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वो धर्म किस काम का जो इंसानियत का मर्म भुला दे

Posted On: 6 Nov, 2013 social issues में

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दिवाली का दिन था अब पटाखे जलाने का तो शौक है नहीं इसलिए लक्ष्मी पूजा के बाद सीधे अपना टी.वी चलाकर बैठ गई. वैसे तो हर रविवार मुझे कॉमेडी नाइट्स विद कपिल के आने का इंतजार रहता है लेकिन उस दिन कुछ खास करने के लिए था नहीं इसलिए यह इंतजार और बढ़ता जा रहा था.


10 बजे और कलर्स चैनल पर अवतरित हुए हसी के बादशाह कपिल शर्मा. दिवाली से संबंधित एपिसोड था इसलिए स्क्रिट और शो की थीम भी दिवाली से ही जुड़ी थी. कॉमेडी का सिलसिला शुरु हुआ और अपने मजेदार अंदाज में कपिल ने ऐसी बात बोल डाली जिसे सुनने के बाद वाकई मुझे लगा कि हम कहते तो हैं कि धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं लेकिन इस अवधारणा को मानते-मानते हमने अपने बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है जिसे गिरा पाना अब किसी भी रूप में संभव नहीं है क्योंकि वो दीवार है अमीरी और गरीबी की.


अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या हो गया जो मैं बेचारे कपिल शर्मा और दिवाली के त्यौहार के पीछे पड़ गई हूं. चलिए बता देती हूं, शायद आप को भी लगे कि मेरा सोचना गलत नहीं है. अपने शो में कपिल अपने बचपन के दिनों की बात कर रहा था कि कैसे वो अमीर बच्चों को देख-देख दिवाली मनाने के लिए जिद किया करते थे और इसके एवज में उनके माता-पिता उन्हें डांटते थे.


दिवाली का त्यौहार आता तो 1 दिन के लिए है लेकिन बाजारों में रौनक सप्ताह भर पहले से ही देखी जा सकती है. धनतेरस, छोटी दिवाली और फिर दीपावली…इन तीन दिनों के अंदर आप भारत के जमीनी हालातों से परिचित हो सकते हैं. आप यह अनुभव बेहद आसानी से कर सकते है कि एक घर में रौशनी को देखकर उस इंसान का दिल किस कदर कांप उठता है जिसके सिर पर छत नहीं है. कैसे एक कोने में बैठकर एक बच्चा उस पटाखे का इंतजार करता है जो किसी तरह बिना जले किसी के हाथ से गिर जाए और वो उसे उठाकर अपने पास रख ले. बच्चों का एक झुंड महंगे-महंगे पटाखों को जलाकर दिवाली का आनंद उठा रहे होते हैं और उन्हीं के घर काम करने वाली महिला के बच्चे वहां खड़े होकर इसी ताक में रहते है कि उन्हें भी कोई पटाखे जलाने के लिए बुला ले या उनके हाथ में कुछ पटाखे रख दे.


दिवाली पूजन की ही बात करें तो हमारी मान्यताओं के अनुसार लक्ष्मी पूजा के दौरान चावल के ढेर पर कलश रखा जाता है, सोने व चांदी के सिक्कों की पूजा की जाती है और कच्चे दूध में देवी-देवताओं की मूर्तियों को स्नान करवाया जाता है. कहा जाता है यह सब करने से लक्ष्मी माता प्रसन्न होकर धन की वर्षा करती है लेकिन….लेकिन जिस घर (अगर घर हो तो) में लोग आधे पेट या फिर भूखे पेट सोने के लिए विवश है, एक-एक पैसे के लिए दिन रात सड़क पर भीख मांगते हैं वह कैसे चावल का ढेर लगाकर सोने और चांदी के सिक्के की पूजा कर सकता है? बड़ी अजीब विडंबना है एक ओर जहां कुछ लोग बड़ी धूमधाम से दिवाली मनाते हैं तो वहीं बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिन्हें आसमान में बादल घिरे होने की वजह से पूरी रात अंधेरे में गुजारनी पड़ती है.


अमीरों की दिवाली भले ही दिवाली के दिन मनती हों लेकिन सच यही है गरीब के घर दिवाली तब मनती है जब वह कूड़े के ढेर में से पटाखे ढूंढ़ लेता है, उसका मालिक बख्शिश के तौर पर उसे दिवाली के पैसे और मिठाई देता है. हां, अगर घरों में सफाई करने के एवज में कुछ पैसे पहले ही मिल जाएं, मिठाई मिल जाएं या फिर पिछली दिवाली के बचे हुए पटाखे मिल जाएं तो दिवाली पहले भी मनाई जा सकती है. अब नए कपड़ों की तो बात ही छोड़ देते हैं क्योंकि गरीब के लिए तो नई उतरन ही नए कपड़े होते हैं.


यहां मेरा मकसद किसी भी रूप में किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं है लेकिन एक मिनट के लिए यह सोचने में क्या चला जाता है कि क्या ये पर्व ये त्यौहार खुशी बांटने के लिए बनाए गए हैं या फिर इन त्यौहारों को मनाने के तरीके से ही सही हम अमीरी-गरीबी के बीच की खाई को बढ़ाते जा रहे हैं.




