों ना बन रही हो.


इंसान कहलाने लायक नहीं रहे अब हम, घिन आती है एक ऐसे समाज से जो अपने ही अंगों को काटने के लिए हर समय तत्पर बैठा है, जो आधे समाज की इज्जत, उसकी भावनाओं को रौंदता हुआ आगे बढ़ने की फिराक में है.




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aman kumar के द्वारा
May 3, 2013

शरीर जिसे प्रकृति की एक अनोखी देन समझा जाता रहा है, जिसके आधार पर सृष्टि का चक्र चलता है, वही उसके लिए एक ऐसा श्राप बनता जा रहा है जो उसे ना जीने दे रहा है और ना मरने दे रहा है. अगर नारी को कुछ मिल रहा है तो सिर्फ दर्द, तकलीफें और तिल-तिल कर मौत का एहसास. आपसे सहमति ! नारी से ही मानवता का जन्म होता है !

bhagwanbabu के द्वारा
April 20, 2013

हम सभी को अपनी मानसिकता बदलनी होगी.. हमे मिलकर अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी.. .  .   http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/04/20/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%96-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8B-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AD/


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