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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Aneilp के द्वारा
October 27, 2014

तमन्‍ना जी आपने बिलकुल सही लिखा है। कमोबेश त्‍योहार मनाने के मामले में भी हम लोग स्‍वार्थी हो चुके हैं। घी के दीये जलाते समय यह भूल जाते हैं कि किसी गरीब के पास तो खाना पकाने के लिए तेल तक नहीं है। मेरा निजी ख्‍याज तो यही है कि यदि किसी एक जरूरतमंद के चेहरे पर भी खुशी ला सकें तो उससे बडा कोई त्‍योहार नहीं और सही मायनों में उसकी मुस्‍कान ही ईश्‍वर का आशीर्वाद होगा।

Ravinder kumar के द्वारा
November 10, 2013

तमन्ना जी, सादर नमस्कार. समाज के भेद को देख कर आपके मन में जो भावनाएं उठीं, उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है. आपने सोचा तो. तमन्ना जी, ये भेद मात्र त्योहारों पर दिखाई देता हो ऐसा तो नहीं है. हमारे समाज का ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहाँ ये भेद भाव दिखाई न देते हों. लोग अपने ग्रहों को शांत करने के लिए हजारों लाखों खर्च कर देते हैं, लेकिन उन लोगों की तरफ कोई नहीं देखता जिनके तथा-कथित ग्रह-देवता कभी शांत नहीं होते. आभार नमस्कार.

jlsingh के द्वारा
November 10, 2013

हर मंदिर मस्जिद के बहार भिखारियों की फ़ौज होती है! मंदिर में चाहे जितना हमारी सामर्थ्य होती है उसके अनुसार चढ़ाव चढ़ाते हैं दान भी करते हैं…पर भिखारियों को देने के लिए हमारे पास सिक्के नहीं होते! भव्य मंदिर भव्य ईमारत के आस पास ही कही झोपड़े भी नजर आते हैं. और क्या कहूँ आप भी सब जानती हैं!

sanjay kumar garg के द्वारा
November 9, 2013

तमन्ना जी, बढ़िया ब्लॉग के लिए बधाई!!!!

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
November 8, 2013

तमन्ना जी, ,एक बहुजन  समाज  का दर्द  आत्म विभोर हो  कर लिखा है एक सत्य है क्या  दीपावली  क्या  होली ,,जिस दिन खाना नसीब हो  वह ही होली ,जिस  दिन कोई किरन  नजर आए वह ही दीवाली  ,कैसे पूजा होती है है क्या महूरत  जानकर  क्या करना  , जिसके  पास धन  है उसे  चिंता उसे बडाने की , जिसके पास  है ही नहीं  वह कैसे  क्या बडाए  क्या खाए , बधाई ओम शांति शांति शांति ,तमन्ना ही कर सकती हैं उनकी भी हो अपनी होली दीवली ,

Dr S Shankar Singh के द्वारा
November 8, 2013

आपके आलेख के सन्दर्भ में —– धर्म के बारे में कुछ प्रसिद्द कवियों नें क्या लिखा है बच्चन जी के शब्दों में मधुशाला से ‘ मंदिर मस्जिद फूट डालते, मेल कराती मधुशाला ‘ नीरज जी के शब्दों में ‘ कदम कदम पर मंदिर मस्जिद, कदम कदम पर गुरुद्वारे, भगवानों की बस्ती में हैं जुल्म बहुत इंसानों पर ‘ कृपया धर्म का पुनर्मूल्यांकन करिए.

omdikshit के द्वारा
November 7, 2013

तमन्ना जी, नमस्कार. मान्यताएं बनती हैं परम्पराओं से.ये तो आप ने नहीं बताया कि आप ने किस तरीके से लक्ष्मी-पूजन किया,लेकिन इसी बहाने निवास-स्थान की सफाई हो जाती है. पैसे को भी लक्ष्मी मानते हैं और रुपये,चांदी-सोने आदि को भी.मन से ही पूजा होती है.आडम्बर और ढोंग से नहीं.अब देखिये न ,मान्यता है कि यदि कोई किसी लेख पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता है तो उसे धन्यवाद-लाभ देने की परंपरा है,लेकिन बहुत से लोग प्रतिक्रिया-लाभ तो लेते हैं,लेकिन बदले में कुछ नहीं देते.

    Tamanna के द्वारा
    November 7, 2013

    दीक्षित जी,प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया.. आपका इशारा तो मैंने समझ लिया लेकिन ऑफिस में बढ़े काम और जिम्मेदारियों की वजह से बहुत ही कम जंक्शन पर आना होता है. जब भी कुछ लिखने का मन करता है या फिर आप सभी के साथ अपनी भावनाएं बांटने का मन करता है तो यहां आ जाती हूं.. कृपया मेरी इस भूल को मांफ कीजिए, आगे से कोशिश करूंगी सभी को टाइम पर जवाब दे पाऊं.

    omdikshit के द्वारा
    November 9, 2013

    धन्यवाद,तमन्ना जी,ध्यान देने के लिए.


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